मोदी जी फिर मत कहिएगा कि देश नहीं बदल रहा है
महेंद्र मिश्र
मोदी सरकार का एक और फर्जी कारनामा सामने आया है। यह मुंह के बल गिर चुकी महत्वाकांक्षी योजना जन-धन से जुड़ा है।
बेभाव खुले इन ज्यादातर खातों में रकम पहले दिन से ही नदारद थी, क्योंकि न तो इन गरीब खाताधारियों के पास पैसा है और न ही लेन-देन की क्षमता या उसकी जरूरत। अब जब सरकार की किरकिरी होनी शुरू हुई और खातों की असलियत सामने आने लगी, तो सरकार नींद से जागी।

ऊपर से गैर आधिकारिक स्तर पर आला अफसरों को उनमें कुछ रुपये डालने के निर्देश दे दिए गए।

उसका नतीजा यह निकला कि सिफर रकम वाले ज्यादातर खातों में अब एक रुपये जमा दिख रहे हैं। कुछ में यह रकम 2 से 10 रुपये के बीच भी है।
दरअसल हुआ यह कि निचले स्तर पर बैंकों के आला अधिकारियों ने इन खातों में अपनी जेब से या फिर ब्रांच में मौजूद किसी अन्य मद से निकाल कर पैसे डाल दिए। फिर क्या था, सिफर रकम वाले खातों की जो तादाद सितंबर 2014 में 76 फीसदी थी, अगस्त 2015 में घटकर 46 फीसदी हो गई। उसके बाद अगस्त 2016 में यह आंकड़ा 24.35 फीसदी पर आ गया। जिससे जनधन योजना का मर्सिया शुरू हो गया और वह कोमा में चली गई थी। सरकार ने उसे एक रुपये में बचा लिया।
इसका खुलासा इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में हुआ है। जिसने आरटीआई के जरिये ये सारे आंकड़े हासिल किए हैं।
सवाल यही है कि यह बात कितनी जायज है और जो चीज हकीकत में है ही नहीं, सरकार उसे दिखाने का प्रयास कर रही है।

इस तरह की फर्जी आंकड़ेबाजी से भला क्या हासिल होना है?
ऊपर से सरकारी मशीनरी और अफसरान को आप गलत काम करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। अगर आप किसी एक मामले में गलत करवा रहे हैं तो फिर दूसरे में उन्हें गलत करने से कैसे रोक सकते हैं? और इन सारी कवायदों से भला जनता को क्या लाभ? जनता और उसकी भलाई के लिए सरकार होती है या फिर संसाधनों के व्यक्तिगत इस्तेमाल के लिए? सरकार जनता की जरूरत के लिए बनाई गई है या फिर जनता को सरकार के लिए बनाया गया है? सरकार का अपने आप में कोई वजूद नहीं होता है। जनता है तो सरकार है। उसकी भूमिका जनता के लिए एक साधन मात्र के तौर पर होती है।
सरकार ने अपनी हरकतों से इन सभी बुनियादी प्रस्थापनाओं को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।

अफसरों की इस नायाब खोज पर तमाम तरह के सवाल भी उठ रहे हैं।
मसलन खाताधारक की बगैर जानकारी के कोई कैसे उसके खाते में पैसा डाल सकता है? यह कुछ और नहीं बल्कि उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है और अपने खाते के स्वतंत्र संचालन के उसके बुनियादी अधिकार पर हमला भी। इस तरह से तो कल कोई अपने काले धन को छुपाने के लिए भी इस रास्ते का इस्तेमाल कर सकता है या नहीं?
दिलचस्प बात यह है कि बैंकों में ऊपर के आला अधिकारी अब इससे पल्ला झाड़ रह रहे हैं। उनका कहना है कि उन्हें इसकी कोई जानकारी ही नहीं है और अगर ऐसा कुछ हुआ है तो मामले की जांच करेंगे और दोषियों को सजा दी जाएगी।
बहरहाल वादे के मुताबिक 15 लाख न सही सरकार अब कम से कम एक रुपये देने का दावा तो कर ही सकती है।
यह हिंदुस्तान है। मोदी जी का भारत। बिल्कुल अलहदा। और किस तरह का बदलाव आप देश में चाहते हैं? और हां फिर मत कहिएगा कि देश नहीं बदल रहा है।