मोदी-राहुल और केजरीवाल तीनों ही नहीं हैं 'बेस्ट'!
मोदी-राहुल और केजरीवाल तीनों ही नहीं हैं 'बेस्ट'!
श्री राम तिवारी
आगामी लोकसभा चुनाव ज्यों-ज्यों नजदीक आते जा रहे हैं, त्यों-त्यों लगातार मीडिया प्रायोजित सर्वे में भावी प्रधान मंत्री हेतु- नरेंद्र मोदी अव्वल, अरविन्द केजरीवाल दूसरे और राहुल गांधी तीसरे नम्बर पर आम जनता की पसंद बताये जा रहे हैं। कहीं-कहीं कभी-कभार लाल कृष्ण आडवाणी, शिवराज सिंह, नीतीश, मुलायम, शरद पंवार, नंदन निलेकणि या किसी अन्य व्यक्ति विशेष को भी इन तथाकथित सर्वे में भारत के भावी प्रधानमंत्री पद का सपना देखने को उकसाया जा रहा है। डॉ. मनमोहन सिंह की, सोनिया गांधी की या किसी अन्य कांग्रेसी की नेतृत्वकारी भूमिका की अब कोई चर्चा नहीं करता। आगामी लोक सभा चुनाव उपरान्त केन्द्र सरकार के गठन और उसके मुखिया यानी प्रधानमन्त्री के चयन में जिस तीसरे मोर्चे की सबसे अहम भूमिका होगी उसकी- या जो वास्तव में 2014 के संसदीय चुनाव उपरान्त भारत का प्रधानमंत्री बनेगा- उसकी चर्चा अभी तक तो बहुत कम ही हो रही है।
अपवाद स्वरुप सिर्फ वाम मोर्चा ही है जो व्यक्तिवादी सोच से परे विशुद्ध प्रजातांत्रिक तौर-तरीके से सभी गैर कांग्रेसी और गैर भाजपाई पार्टियों को एकजुट करने का सतत् प्रयास करता रहा है। विगत दो दशक से निरंतर वाम मोर्चे ने तीसरे मोर्चे को न केवल 'रूप-आकार' देने में- एकजुट करते हुये बल्कि 'सार रूप' में भी हमेशा नीतियों के बदलाव की भी बात की है। वाम मोर्चे की अगुआई में ही दिल्ली में सम्पन्न 11 दलों का सम्मेलन- केवल आगामी लोक सभा चुनाव में अपनी संसदीय ताकत को बढ़ाने तक ही सीमित नहीं है बल्कि देश को सही नेतृत्व देने-महँगाई-भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने, अमीर-गरीब के बीच बढ़ रही खाई को कुछ कम करने, साम्प्रदायिक उन्माद पर रोक लगाने, वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारत की गरिमापूर्ण उपस्थिति हेतु प्रयास करने के साथ-साथ अन्य और भी महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किये हैं। वाम दलों- सीपीआई <एम्>, सीपीआई, सपा, जदयू, जदएस, एआईडीएमके, बीजद, असम गण परिषद्, आरएसपी, फॉरवर्ड ब्लॉक तथा झारखंड विकास मोर्चा इत्यादि दलों ने अपनी बैठक में निर्णय लिया है कि वर्तमान चालू सत्र में संप्रग सरकार द्वारा प्रस्तुत बिलों को देश हित में ही पारित करायेंगे। संसद को सत्तारूढ़ पार्टी कांग्रेस और प्रमुख विपक्षी दल भाजपा का 'चुनावी लांचिंग पैड' नहीं बनने देंगे। कोई भी बिल बिना चर्चा के हो-हल्ले या अँधेरे में पारित नहीं होने दिया जायेगा तीसरे मोर्चे में मायावती, ममता इत्यादि भी शामिल होना चाहते हैं किन्तु मायावती को सपा से और ममता को माकपा से परेशानी है इसलिये उन्हें अभी तो इस अलायंस में आमंत्रित ही नहीं किया गया।
भाजपा के पीएम इन वेटिंग- नरेंद्र मोदी, 'आप' के अरविन्द केजरीवाल और कांग्रेस के राहुल गांधी- ये तीनों ही शख्स सकारात्मक सोच में या शैक्षणिक योग्यता में जब सीधे सादे डॉ. मनमोहनसिंह के घुटनों तक भी नहीं आते तो वाम मोर्चे के क्रांतिकारी सोच वाले, ईमानदार छवि वाले, दिग्गज कामरेडों के समक्ष या नीतिश कुमार, शरद यादव, नवीन पटनायक, मुलायम सिंह या जयललिथा जैसे खुर्राट नेताओं के सामने ये क्या खाक टिक पायेंगे। राजनीति से बाहर देश के सभ्य समाज में तो सैकड़ों नहीं हजारों ऐसे हैं जो इन अधकचरे- अपरिपक्व नेताओं यानी मोदी, केजरीवाल और राहुल से कई गुना बेहतर राजनैतिक सूझ- बूझ और नीतिगत समझ रखते हैं। लेकिन भारत का जन-मानस खंडित होने से एकजुट नहीं हो पाता। इसी- लिये जनादेश भी खंडित मिलने की पूरी सम्भावनाएं निरन्तर मौजूद हैं। भारत का आम आदमी- वर्तमान व्यवस्था से इतना उकता चुका है कि वर्तमान विनाशकारी नीतियों को नहीं बदल पाने की कुंठा में केवल एक- दो नेताओं को ही बदलते रहने के सनातन विमर्श में फिर से उलझ गया है। यही वजह है कि विभिन्न सर्वे में नीतियों-कार्यक्रमों, मूल्यों या सिद्धांतों पर नहीं व्यक्ति विशेष या नेता विशेष पर मीडिया का फोकस जारी है।
सर्वे में उभारे जा रहे इन तीन नामों- मोदी, अरविन्द और राहुल से तो डॉ. मनमोहन सिंह ही बेहतर हैं। बेशक-1 के समय चूँकि वामपंथ का बाहर से समर्थन था इसलिये घोर पूँजीवादी-सुधारवादी मनमोहन सिंह को भी तब 'वाम मोर्चे' के दवाव में ही सही मनरेगा, आरटीआई, खद्यान्न सब्सिडी इत्यादि लोकोपकारी निर्णय लेने पड़े। लेकिन संप्रग-2 का कार्यकाल बेहद निराशाजनक ही रहा है। केवल भ्रष्टाचार, मॅंहगाई और रेप ही देश को कलंकित नहीं कर रहे बल्कि और भी गम हैं जमाने में इनके सिवा। जनता ने संप्रग को विगत दिनों सम्पन्न विधान सभा चुनावों में अच्छी नसीहत दी और तब कांग्रेस और उसके नेता नम्बर-दो राहुल गांधी ने कमान अपने हाथ में ले ली। यही वजह है कि विगत दो सप्ताह में संप्रग सरकार ने अनेक लोक लुभावन और वोट-पटाऊ निर्णय लिये हैं। सब्सिडी वाले एलपीजी गेस सिलेंडरों की संख्या- पहले 6 फिर 9 और अब 12 करने, सीएनजी पीएनजी के दाम घटाने, सब्जियों का प्याज का निर्यात् रोकने और रिजर्व बेंक के मार्फ़त मौद्रिक नीतियों में साहस पूर्ण बदलाव करने से निसंदेह महँगाई कुछ कम हुयी सी लगती है। विगत दो सप्ताह से मध्यप्रदेश के मालवा और खास तौर से इंदौर मण्डी में दो रुपया किलो टमाटर और चार रुपया किलो आलू-प्याज के लेवाल नहीं मिल रहे। इंदौर की चोइथराम मंडी से अधिकाँश सब्जियाँ दस रुपया किलो से कम में बिक रहीं हैं। किराना खेरची भाव तो कम नहीं हुये किन्तु थोक में शक्कर, तेल तुअर दाल, चना, गेहूं, मूंग, मोटा अनाज, सोयाबीन और अन्य खाद्द्यान्न के भाव या तो स्थिर हैं या कम हुये हैं।
दूसरी ओऱ संप्रग-2 सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों और सार्वजनिक उपक्रमों समेत तमाम संगठित क्षेत्र के मजदूरों-कर्मचरियों को बम्फर महंगाई भत्ता का अबाध भुगतान किया है। सातवें वेतन आयोग की स्थापना भी कर दी गयी है। इसके परिणाम स्वरूप निजी क्षेत्र में भी मजदूर-कर्मचारियों के वेतन -भत्तों में वृद्धि का जोर दिखने लगा है। अकेले आई टी सेक्टर में ही लगभग 40% युवा अपने वर्तमान रोजगार को महज इसलिये छोड़ने पर आमादा हैं कि उन्हें 30 से 40 % बढ़े हुये वेतन की दरकार है। ये बदलाव केवल वैश्विक या युगांतकारी परिवर्तनों से ही नहीं बल्कि केन्द्र सरकार की तात्कालिक सुधारात्मक क्रियाओं से भी सम्भव हुआ है। यह सच है कि विगत विधान सभा चुनाव में बुरी तरह हार का मुँह देखकर कांग्रेस के खुर्राट नेताओं ने राहुल गांधी के मार्फ़त मनमोहन सिंह पर इन जन-कल्याणकारी नीतियों के अमल का दबाव बनाया होगा। बेशक इन सकारात्मक परिवर्तनों का श्रेय राहुल गांधी को ही दिया जायेगा क्योंकि वे ही कांग्रेस की ओर से भारत के अघोषित 'भावी प्रधान मंत्री' हैं। किन्तु फिर भी देश की अधिसंख्य जनता को राहुल गांधी पर अभी उतना भरोसा तो नहीं है कि उनकी पार्टी कांग्रेस को या संप्रग को रिपीट कर सकें।
मैं सलमान खान के उस वक्तव्य का स्वागत करता हूँ जो उन्होंने मकर संक्रांति के अवसर पर अपनी फ़िल्म 'जय हो' के प्रमोशन के अवसर पर दिया था। जिसमें उन्होंने कहा था कि 'नरेंद्र मोदी गुड मेन हैं' किन्तु जब उनसे पूछा गया कि मोदी प्रधान मंत्री के काबिल हैं या नहीं तो सल्लू मियाँ का जबाब था कि 'देश का प्रधान मंत्री तो 'बेस्ट' मेन ही होना चाहिए'। क्या शानदार जबाब है ! लाजबाब ! उस समय मोदी जी की सूरत जिस-किसी ने भी देखी हो बिलकुल पिटे हुये मोहरे जैसी या चल चुके कारतूस जैसी हो गयी थी। सलमान खान ही नहीं हर देशभक्त और समझदार नागरिक यही चाहेगा कि देश का प्रधानमंत्री ही नहीं, राष्ट्रपति ही नहीं, मुख्य चुनाव आयुक्त ही नहीं, लोकपाल ही नहीं, प्रधान न्यायधीश ही नहीं, बल्कि तमाम प्रमुख पदों पर विराजमान समस्त नेता, अफसर, न्यायविद् और सिस्टम संचालक भी 'बेस्ट' ही हों ! न केवल मोदी, राहुल और केजरीवाल बल्कि जो भी देश का नेतृत्व करेगा उस को भी सिद्ध करना होगा कि वो 'बेस्ट' है।
जो नेता, अफसर और राजनयिक देश और दुनिया का भूगोल और इतिहास ही नहीं जानते, देश की सामाजिक-सांस्कृतिक विविधताओं के अंतर्संबंधों को ही नहीं जानते वे भले ही लोक सभा में, शासन-प्रशासन में, सत्ता के समीकरण में अपनी पेठ बना लें किन्तु भारत जैसे विशाल राष्ट्र का नेतृत्व करने की काबिलियत के लिये 'बेस्ट' होना जरूरी है। नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी और अरविन्द केजरीवाल- इन तीनों में ही 'बेस्ट' होने का माद्दा नहीं है। साझा सरकारों या गठबंधन के लिये न्यूनतम साझा कार्यक्रम का महत्व जाने बिना, रोजगार के अवसरों की तलाश, बढ़ती आबादी पर नियंत्रण, पर्यावरण की समस्या,पड़ोसी राष्ट्रों समेत विश्व की चुनौतियाँ, महँगाई पर नियंत्रण का सूत्र, ऊर्जा संकट का निदान और मौजूदा जातीय- साम्प्रदायिक उन्माद की चुनौतियों के समाधान प्रस्तुत किये बिना ये तीनों ही अधूरे नेता हैं। केवल एक- दूसरे की लकीर को पोंछने में लगे ये तीनों नेता- मोदी, राहुल और केजरीवाल- खास तो क्या 'आम नेता' भी नहीं हैं।
सर्वे करने वाले और करवाने वाले याद रखें कि उनके निहित स्वार्थ और उनकी चालाकियों को भी जनता खूब समझने लगी है। जनता ने जिस तरह 2004 में, 2008 में सर्वे फेल किया था वैसे ही 2014 में भी भारत की जनता आगामी लोक सभा चुनाव में इन प्रायोजित पूर्वानुमानों को फेल कर देगी। नरेंद्र मोदी को सिर्फ उतना ही बोलना- करना और लिखना आता है जितना वे 'संघ की शाखाओं' में सीख पाये हैं। इसके अलावा जब भी वे बढ़-चढ़कर भाषणबाजी या शाब्दिक लफ्फाजी करते हैं तो वाकई 'फेंकू' जैसे ही लगने लगते हैं। जबसे वे गुजरात के मुख्यमन्त्री बने हैं तबसे उन्हें ये इल्हाम सा हो गया है कि वे पूरे भारत को गुजरात बना देने <गोधरा नहीं > की क्षमता रखते हैं। आधुनिक युवाओं को लुभाने, एनआरआई को लुभाने, कांग्रेस- राहुल और सोनिया गांधी की निरंतर आलोचना करने, मीडिया को मैनेज करने की अतिरिक्त योग्यता के होने के वावजूद मोदी अभी तक देश को ये नहीं बता पाये कि यदि वे वास्तव में ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ नेता हैं तो लोकायुक्त, सीबीआई, लोकपाल जैसे शब्दों से चिढ़ते क्यों हैं? वे किसी खास महिला की जासूसी क्यों करवाते फिरते हैं ? उनके मुख्यमन्त्रित्व में गुजरात में चोरी-चकारी, हत्याएं-लूट, बलात्कार क्यों हो रहे हैं ? गुजरात में गरीबी क्यों बढ़ी ? 17 रुपया रोज कमाने वाला नंगा-भूखा गुजराती अमीर कैसे हो गया ? यदि उनका ये कथन मान भी लिया जाये कि गुजरात में ये गरीब तो यूपी-बिहार के हैं, तो मोदी जी इन गुजरात स्थित गरीबों का भला करने के बजाय यू-पी बिहार में वोट कबाड़ने की नौटंकी पर अरबों रूपये क्यों फूँक रहे हैं ?
इतना ही नहीं जब मोदी के गुजरात में केशु भाई पटेल, कांशीराम राणा, आनंदी बेन, तथा शंकरसिंह बघेला जैसे धाकड़ नेता तथा अनेक अफसर-कर्मचारी भी डर -डर कर जी रहे हैं, तो समझा जा सकता है कि अल्पसंख्यकों का हाल क्या होगा ? जसोदा बेन जोकि मोदी जी की धर्म पत्नी हैं, मोदी जी जब उनके साथ ही न्याय नहीं कर सके तो देश के करोड़ों नर-नारियों को वे क्या न्याय दे सकेंगे ? जब गुजरात ही भय के साये में जी रहा है तो पूरे भारत को क्या पड़ी कि आ बैल <मोदी> मुझे मार ? स्वयं मोदी भी- कभी आडवाणी, कभी सुषमा स्वराज, कभी शिवराजसिंह चौहान, कभी राजनाथ सिंह और कभी गडकरी से सशंकित रहते हैं क्यों ? यह सर्वविदित है कि नरेद्र मोदी भारत के पूँजीपति वर्ग के सबसे पसंदीदा 'पीएम इन वेटिंग' हैं। यही उनकी सबसे बड़ी पूँजी है। प्रधानमन्त्री बनने के लिये यदि सिर्फ इसी पूँजी की दरकार होती तो आजादी के बाद नेहरू, शास्त्री या इंदिराजी प्रधानमंत्री नहीं होती बल्कि टाटा-बिड़ला और अम्बानी या अजीम प्रेमजी जैसे लोग प्रधानमन्त्री होते। यदि केवल कट्टर हिंदुत्व से प्रधानमन्त्री बनना सम्भव होता तो लाल कृष्ण आडवाणी कब के प्रधानमन्त्री बन गए होते! उन्हें तो फिर भी साम्प्रदायिकता के सवाल पर संदेह का लाभ एक बार दिया ही जा सकता था। आडवाणी से अधिक नरेद्र मोदी में ऐंसी क्या अतिरिक्त योग्यता है जिसे देखकर देशवासी उन्हें 'बेस्ट' मानकर उनकी पार्टी भाजपा को 272 सांसद चुनकर दे देंगे ? अर्थात मोदी पी एम् इन वेटिंग ही हो सकते हैं 'बेस्ट' नहीं ! यानी प्रधान मंत्री नहीं बन सकते !
राहुल गांधी को तो कांग्रेसी ही गम्भीरता से नहीं ले रहे हैं तो देश की जनता को क्या पड़ी कि उन्हें प्रधानमंत्री बनाकर यानी संप्रग को तीसरी बार देश का बेडा गर्क करने का मौका दिया जाये ! जब तक राहुल ने 'टाइम्स नाउ' के पत्रकार अर्णव गोस्वामी को इंटरव्यू नहीं दिया था। तब तक तो संदेह का लाभ देने को भारत के असंख्य नौजवान फिर भी तैयार थे किन्तु इस इंटरव्यू के बाद न केवल कुछ सिख नाराज हुये, न केवल कुछ मुसलमान निराश हुये बल्कि करोड़ों कांग्रेसी भी हताश हैं कि इस इंटरव्यू को फेस करते हुये राहुल गांधी ने सिद्ध कर दिया कि उनमें नेतृत्व का माद्दा नहीं है।
केजरीवाल के बारे में कुछ भी कहना सुनना अब समय की बर्बादी है। वे गरीबों-मजदूरों और कामगारों के दुश्मन और सफ़ेद पोश मलाइदार सभ्रांत वर्ग के ज्यादा खैरख्वाह तो हैं ही साथ ही वे राष्ट्रीय राजनीति में पुराने खिलाड़ी की तरह पेश आ रहे हैं। उनके कथनी और करनी में अंतर है। उनके संगी साथी ही अधकचरे और उश्रृंखल हैं। अकेले योगेन्द्र यादव और आशुतोष क्या कर पायेंगे। केजरीवाल और 'आप' के साथ अराजकतावादियों का जो हुजूम था वो भी बिखर चुका है। एनआरआई सावधान हो गये हैं। केजरीवाल को रोज-रोज नई-नई मुसीबतें दरपेश हो रहीं हैं। किसी को उम्मीद नहीं कि वे दिल्ली के मुख्यमंत्री पाँच साल तक बने रह सकेंगे। कुछ तो छह माह की गारंटी भी नहीं ले रहे हैं। भारत का प्रधानमंत्री बनने अर्थात 'बेस्ट' मेन बनने की क्षमता नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी और अरविन्द केजरीवाल में तो नहीं है। उम्मीद है कि आगामी मई-2014 तक देश की जनता ही न केवल अपना 'बेस्ट मेन' यानी अगला प्रधानमंत्री <संसद के मार्फ़त> चुनेगी बल्कि उसकी नीतियाँ-नियत भी ठोंक बजाकर पहले देख लेगी।


