मोदी जी, गायों के धंधे की सबसे बड़ी दुकान तो आपकी ही रही है
मोदी जी, गायों के धंधे की सबसे बड़ी दुकान तो आपकी ही रही है
मोदी जी, गायों के धंधे की सबसे बड़ी दुकान तो आपकी ही रही है
गौरक्षकों को वैधानिकता देना खतरनाक
महेंद्र मिश्र
मोदी जी, गायों के धंधे की सबसे बड़ी दुकान तो आपकी ही रही है। आप स्मृति दोष के शिकार हैं। या फिर सब कुछ जानते हुए भूलने का नाटक कर रहे हैं। आप तो प्रचारक रहे हैं। संघ और उसके आनुषंगिक संगठनों की पूरी कार्यप्रणाली और उनकी भूमिका से परिचित हैं। बगैर कोई लिखित दस्तावेज और सदस्यता के इतना बड़ा संगठन कैसे चल रहा है। यह आप बखूबी जानते हैं। उसकी नस-नस से आप वाकिफ हैं। उसकी सोच और समझ के साथ ही आप पले-बढ़े हैं।
बहरहाल मैं उसके विस्तार में नहीं जाना चाहता।
प्रधानमंत्री होने के नाते मेरा आप से और आपके काम से मतलब है। जब कोई शख्स प्रधानमंत्री बनता है तो उसकी कोई पार्टी नहीं रह जाती। न ही उसका कोई संगठन रह जाता है। उसकी विचारधारा उसके कर्तव्यों के राह का रोड़ा नहीं बनती। और आम जनता का हित उसके लिए सर्वोपरि हो जाता है। राजधर्म ही उसका असली धर्म हो जाता है।
आपके शासन में आने के साथ गौआतंक का जो सिलसिला शुरू हुआ। दो साल बीतते-बीतते वह सारी सीमाएं पार कर गया। कई निर्दोष लोग इस आतंक की भेंट चढ़ गए। लेकिन आपने अपना मुंह खोलना गवारा नहीं समझा।
अब जब गौआतंक की आंच आपकी कुर्सी तक पहुंची। तब आप नींद से जागे। देश के भीतर वोट के नुकसान और दुनिया में साख पर बट्टे के खतरे ने जुबान खोलने के लिए मजबूर कर दिया।
लेकिन आपकी गौरक्षकों की परिभाषा से मुझे सख्त एतराज है।
80 और 20 का जो आंकड़ा आपने दिया है वह कहां से आया है। इसको आप ही जाने। यह बुनियादी सोच ही मुझे समस्याग्रस्त दिखती है। और मैं उससे इत्तफाक नहीं रखता। यह पूरी सैद्धांतिकी और परिभाषा नागरिक समाज के बुनियादी मूल्यों और मान्यताओं का उल्लंघन करती है।
चलिए आपने कहा कि 80 फीसदी गुंडे हैं, जो गौरक्षा की आड़ में धंधा कर रहे हैं। यानी 20 फीसदी को आप सही मान रहे हैं। और उन्हें आप असली गौरक्षक मानते हैं।
क्या सरकारी तौर पर गैरआधिकारिक तरीके से किसी समूह या जमात को इस तरह की मान्यता दी जा सकती है?
कोई एक स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज क्या इसकी इजाजत देगा?
गौरक्षा की क्या कोई ठेकेदारी दी जा सकती है?
और केवल गायें ही क्यों किसी की भी रक्षा के लिए इस तरह से किसी को ठेकेदारी दी जा सकती है?
एक नागरिक समाज में आधिकारिक तौर पर लोगों के (वह इंसान हो या कि जानवर) रक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ पुलिस और प्रशासन की है। इससे इतर किसी को इस तरह का अधिकार देना लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर करना है। समाज को अराजकता की तरफ ले जाना है। या फिर अंत में फासीवाद के लिए जमीन तैयार करना है।
इसलिए एकबारगी कोई गौ सेवक तो हो सकता है। गौरक्षक कत्तई नहीं। क्योंकि उसे किसी भी तरह का अधिकार हासिल नहीं है।
राह चलते किसी व्यक्ति या वाहन की तलाशी लेने का उसे कैसे अधिकार हो सकता है। यह काम तो सिर्फ और सिर्फ सरकारी महकमे से जुड़े लोग कर सकते हैं। किसी को मारने-पीटने के बारे में तो सोचा भी नहीं जा सकता है। यह अधिकार पुलिस तक को हासिल नहीं है। वह भी किसी आरोपी पर बल का प्रयोग नहीं कर सकती है।
इसलिए अगर इस कानूनी व्यवस्था से अलग कोई किसी दूसरी व्यवस्था के अस्तित्व को देखता है। तो यह सोच ही संविधान विरोधी है।
ऐसे में अगर आप में अपनी कुर्सी और उसकी मर्यादा का थोड़ा भी ख्याल है तो कम से कम गौरक्षकों के नाम पर चल रहे सारे संगठनों को तत्काल अवैध करार दीजिए।
क्योंकि गौरक्षकों की पूरी 100 फीसदी जमात ही अवैध है और कानून विरोधी है।
दूसरी सबसे गंभीर बात जिसकी ओर हम इशारा करना चाहते हैं। वह देश की एकता और समाज में भाईचारे के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
दलितों से पहले गौरक्षकों के आतंक का निशाना मुस्लिम तबका बना है।
और इसी तरह के हमले में दादरी में आखलाक और झारखंड में दो युवकों को अपनी जान गवानी पड़ी। लेकिन आप चुप्पी साधे रहे।
और जब सवर्ण बर्चस्व की ताकतों ने दलितों पर हमला करना शुरू किया और आपको अपना वोट बिगड़ता दिखा। तब आपने जबान खोली। जिसमें सीधे तौर पर जानबूझ कर और पूरे होशो-हवास में मुस्लिम तबके का जिक्र नहीं किया। जबकि वह समुदाय इस मामले में दलितों से भी ज्यादा पीड़ित है। आपने उन्हें पूरी तरह से दरकिनार करने की कोशिश की।
क्या आप पूरे देश के प्रधानमंत्री नहीं हैं?
या फिर मुसलमानों को अपनी जनता नहीं मानते? क्या इसके जरिये आप कथित गौरक्षकों को उन पर हमले के लिए नहीं उकसा रहे हैं? या संदेश दे रहे हैं कि मुसलमानों पर हमला किया जा सकता है दलितों पर नहीं?
राजधर्म का पालन करने वाला क्या कोई प्रधानमंत्री ऐसा कर सकता है?
ऐसे में एक तरफ आप हमले को रोकने की बात कर रहे हैं दूसरी तरफ उसको हवा दे रहे हैं। दोनों चीजें एक साथ कैसे हो सकती हैं।
और इससे भी आगे प्रधानमंत्री होने के नाते आप देश के सबसे शक्तिशाली शख्स हैं। आपका खुद के मुकाबले किसी दूसरे को ज्यादा मजबूत दिखाना। भारतीय राज्य व्यवस्था की तौहीन है।
वैसे तो ताकत की बात आने पर आप और आपके लोग इंची और टेप लेकर खड़े हो जाते हैं। लेकिन इस तरह के मौकों पर जहां असल में उसकी जरूरत है आप आत्मसमर्पण करते दिखते हैं।
ऐसा नहीं है कि आप भोले हैं और अपनी ताकत के बारे में आपको अंदाजा नहीं है।
आप जानते हैं कि एक इशारे पर देश के सारे कथित गौरक्षक बिल में घुस जाएंगे। और फिर आपकी इच्छा न होने तक उसी में दुबके रहेंगे। लेकिन आपको ऐसा नहीं करना है। क्योंकि उनकी आपको जरूरत है। अभी जनता के लिए आपने बयान जारी कर दिया है। जिससे कोई यह न कह सके कि गौआतंकियों के तांडव पर पीएम चुप थे। और कल जब उनकी जरूरत होगी तो फिर वो सक्रिय कर दिए जाएंगे।
वरना अगर सही में आप ईमानदार होते और इससे व्यथित होते तो इस तरह की बयानबाजी की जरूरत नहीं पड़ती। सिर्फ एक इशारे की दरकार थी और सत्ता का तंत्र सबको उनका दायरा बता देता। लेकिन हकीकत यह है कि आपको प्रचार ज्यादा करना है और काम कम।
लिहाजा आपने इस रास्ते को चुना।
मोदी जी भावुकता अगर राजनीति से प्रेरित हो तो वह द्रवित करने की जगह हास्य और विनोद का माहौल ज्यादा पैदा करती है। आपके मामले में यह सौ फीसद सच है। क्योंकि वह समय सापेक्ष होती है।
आपको उत्तर प्रेदश और पंजाब समेत आगामी चुनावों में नुकसान का अंदेशा हुआ तो आप भावुक हो गए।
ऐसी कोरी भावुकता से कुछ लोग भले ही झांसे में आ जाएं। लेकिन देश का एक बड़ा हिस्सा आपकी शख्सियत से वाकिफ हो गया है।
अनायास नहीं है कि कुछ छिटपुट कट्टरपंथी संगठन भले ही एतराज जता रहे हों। लेकिन आप के पितृ संगठन आरएसएस और उसके बगलगीरों को आपके इस बयान पर कोई एतराज नहीं है। क्योंकि वह भी वक्त की जरूरत को समझ रहे हैं।
हालांकि अपने समर्थकों के बीच साख न गिरे इस लिहाज से उसने भी कहा है कि प्रधानमंत्री जी इस बयान से बच सकते थे । यानी ये किसी भी गौरक्षक को असामाजिक तत्व या गुंडा नहीं मानते हैं ।
बात चल ही पड़ी है तो लगे हाथ इस बात को भी साफ कर दीजिए।
जातीय व्यवस्था के बारे में आपकी क्या राय है? इसको बनाए रखना चाहते हैं या फिर खत्म करने के हिमायती हैं? देश में गांधी से लेकर अंबेडकर और नेहरू से लेकर सुभाष और लोहिया तक सब इसके खात्मे के पक्ष में थे।
ऐसे में आपकी अपनी व्यक्तिगत राय क्या है? वह देश को जरूर जानना चाहिए।
इसको बनाए रखने का मतलब है उससे जुड़े शोषण और उत्पीड़न के पक्ष में खड़ा होना। जातीय व्यवस्था और शोषण उत्पीड़न एक दूसरे के पर्याय हैं। लिहाजा एक के रहते दूसरे को खत्म नहीं किया जा सकता है। और अगर कोई जाति व्यवस्था के रहते उत्पीड़न को खत्म करने की बात कहता है तो वह जबानी जमा खर्च से ज्यादा कुछ नहीं है।
सही मायने में समाज में छुआछूत और जातीय भेदभाव को मिटाना है तो उत्पीड़न और शोषण पर खड़े जातीय व्यवस्था के पूरे ढांचे को खत्म करना होगा। क्या प्रधानमंत्री जी इसके लिए तैयार हैं?


