मैं हूं शैतान के कबीले से / मैं फकत जंग से बहलता हूं !
मैं हूं शैतान के कबीले से / मैं फकत जंग से बहलता हूं !
इतिहास के कई पन्ने पलटने होंगे पाकिस्तान को
पाकिस्तान का सच यह है कि वह जिस तत्व से बना है, उसी से मारा जा रहा है।
पाकिस्तान लहूलुहान है ! यह उसका अपना खून है जिसे उसने खुद ही बहाया है। पाकिस्तान व्यक्तित्वहीन होता जा रहा है और वहाँ के राजनेता सूरतविहीन तो इसके पीछे के कई कारणों में एक बड़ा कारण पाकिस्तान का वह पढ़ा-लिखा, जहीन समाज भी है जो आज तक सच को सच की तरह और दमदार आवाज में कहने की हिम्मत नहीं जुटा सका है। बात तीखी लग सकती है और बेहद दहलाने वाले इस मौके पर इसे कहना भी और सुनना भी परेशानी का सबब हो सकता है। लेकिन सच की यही तो शिफत है कि आपको अच्छा लगे कि बुरा, सच तो सच ही रहता है - न राई कम न माशा ज्यादा ! पाकिस्तान का सच यह है कि वह जिस तत्व से बना है, उसी से मारा जा रहा है।
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प्रत्येक इंसान - खास कर बच्चे ! - भले किसी भी मुल्क में पैदा हुए हों, वे एक किसी मुल्क के नहीं होते; वे सारी मानवता के भविष्य होते हैं। किसी भी देश में, किसी भी मजहब के बच्चों को, जब उनके ही घर या स्कूल में घेर कर वैसे मारा जाता है जैसे जानवरों का क्रूर शिकार किया जाता है, तब सोचना पड़ता है कि 21वीं शताब्दी में पशुओं और मनुष्यों के बीच कोई फर्क बचा है क्या ? पाकिस्तान से एक दिन पहले आस्ट्रेलिया के सिडनी शहर के एक कॉफी रेस्तरां में 30 लोगों को बंधक बना लिया गया था जो 16 घंटे के खूनी मुकाबले के बाद, कई लोगों की जान ले कर समाप्त हुआ था। इसके दूसरे ही दिन अफगानिस्तान की सीमा से लगे पाकिस्तानी शहर पेशावर में आर्मी पब्लिक स्कूल पर घात लगा कर हमला किया गया और 132 बच्चों समेत 141 लोगों को गोलियों से भून डाला गया। न तो पाकिस्तान में यह पहली घटना है और न अंतिम ! ऐसा ही दुनिया के बारे में भी सच है और हम इस अंधी क्रूरता और वहशीपन की कड़ी निंदा करते हैं, पाकिस्तान के आंसुओं में अपने आंसू मिलाते हैं। कहते भी हैं न कि दुनिया भर में आंसुओं की जुबान एक ही होती है, सो हम आशा करते हैं कि पाकिस्तान हमारी यह जुबान सुनेगा भी और समझेगा भी।
लेकिन क्या दुख और आंसू काफी हैं ? क्या निंदा और शोक ऐसी मासूम जानों की भरपाई कर सकते हैं ? अगर ऐसा होता तब तो ऐसी वारदातें कब की रुक जानी चाहिए थीं, क्योंकि दुनिया भर में ऐसी हिंसक वारदातों के बाद हम एक ही काम तो करते हैं - शोक प्रकट करते हैं, आंसू बहाते हैं ! लेकिन शोक में विवेक न हो और आंसुओं में संकल्प न हो तो वे अर्थहीन होते हैं। इसलिए बहुत जरूरी है कि हम यह खोजें भी और समझें भी कि इन आंसुओं के पीछे कौन है ? इस आंसुओं के पीछे वे सारे-के-सारे लोग और वे सारे संगठन हैं जिन्होंने अपना पाकिस्तान पाने के लिए, आज से कोई 67 साल पहले हर हथियार का प्रयोग किया था और रक्त-स्नान कर के अपना पाकिस्तान ले गये ! काल की हथेली पर वह 100 मीटर की दौड़ थी जिसमें जिन्ना जीत गये थे और गांधी हार गये थे। लेकिन तब से ही काल की हथेली पर एक मैराथन दौड़ भी चल ही रही है जिसमें हर कदम पर जिन्ना हारते जा रहे हैं और गांधी की जीत हो रही है। गांधी ने जिन्ना साहब से यही कहा था कि हिंसा और घृणा की खाद से जो फसल आप पैदा करने में लगे हैं उससे वह जहर पैदा होगा कि जिसे आपका मुल्क न खा पाएगा, न उगल पाएगा ! पाकिस्तान इसी त्रासदी से गुजर रहा है। पाकिस्तान से आम तौर पर जो आवाजें उठती हैं, उन्हें सुनें हम तो समझ पाएंगे कि ये आवाजें इंसान को इंसान की जगह देने को तैयार नहीं हैं। इसमें पाकिस्तान का या पाकिस्तानी अवाम का कोई दोष नहीं है। हिंसा की संस्कृति ऐसा ही समाज बनाती है। जिन्ना अपनी कब्र में भले आज पछताते, करवटें बदलते हों लेकिन पाकिस्तान का अवाम है जो आग के अंगारों पर लोट रहा है। लेकिन उसे यह कौन समझाए कि वही इन अंगारों को हवा भी दे रहा है। जिन्ना मुस्लिम राष्ट्र चाहते थे; तालीबानी इस्लामिक राज्य चाहते हैं। जिन्ना ने भारत तोड़ कर अपना पाकिस्तान बनाया; तालीबानी उस पाकिस्तान को कुचल कर इस्लामी बनाना चाहते हैं। न भावनाओं में फर्क है, न तरीकों में !
और हम क्या कर रहे हैं ? और हम क्या चाहते हैं ? हमारे यहाँ ऐसे लोगों की कमी नहीं है और अब वे मुखर भी हो चले हैं कि जो पछताते हैं कि हमारा मुल्क पाकिस्तान जैसा और हमारा धर्म इस्लाम जैसा क्यों नहीं है ! हमारे यहाँ भी पाकिस्तानी आवाजें उठ रही हैं ! कुछ लोग हैं जो सत्ता का सहारा पाकर यह सर्टिफिकेट बांटने में लगे हैं कि कौन असली और कौन नकली हिंदुस्तानी है ! भारतीय समाज को छोटी-छोटी दीवारों में बांध कर, उसे काबू में रखने की यह कोशिश ही जिन्नावाद है। हिंदुत्व के नाम पर हो या ईसाइयत के नाम पर, इस्लाम के नाम पर हो कि गुरुग्रंथ साहिब के नाम पर, दीवारें खड़ी करने से देश टूटते हैं, सभ्यताएं मिटती हैं और इंसान हैवान बनने लगता है। इसलिए जिन्नावाद को रोकना हो तो हर उस आवाज को रोकना होगा जो नागरिकों में भेद पैदा करती है, हर उस कदम का विरोध करना होगा जो हिंदुस्तानियों को धर्म-जाति-संप्रदाय-भाषा के नकली दायरों में बांध कर काबू में रखना चाहता है। आज पाकिस्तान के साथ हमदर्दी में जो लोग हर चौक-चौराहे और स्कूलों में जमा हो रहे हैं, उन्हें बुलंद आवाज में यह भी कहना चाहिए कि हम हिंदुस्तान को पाकिस्तान नहीं बनने देंगे ! पाकिस्तान के मशहूर शायर अजहर रफीक अपने मुल्क की रवायत पर तंज कसते हुए कहते हैं : जंग लड़ता हूं अमन की खातिर / क्या शगूफा जहाँ में छोड़ दिया ! पाकिस्तान ऐसे ही जहरीले शगूफों को पालते-पोसते आज तालीबानी आतंक की आग में झुलस रहा है। कुछ लोग चाहते हैं कि हिंदुस्तान भी उसी राह पर जाए। वे अजहर रफीक के शब्द ले कर गाते हैं : मैं हूं शैतान के कबीले से / मैं फकत जंग से बहलता हूं ! वे चाहे जिस खिलौने से खेलें लेकिन हम उनसे कह दें कि यह देश और इस देश का कोई नौजवान, इस देश का कोई बच्चा उनके खेलने का खिलौना नहीं है ! पाकिस्तान में मारे गये हर बच्चे की याद करें हम और यह संकल्प लें कि हिंसा-घृणा-आतंकवादी बातों-कामों और नारों के साथ हम आज भी नहीं हैं और कल भी नहीं रहेंगे ताकि हमारे हिंदुस्तान के भीतर से फिर कोई पाकिस्तान पैदा न हो ! और तब हम पाकिस्तान से कह सकेंगे कि उसे इतिहास के कई पन्ने पलटने होंगे ताकि उसके सामने वह पन्ना सामने हो जिसे पढ़ने में तब उससे गलती हुई थी। लेकिन पढ़ाई का क्या है, वह तो कभी भी नये सिरे से शुरू की जा सकती है, और हम तब जो नहीं पढ़ सके थे उसे अब पढ़ सकते हैं। हिंदुस्तान और पाकिस्तान एक-दूसरे के पूरक बन कर, स्वाभिमानी पड़ोसियों की भांति खूब मजे में रह सकते हैं अगर वे एक-दूसरे की कमियों-कमजोरियों को हथियार बनाना छोड़ दें ! क्या 132 मासूम लाशें हिंदुस्तान और पाकिस्तान को इतना-सा समझा सकती हैं ? इन बच्चों को अमर करने का यही रास्ता है।
० कुमार प्रशांत


