एस्सार-हिंडाल्को के पक्ष में मोईली ने महान को दूसरे चरण की मंजूरी दी !
अविनाश कुमार चंचल
नई दिल्ली, 12 फरवरी। खबरें आ रही हैं कि एस्सार एनर्जी ने घोषणा की है कि सिंगरौली स्थित महान कोल ब्लॉक को दूसरे चरण की पर्यावरण क्लियरेंस मिल गयी है, जबकि पर्यावरण व वन मंत्रालय ने इससे पहले किसी तरह की घोषणा नहीं की थी। कोयला घोटाले के दौरान महान कोल ब्लॉक 2006 में एस्सार और हिंडोल्को को संयुक्त रूप से आवंटित किया गया था। फिलहाल यह कोल ब्लॉक सीबीआई की जाँच के दायरे में भी है। कोल ब्लॉक के आवंटन के तरीकों पर सवाल उठ रहे हैं। शुरुआत में राज्य सरकार द्वारा इस कोल ब्लॉक को एस्सार को देने का विरोध किया था और फिर सिर्फ तीन महीने के भीतर उसने अपना पाला बदल लिया।
इस खबर पर प्रतिक्रिया देते हुये ग्रीनपीस की प्रिया पिल्लई ने कहा, “हमें पहले ही डर था। मोईली लगातार जल्दबाजी में पर्यावरण क्लियरेंस बाँट रहे हैं उससे हजारों लोगों की जीविका खत्म हो जायेगी। वनाधिकार कानून तथा दूसरे अन्य जरुरी शर्तों के उल्लंघन के बावजूद मोईली ने महान कोल ब्लॉक को दूसरे चरण की मंजूरी दे दी है। इस प्रोजेक्ट से करीब 500,000 पेड़ और हजारों लोगों की जीविका को नुकसान होगा। मोईली ने जनजातिय मामलों के मंत्री केसी देव द्वारा उठाये गये सरोकारों को भी नजरअंदाज कर दिया। बड़ा सवाल है कि क्या वास्तव में सरकार जंगलों के निवासी और पर्यावरण की चिन्ता करती है?”
महान संघर्ष समिति के कार्यकर्ता और अमिलिया निवासी कृपानाथ ने कहा कि “हमलोग इस फैसले से निराश हुये हैं। इस प्रोजेक्ट से हमारी ज़िन्दगी खतरे में है। हम हजारों लोग इसी जंगल पर निर्भर हैं। हमलोग अपनी लड़ाई को जारी रखेंगे और अपना जंगल महान कोल ब्लॉक को नहीं देंगे। केन्द्रीय जनजातीय मामलों के मंत्री के समर्थन के बावजूद इस खबर ने हमें अचम्भित किया है। क्या केन्द्र और राज्य सरकार आदिवासियों और जंगल निवासियों के लिये सही में चिन्ता करती है? उसी सरकार द्वारा वनाधिकार कानून लाने का क्या औचित्य है जो खुद उसके कार्यान्वयन से बचता है ?”
जुलाई 2013 में, जनजातीय मामलों के मंत्री ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और राज्यपाल को सिंगरौली में वनाधिकार कानून के उल्लंघन के बारे में लिखा था। साथ ही, माँग की थी कि बिना वनाधिकार कानून लागू किये बिना पर्यावरण क्लियरेंस नहीं दिया जाय। वनाधिकार कानून को लागू करवाना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है लेकिन पर्यावरण क्लियरेंस देने से पहले केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है कि वो वनाधिकार कानून को सुनिश्चित करे। वनाधिकार कानून लागू न करने की वजह से ही नियामगिरी में वेदान्ता और ओडिसा में पोस्को के प्रोजेक्ट आगे बढ़ने में असफल हुये।
बता दें कि बीती 22 जनवरी को ग्रीनपीस तथा महान संघर्ष समिति ने एस्सार के मुंबई स्थित मुख्यालय पर विरोध प्रदर्शन किया था तथा मोईली द्वारा जल्दबाजी में उद्योगों के पक्ष में दिये जा रहे निर्णय पर सवाल उठाया था। एस्सार ने ग्रीनपीस और महान संघर्ष समिति के ग्रामीणों पर 500 करोड़ का मानहानि तथा चुप रहने का मुकदमा किया हुआ है।
एस्सार ने ग्रीनपीस द्वारा माँगे जा रहे पर्यावरण मंत्री मोईली के इस्तीफे पर भी निषेधाज्ञा लगाने की कोशिश की थी। न्यायालय में उपस्थित ग्रीनपीस की कार्यकर्ता अरुंधती मुत्थू ने बताया कि “एक निजी कंपनी द्वारा केन्द्रीय मंत्री को बचाने की कोशिश करना बेहद संदेहास्पद था। एस्सार द्वारा तेजी से क्लियरेंस बांट रहे वीरप्पा मोईली को बचाने का मतलब अब आसानी से समझा जा सकता है। उन लोगों को पहले से ही उम्मीद थी कि यह क्लियरेंस मिलने वाला है”।
ग्रीनपीस और महान संघर्ष समिति ने माँग की है कि वनाधिकार कानून के उल्लंघन के सबूत के आधार पर इस क्लियरेंस को रद्द किया जाय, साथ ही वो क्लियरेंस के खिलाफ लड़ने के सभी उपायों पर विचार करेगी।