मोदी गेट- बहती रहेगी भ्रष्टाचार की गंगा
मोदी गेट- बहती रहेगी भ्रष्टाचार की गंगा
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सरकार एक वर्ष के कार्यकाल में ही भ्रष्टाचार के आरोपों में घिर गई है। भाजपा के चार बड़े नेता विवादों के घेरे में हैं, लेकिन पूरी भाजपा और केंद्र सरकार न सिर्फ इन नेताओं के बचाव में खड़ी है, बल्कि कुतर्क भी कर रही है।
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज द्वारा आईपीएल के पूर्व कमिश्नर ललित मोदी की मदद को लेकर सवालों के घेरे में हैं। जहां विपक्ष सुषमा को इस मुद्दे पर घेर जा रहा है, वहीं भाजपा उनकी मदद में खड़ी हुई है।
यह मामला तब प्रकाश में आया जब लंदन के संडे टाइम्स अखबार ने एक खबर छापी कि सुषमा ने ललित मोदी को पत्नी के इलाज के लिए डेनमार्क भेजने के लिए सांसद कीथ वाज से सिफारिश की थी। इसके बाद लेबर पार्टी के सांसद कीथ वाज ने ही वीजा-इमिग्रेशन विभाग की मुखिया सारा रैप्सन को चिट्ठी लिखकर ललित मोदी के मसले को जल्द से जल्द निपटाने को कहा था और अपनी चिट्ठियों में सुषमा स्वराज का नाम लेकर दबाव भी बनाया था।
भाजपा का तर्क है कि सुषमा ने ललित मोदी की मदद मानवीय आधार पर की। लेकिन यह थोथा तर्क है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सुषमा की बेटी बांसुरी स्वराज उस टीम का हिस्सा थीं, जिसने उच्च न्यायलय में ललित मोदी के पासपोर्ट का केस लड़ा और जीता था।
सुषमा स्वराज को लेकर विवाद थमा भी नहीं था कि इस विवाद में राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया भी घिर गईं।
हंगामा मचने के बाद ललित मोदी के वकील ने कुछ दस्तावेज जारी किए जो साफ जाहिर करते थे कि राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने ललित मोदी की मदद की। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एक पत्र में वसुंधरा ने ललित मोदी को ब्रिटेन में ट्रैवल दस्तावेज प्राप्त करने के लिए उनके प्रार्थनपत्र पर हस्ताक्षर कर समर्थन किया था। बयान में लिखा था - 'सिविल लाइंस 13 जयपुर, राजस्थान, भारत से मैं वसुंधरा राजे। मैं यह बयान ललित मोदी के लिए किसी भी इमिग्रेशन एप्लिकेशन के समर्थन में दे रही हूं, लेकिन इसके लिए एक सख्त शर्त है कि इंडियन अथॉरिटीज को पता नहीं चलना चाहिए।‘
मॉडल से अभिनेत्री और अभिनेत्री से मंत्री बनीं, मोदी सरकार में नंबर दो की हैसियत रखने वाली स्मृति ईरानी का पुराना विवाद फिर सतह पर आ गया, जब दिल्ली की एक अदालत ने उनकी डिग्रियों के संबंध में चुनाव में दिए गए हलफनामों में अंतर को देखते हुए मामले को सुनवाई के योग्य माना।
भाजपा के दिवंगत नेता गोपीनाथ मुंडे की पुत्री और महाराष्ट्र की मंत्री पंकजा मुंडे भी भ्रष्टाचार के आरोपों में घिर गईं। उन पर टेंडर आमंत्रित किए बिना 206 करोड़ रुपए के खरीद संबंधी आदेश देने के आरोप हैं।
इन सारे घोटालों पर गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने बड़ी दिलचस्प टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यह एनडीए सरकार है, यूपीए सरकार नहीं, यहां इस्तीफे नहीं होते। अगर राजनाथ सिंह के बयान का सीधा मतलब निकाला जाए तो साफ है कि चाहे भाजपा नेताओं के जो भी घोटाले/ काले-कारनामे सामने आएं, भाजपा उनके साथ खड़ी रहेगी और भ्रष्टाचार की गंगोत्री निर्बाध गति से बहती रहेगी। भाजपा, यूपीए की तरह आरोपों पर त्यागपत्र देने की नैतिकता नहीं दिखाएगी। हालांकि भाजपा से वैसे भी नैतिकता की कभी उम्मीद नहीं रही, लेकिन राजनाथ ने स्पष्ट कर दिया कि भाजपा पूरी निर्लज्जता के साथ भ्रष्टाचारियों के साथ खड़ी रहेगी।
मजे की बात यह है कि आरोपों के घेरे में सबसे पहले जो भाजपा नेता आए हैं, उनमें चारों महिलाएं हैं और इत्तेफाक यह है कि स्मृति ईरानी को छोड़कर तीनों को मोदी विरोधी खेमे का माना जाता है। सुषमा स्वराज मोदी से पहले भाजपा में प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार थीं, जिनको लालकृष्ण आडवाणी और बाल ठाकरे का समर्थन प्राप्त था, तो वसुंधरा राजे सिंधिया भी पहले मोदी को चुनौती देती रही हैं। जबकि पंकजा मुंडे उन गोपीनाथ मुंडे की पुत्री हैं, जो भाजपा के बड़े ओबीसी चेहरा थे और यदि उनकी असमय मृत्यु न हुई होती तो मोदी की पसंद के विरुद्ध वह महाराष्ट्र में भाजपा के मुख्यमंत्री पद के दावेदार होते। स्वयं पंकजा को भी महाराष्ट्र की राजनीति में मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में देखा जा रहा है।
इन घोटालों के आरोपों को लेकर जहां यह कयास लगाए जा रहे हैं कि इनके पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नज़दीकियों का हाथ है, जो एक तीर से कई शिकार कर रहे हैं। एक तरफ तो वे पार्टी में मोदी विरोधियों को घेर रहे हैं तो दूसरी तरफ मजबूती से इन आरोपियों के साथ खड़े होकर यह एहसान जता रहे हैं कि मोदी और पार्टी उनके बुरे समय में भी उनके साथ खड़ी है। इस रणनीति का फायदा मोदी कैम्प को यह है कि जब मोदी धड़े के लोगों के घोटाले खुलेंगे (जो देर-सवेर खुलने ही हैं) तो मोदी विरोधी धड़े पर यह दबाव बना रहेगा कि तुम्हारे मामले जब सामने आए थे, तो हम तुम्हारे साथ ते, इसलिए खामोश रहो।
ऐसी मिलती-जुलती संभावना जताने वालों में खुद भाजपा नेता भी शामिल हैं। भाजपा सांसद कीर्ति आजाद ने ललित मोदी विवाद को लेकर वित्त मंत्री अरुण जेटली पर हमला बोला है। कीर्ति आजाद का बयान मीडिया में तैर रहा है जिसमें उन्होंने कहा है कि जब आईपीएल घोटाले हो रहे थे उस वक्त क्या कर रहे थे जेटली उन्होंने घोटाले को क्यों नहीं रोका? कीर्ति आजाद का वक्तव्य साफ इशारा कर रहा है कि भ्रष्टाचार की गंगा में सुषमा या राजे ही नहीं डुबकी नहीं लगा रही हैं, बल्कि इस गंगा में भाजपा का उच्च नेतृत्व भी डूबा हुआ है।
भाजपा में अंदरूनी षडयंत्र जोर-शोर से जारी हैं, इसका अंदेशा भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने भी जताया है। शिवसेना के मुखपत्र सामना में छपे लेख में कहा गया है-
स्वच्छता एवं जल आपूर्ति विभाग के मंत्रई बबनराव लोणीकर की फर्जी डिग्री के मामले से घोटालों के मुहूर्त का नारियल फूटा। उसके बाद स्कूली शिक्षा मंत्री विनोद तावड़े की डिग्री के मामले में तूफान खड़ा हुआ। साफ है कि इतनी नाजुक और गोपनीय बात सतह पर लाकर मंत्रियों को अड़चन में डालने वाले उनके निकटवर्ती ही होने चाहिए। पकंजा मुंडे का 'चिक्की' मामला भी सामने आया है। इनमें से विनोद तावडे और पकंजा मुंडे दोनों भविष्य में मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे, इस सत्य को स्वीकारा जाए तो इन लफड़ों को बाहर निकालकर दोनों पर अंकुश लगाने की राजनीति निश्चित तौर पर खेली गई है।
अगर गौर करें तो भाजपा में अंदरूनी कलह सरकार बनने के कुछ दिन के अंदर ही सतह पर आ गई थी, जब राजनाथ सिंह के खिलाफ मोदी के नजदीकी एक केंद्रीय मंत्री पर षडयंत्र रचने के आरोप लगे थे, उस समय राजनाथ सिंह ने फ्रंट पर आकर मजबूती से दावं खेला, वरना मोदी के नजदीकियों ने उन्हें निपटा ही दिया होता। राजनाथ ने मोदी खेमे को बैक टू पैवेलियन होने पर मजबूर कर दिया था और पार्टी व सरकार दोनों को अपना स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा था।
बहरहाल, यह भ्रष्टाचार के आरोप चाहे अंदरूनी झगड़ों की वजह से हों या अपने आप सतह पर आ गए हों, लेकिन आरोप तो लग ही रहे हैं। जाहिर है कि यदि भाजपा में जरा सी भी नैतिकता होती वह इन नेताओं को पद से हटाती, जैसी कि भाजपा के मार्गदर्शक लाल कृष्ण आडवाणी ने कहा कि वह होते तो इस्तीफा दे देते। एक इंटरव्यू में उन्होंने याद दिलाया कि हवाला कांड में नाम आने पर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तुरंत इस्तीफे के हक में नहीं थे। उसके बावजूद उन्होंने फैसला किया।
लेकिन वो लोग बड़े मासूम हैं, जो मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के लोगों से नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र की मांग कर रहे हैं। पहले भी मोदी ने कब नैतिकता दिखाई है ? और अब तो गृह मंत्री भी स्पष्ट कर चुके हैं कि किसी भी नैतिकता की आशा भाजपा से न की जाए।
अमलेन्दु उपाध्याय


