Unemployed in Modi Raj

भारत को रोजगार के मोर्चे पर गहराते संकट का सामना करना पड़ रहा है। लेबर ब्यूरो द्वारा कराए गए ताजा रोजगार-बेरोजगारी (ईयू) सर्वे के अनुसार, भारत में बेरोजगारी अपने पांच वर्ष के शिखर पर चल रही है। पंद्रह वर्ष या उससे अधिक आयु के श्रम शक्ति में आने वालों में, 5 फीसद बेरोजगार हैं। काम में लगे लोगों में एक-तिहाई, एक साल से कम अवधि से काम पर हैं। 2011 की जनगणना के आंकड़ों के हिसाब से, 15 वर्ष से अधिक आयुवालों के 5 फीसद का अर्थ होता है, 2.3 करोड़ लोग। पुन: 35 फीसद अर्द्ध-बेरोजगारों का मतलब होता है, करीब 16 करोड़ लोग।

यह ताजा सर्वे उद्योगों में रोजगार पर श्रम ब्यूरो के ही एक और सर्वेक्षण के रुझान में सामने आए रुझान की पुष्टि करता है। यह ब्यूरो आठ श्रम सघन उद्योगों में रोजगार के रुझानों पर हर तिमाही पर सर्वे करता है।

इस सर्वे में आने वाले उद्योग हैं-कपड़ा, चमड़ा, धातु, ऑटो, जवाहरात व आभूषण, परिवहन, सूचना प्रौद्योगिकी, हथकरघा तथा पावरलूम। 2015 की जुलाई-सितंबर की तिमाही में इस सर्वे के अनुसार इन उद्योगों में सिर्फ 1,34,000 रोजगार पैदा हुए थे। यह संख्या, 2009 से 2011 तक की हरेक तिमाही में 3 लाख रोजगार पैदा होने के मुकाबले बहुत घटकर है।

मोदी सरकार सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि के जो बढ़े-चढ़े दावे कर रही है, वे सिर्फ रोजगारहीन विकास को ही दिखाते हैं।

यह इस तथ्य से भी साफ हो जाता है कि 2012-13 और 2015-16 के बीच, सकल घरेलू उत्पाद में हर एक फीसद की बढ़ोतरी पर, रोजगार में सिर्फ 0.20 फीसद की बढ़ोतरी हो रही थी।

रोजगार पैदा करने में विफलता, मोदी सरकार की अब तक की सबसे बड़ी विफलता है।

भाजपा ने अपने चुनाव घोषणापत्र में वादा किया था कि युवाओं के लिए हर साल एक करोड़ की दर से, पांच साल में पांच करोड़ नये रोजगार पैदा किए जाएंगे। लेकिन, नये रोजगार का दूर-दूर तक अता-पता ही नहीं है। ‘मेक इन इंडिया’ का मोदी का प्रिय नारा, बड़ी तेजी से एक खोखला नारा साबित हो रहा है। वित्त मंत्री के सारे अतिरंजित दावों के बावजूद, सार्वजनिक निवेशों में शायद ही कोई बढ़ोतरी देखने में आयी है। निजी क्षेत्र के निवेश बहुत निचले स्तर पर बने हुए हैं। औद्योगिक उत्पादन लगातार गिरावट पर है। जुलाई और अगस्त के महीनों में औद्योगिक उत्पादन सूचकांक में (पिछले साल के इन्हीं महीनों की तुलना में) क्रमश: 2.5 तथा 0.7 फीसद की गिरावट दर्ज हुई है।

मोदी सरकार की नीतियां रोजगार में बढ़ोतरी को रोकने का ही काम कर रही हैं। पिछले तीन बजटों में केंद्र सरकार के वास्तविक आवंटनों में, सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि जितनी बढ़ोतरी भी नहीं हुई है। सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात के रूप में सरकार का व्यय गिरावट पर है और इसका रोजगार तथा मांग के निर्माण पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है।

मोदी सरकार ने अपने पहले दो वर्षों में मनरेगा तथा ग्रामीण विकास के लिए आवंटनों में कटौती की थी। उसने अप्रत्यक्ष कर बढ़ाए हैं, जो सकल घरेलू उत्पाद की गणना बाजार भाव पर किए जाने की सूरत में, जैसाकि इस समय हो रहा है, वृद्धि दर को कृत्रिम तरीके से बढ़ाने का भी काम करते हैं। इन दोनों ही कारकों ने अवाम के हाथों में क्रय शक्ति में बढ़ोतरी को सीमित किया है।
याद रहे कि इस अवाम के हाथों में क्रयशक्ति से ही, श्रम सघन मालों की ज्यादा मांग आती है, न कि अमीरों के हाथों में क्रय शक्ति से।
रोजगार में बढ़ोतरी पर अंकुश लगाने के लिए, मोदी सरकार की नवउदारवादी निष्ठा तो, अनमनीय श्रम कानूनों को ही जिम्मेदार ठहराती है। इस तरह, रोजगार पैदा करने के बजाए अब यह सरकार, श्रम कानूनों के तमाम श्रम व रोजगार-हितैषी प्रावधानों को ही मिटाने और उनकी जगह पर दमनकारी मजदूरविरोधी प्रावधान बैठाने की ही कोशिशों में लगी हुई है।

गहराते कृषि संकट के साथ जुड़कर यह बढ़ती बेरोजगारी, जनसंतोष तथा सामाजिक तनावों के भड़कने की ओर ही ले जा रही है।

रोजगार तथा शिक्षा की मांग को लेकर गुजरात में पाटीदारों का आंदोलन, हरियाणा में जाटों, महाराष्ट्र में मराठों तथा आंध्र प्रदेश में कापुओं के आंदोलन, इसी के उदाहरण हैं।

ये सब इसी के लक्षण हैं कि किस तरह बहुत ही कम उत्पादक रोजगार पैदा हो रहा है और इसके चलते, इकलौते सरकारी क्षेत्र में उपलब्ध सुरक्षित नौकरियों के लिए कितनी भारी मांग है।

इसलिए, यह जरूरी हो गया है कि इस मोदी सरकार की रोजगारघाती नीतियों का मुकाबला किया जाए और उनकी जगह पर ऐसी वैकल्पिक नीतियां लागू करने की मांग की जाए, जो कृषि के विकास में नयी जान डालने के जरिए रोजगार पैदा करें, अर्थव्यवस्था में मांग को बढ़ाएं और श्रम सघन उद्योगों के विकास को उत्प्रेरित करें।

प्रकाश कारात

बढ़ती बेरोजगारी, पीएसयू का निजीकरण और युवाओं की भविष्य की भूमिका | hastakshep | हस्तक्षेप