प्रधानमंत्री #मोदीजी के #बिहार में चुनावी भाषण

जितेंद्र सिंह
पटना। मैंने प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री बनने के पहले भाषण देते देखा है। तब उनके पास मुद्दों, और वायदों की कमी नहीं होती थी, उनके भाषण जोश से भरपूर होते थे, आने वाले सुनहरे दिनों की आशाएं छुपीं होती थीं। वे जनता के दिलों की बातें कहते थे, जनता जो सुनना चाहती थी उनके भाषणों में वही मिलता था।
कांग्रेस के कुछ कर्म ही ऐसे थे, कि मोदीजी के पास हमला करने के लिए ढेरों असलहे होते थे। ढहते हुए कांग्रेस के किले को उन्होंने अकेले अपने भाषणों से ही तोड़ दिया। पर इस बार बिहार वाया दिल्ली आते-आते उनके भाषणों में वो शार्पनेस, एक खास तरह की बात जिसे अंग्रेजी में zing कहते हैं मिस्सिंग है। बिलो द बेल्ट अपने प्रतिद्वंदियों पर पहले भी प्रहार करते थे अब भी कर रहे हैं, यहाँ तक कि लालू जी के बेटे और बेटी पर भी हमला बोला। पर अब यहाँ मामला फंस रहा है और स्थिति हास्यास्पद होती जा रही है।
प्रधानमंत्री पद के स्तर का व्यक्ति अपने स्तर के अनुरूप व्यव्हार और भाषण नहीं दे पा रहा है। केजरीवाल जैसे नौसिखिये नेता से भी वे दिल्ली में कीचड़ मिट्टी वाली होली खेलने से नहीं चूके थे, दिल्ली जीतने के लिए पैसा पानी की तरह बहाया गया, अमित शाह को कमांडर बनाया गया, और ताबड़तोड़ नेताओं की रैलियां सभाएं और मोदीजी की खुद भी सभाओं की कारपेट बोम्बिंग की गयी, पर यहाँ मात मिली।
बिहार के चुनाव में भी यही रणनीति रही। मोदीजी ने करोड़ों के पैकेज की घोषणा की, वायदों की झड़ी लगा दी-हमेशा की तरह, पर यहाँ मुकाबला दो घाघ जमीनी नेताओं से है, वो भी उनकी ही जमीन पर, अब भाषण में हमला करने के लिए वैसा मसालेदार असलहा नहीं है जैसा 2014 में था, जंगलराज जंगलराज कहने का भी कोई असर नहीं हुआ।
नितीश टेफ़लोन कोटेड निकले, उन पर कुछ भी हमला हो वे अपनी काट रखते हैं, और तार्किक तथा गरिमापूर्ण तरीके से जवाब देते हैं।
लालू जी खुद ही कीचड़ में लिपट कर कुरता फाड़ होली खेलने में महारत रखते हैं, चुनाव आयोग उनको कुछ भी कहे, वे अपनी बोलने पर आ गए तो वे भी बोल जायेंगे, चाहे ब्रह्मपिशाच ही क्यों न बोलना पड़े, उनसे जितना उलझेंगे अपना नुक्सान करेंगे।
अब लालू-नितीश की जुगलबंदी में उनके हमले भोथरे होते जा रहे हैं। सभाओं को कारपेट बोम्बिंग अभी भी हो रही है, करीब 25 हेलीकॉप्टरों से भाषणों के लिए लोग उड़ रहे हैं, भाषण देते जा रहे हैं! पर प्रधानमंत्री के भाषणों में वो पहले वाली बात नहीं पैदा हो रही है। इसके मुख्य कारण ये हैं, कि भाषणों का चार्म ख़त्म हो गया। जनता 2013 से लगातार सुनती आ रही है। दूसरी वजह यह है कि वे खुद सत्ता में हैं, इसलिए चैलेंजर का रोल प्ले नहीं कर पा रहे हैं, यह रोल उनकी पर्सनालिटी को सूट करता था।
अपने डेढ़ वर्षों के शासन की उपलब्धियों का बखान अपने भाषणों में भी भी नहीं कर पा रहे हैं, अगर कुछ ठोस उपलब्धियां होती तो काफी बेहतर होता, और फ्यूचर टेन्स में हम ये कर देंगे, हम वो कर देंगे अपने भाषणों में कहने पर बिहार की सयानी जनता यकीन नहीं करती है, साफ़ कहती है डेढ़ साल से देखे हैं, आप क्या किये हैं?
जितेंद्र सिंह, वरिष्ठ पत्रकार हैं।