मैं बहुत कष्ट में था/ इसलिए भ्रष्ट नहीं हुआ/ पर नष्ट हो गया-इब्बार रब्बी
मैं बहुत कष्ट में था/ इसलिए भ्रष्ट नहीं हुआ/ पर नष्ट हो गया-इब्बार रब्बी
किसी तरह अपना समय पूरा कर रहा हूं
मैं एक-एक दिन घड़ी की तरह गिन रहा हूं
मैं बहुत कष्ट में था
इसलिए भ्रष्ट नहीं हुआ
पर नष्ट हो गया
इन पक्तियों को इब्बार रब्बी ने ‘पाखी परिचर्चा’ में सुनाया तो इनमें एक कवि की ईमानदारी और संवेदना एक साथ महसूस हुई। इब्बार रब्बी ने तकरीबन दस कविताओं का पाठ किया। इन कविताओं को सुनकर लगा कि इस कवि का रेंज कितना बड़ा है। कितना प्रयोगधर्मी है यह कवि जो नए युवा कवियों को सीख देता है कि कविता ऐसे भी लिखी जा सकती है। मैं मैकाले, मधु मेह अंतिम कविता, बच्चा घड़ी बनाता है, दिल्ली की बस में, भिखारी का गीत को सुनकर उपस्थित श्रोता के दिल भर या और दिमाग की नसे चटखाने लगीं।
युवा कवि निखिल आनंद गिरि ने कहा-
जिंदगी जलकर सोना
हो जाती है तो तीस की उम्र तक
और यह भी कि-
न उनका नाम, न कद न ओहदा बोलता है
हुनरमंदों की आंखों का इशारा बोलता है।
गिरि ने कल सपने में पुलिस आई थी, तीस की उम्र में, पहले कदम से पहले ,सुनो मठाधीश, लौटना, नई पीढ़ी कविताओं का पाठ किया यानी ‘पूर्ण विराम के बाद अपनी बात शुरू की।’
वे बेशक कविता के पूर्ण विराम के बाद के कवि हैं, जो अपने कथ्य, संवेदना बेचैनी और शिल्प में रचना की रेत पर एक नई लकीर खींचते हैं। उनकी कविता में ‘सियार’ और ‘मेट्रो’ एक साथ उपस्थित है जो उनके ‘गेज’ का पता देते हैं।
वरिष्ठ कवि और आलोचक दिविक रमेश की नजरों में इब्बार रब्बी उस्ताद कवि हैं। रब्बी समय की जटिलता को विट के माध्यम से बयान रकते हैं।
मैत्रेयी पुष्पा ने कुबूल किया- निखिल आनंद गिरि की कविता समझ में आती है और भीतर उतरती है। गिरि के साथ-साथ अविनाश मिश्र, लीना मल्होत्रा और शायक आलोक उनके प्रिय युवा कवि हैं।
पाखी परिचर्चा में संतोष वाजपेयी, राजकमल ,बलराम, नीला प्रसाद, सौरभ शेखर, एसआर रमण , पंकज शर्मा, प्रांजल धर, पुष्पराज, महिमाश्री , गीता पंडित ने अपने विचार रखे।


