मोटी मोटी बातें
मोटी मोटी बातें
जुगनू शारदेय
याद नहीं कि कभी किसी ने कहा हो कि सरस्वती पूजा के देश में इतनी अशिक्षा क्यों है ? शायद किसी ने कही भी हो – अपना दिमाग भी तो कही सुनी बातों पर ही चलता है । कही सुनी बातों का फायदा यह है कि कुछ मोटी मोटी बातें सूझ जाती हैं , जैसे सरस्वती पूजा के बारे में अपना यह ख्याल । सवाल अशिक्षा का भी नहीं है । प्रश्न तो पढ़े लिखे अनपढ़ों का भी है न । बहुत परेशान करते हैं पढ़े लिखे अनपढ़ । जैसे हमारे कभी के परिचित सुधीर मिश्र बढ़े महान पढ़े लिखे अनपढ़ हैं । बस उनकी एक ही बात जमती है कि “ यह साली जिंदगी ! “
अब यह “ यह साली जिंदगी ! “ है क्या बला । अंग्रेजी में बोलें तो एक लय बनता है कि यह फ्यूजन , कन्फयूजन और कन्क्लयूजन है । कुछ हिंदी अनुवाद करें लय के साथ तो बनता है – मिश्रण , घालमेलन ( यह शब्द मेरा है बिना कॉपी राइट के ) और समापन । यही तो है सरस्वती पूजा की मोटी मोटी बातें ।
कुछ ऐसा नियम कायदा वगैरह वगैरह बना है कि हर राज्य में सरस्वती पूजा से जरा ऊपर की चीज उच्च शिक्षा को बना दिया गया है “ यह साली जिंदगी ! यानी मिश्रण , घालमेलन और समापन ।
उच्च शिक्षा पर हक होता है राज्यपाल जी का । उनको ही हक होता है कि राज्यों के विश्वविद्यालयों में कुलपति की नियुक्ति । राज्य और राज्यपाल
के बीच इस नियुक्ति को लेकर असहमति सी सहमति होती है या सहमति सी असहमति होती है । जो राज्यपाल को बहैसियत कुलाधिपति पसंद आता है , वह राज्य को पसंद नहीं आता । जब कभी कोई नियुक्ति होती है तो उस पर मिश्रण , घालमेलन और समापन का बस्ता का बोझ बना रहता है । अब यह भी तो कुछ मोटी मोटी बातें ही हैं कि किसी भी राज्य का उच्च शिक्षा बिगाड़ दो । अपने आप राज्य का सरस्वती पूजा चंदा उठाओ कमिटी हो कर रह जाएगी । बस यह खेल भी चलता रहता है जिससे पढ़े लिखे अनपढ़ पैदा होते हैं । फिर एक दिन पता चलेगा कि बिना किसी धन के यह खेल धनवादी ही है – मोटी मोटी बातें वाली यह साली जिंदगी ।
यह अपने प्रधानमंत्री को भी बहुत परेशान करता है । अब वह तो कह नहीं सकते कि राजनीति भी या राजपाट भी या राजपाद भी घुमा फिरा कर मोटी मोटी बातें ही हैं । आज कल वह कुछ ज्यादा ही ज्ञान भरी बातें कर रहे हैं । जैसे उन्हें यह बात समझ में आ रही है कि अदालत को राजपाट या राजपाद में बहुत ज्यादा दखल नहीं करना चाहिए । अब यह मोटी मोटी बात कौन प्रधानमंत्री को समझाए कि राजपाट या राजपाद चलाने वाले हो जाते हैं पढ़े लिखे अनपढ़ ही नहीं , नियम कायदा के गुलाम । आखिर उनके राजपाट में तरह तरह के जो करतब हो रहे हैं , वह अदालत का ही भाव बढ़ाता है । मौका कुछ और था , पर बात बड़ी थी कि अटलबिहारी वाजपेयी ने राजधर्म की चर्चा की थी । कहां सूझती है हमारे प्रधानमंत्री को राजधर्म जैसी मोटी मोटी बातें ।


