मोदी सरकार आने के बाद विद्वान की परख विद्वान नहीं, लफंगे और जाहिल कर रहे
मोदी सरकार आने के बाद विद्वान की परख विद्वान नहीं, लफंगे और जाहिल कर रहे

सारे देश में विद्वानगण अपने को लज्जित और अपमानित महसूस क्यों कर रहे हैं?
जेएनयू की आँखें और विश्वचेतना | जेएनयू सारे देश के विश्वविद्यालयों से भिन्न क्यों है?
जेएनयू पर बहस कर रहे हैं तो हमें यह सवाल उठाना चाहिए कि हमारे विश्वविद्यालयों की आंखें कैसी हैंॽ
विश्वविद्यालयों की आंखें कैसी हैं, यह इस बात तय होगा कि विश्वविद्यालय, सरकार को कैसे देखता हैॽ सरकार की उसके पास किस तरह की अवधारणा हैॽ
सरकार की अवधारणा चांस से पैदा नहीं होती, वह क्लासरूम में पैदा होती है। विश्वविद्यालय सरकार को कैसे देखते हैं, यह इस बात से तय होगा कि शिक्षक कक्षा में पढ़ाते कैसे हैंॽ विश्वविद्यालय को संगठित कैसे करते हैंॽ संचालित कैसे करते हैंॽ किस तरह के शिक्षकों की नियुक्ति करते हैंॽ
इसी तरह शिक्षक और छात्र पढ़ते हुए तटस्थ नहीं हो सकते। उनको यह कहने का हक नहीं है कि सरकार के बारे में हम कुछ नहीं बोलेंगे। आमतौर पर भारत के सभी विश्वविद्यालयों में सरकार के प्रति यही रूख है या फिर सरकार का अनुकरण करने की प्रवृत्ति है। विश्वविद्यालय के अंदर का समाज हमारे समाज का प्रतिबिम्बन है, उसमें छात्र जहाँ समाज का प्रतिनिधित्व करते हैं वहीं दूसरी ओर शिक्षक समाज के दूसरे वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये असल कारीगर हैं, ट्रस्टी हैं, जो अपने शिक्षण से छात्रों को तराशने का काम करते हैं। उनका काम है छात्रों को अंतर्विरोधों के लिए तैयार करना।
How are the teachers?
शिक्षक वस्तुतः लक्ष्य है जिसको पाना छात्रों की इच्छा होती है। किसी भी विश्वविद्यालय की आँखें कैसी होंगी यह निर्भर करता है कि शिक्षक कैसे हैंॽ शिक्षक विश्वविद्यालय के ट्रस्टी होने के नाते सामुदायिक तौर पर विश्वविद्यालय के मर्म का निर्माण करते हैं। वे इस क्रम में अपनी स्वायत्तता भी निर्मित करते हैं।
शिक्षक महज शिक्षक नहीं होता वह स्कॉलर या विद्वान होता है। विद्वान की परख विद्वान ही कर सकता है, अन्य नहीं। मोदी सरकार आने के बाद यह मुश्किल बढ़ी है कि विद्वान की परख विद्वान नहीं कर रहे लफंगे और जाहिल किस्म के लोग कर रहे हैं। इसके कारण सारे देश में विद्वानगण अपने को लज्जित और अपमानित महसूस कर रहे हैं।
जेएनयू के वीसी ने ठीक वही काम किया जो आरएसएस चाहता है। उसने विद्वान की भूमिका नहीं निभाई। हमारे अधिकांश विश्वविद्यालयों में शिक्षक तो ढेर सारे हैं लेकिन विद्वान या स्कॉलर बहुत कम हैं।
विश्वविद्यालय की आँखें विद्वान होते हैं, शिक्षक नहीं।
हमने शिक्षक बनाने पर खूब जोर दिया और सारे देश को शिक्षकों से भर दिया है, इससे शिक्षा का स्तर गिरा है। शिक्षा को हमने रूपये – कौड़ी के धंधे में तब्दील कर दिया है। शिक्षा को बाजारू बना दिया है, और शिक्षक को बिकाऊ मजदूर ! दुखद है कि हम लेकिन विश्वविद्यालय को विश्वविद्यालय न बना पाए।
जेएनयू देश के सारे विश्वविद्यालयों से अलग क्यों है?
जेएनयू इसलिए सारे देश के विश्वविद्यालयों से अलग है क्योंकि यहां विद्वान या स्कॉलरों की परंपरा है। यहां शिक्षक कम और विद्वान ज्यादा पाए जाते हैं। वे अपने छात्रों को पढ़ाते नहीं हैं, ज्ञान में साझीदार बनाते हैं, ज्ञान का भोक्ता नहीं सर्जक बनाते हैं। इस अर्थ में जेएनयू सारे देश के विश्वविद्यालयों से भिन्न है।
यहां हर छात्र-शिक्षक निडर होकर सरकार के खिलाफ, विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ बोल सकता है। यहां छोटे-बड़े का भेद एकदम नहीं है। यहां हर छात्र को अपनी हाइपोथीसिस पर काम करने का हक है। किसी भी विश्वविद्यालय में ज्ञान के विकास की यह बुनियादी शर्त है। कोई भी छात्र जब हाइपोथीसिस बनाकर काम करता है तो ज्ञान का सृजन करता है। जनता के बीच में अपनी क्षमता का प्रदर्शन करता है। ज्ञान के संदर्भ में शक्ति अर्जित करता है। वह जो ज्ञान निर्मित करता है उसका आम जनता पर असर भी होता है। इस अर्थ में वह अपनी स्वायत्तता को निर्मित करता है, स्वायत्त संसार बनाता है। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहां से जेएनयू अपने को सरकार के नाभिनाल से काटता है।
जेएनयू के स्कॉलरों की आँखें हैं उनके ज्ञान की वैज्ञानिक क्षमता, जो सरकार और उसके तंत्र से पूरी तरह स्वतंत्र है। देश में कहने को अनेक विश्वविद्यालय हैं जो कागज पर स्वायत्त हैं, जेएनयू भी स्वायत्त है, लेकिन जेएनयू स्वायत्तता से भी एकदम आगे जाकर काम करता रहा है, स्वायत्तता के आधार विश्वविद्यालय सिर्फ अपने अंदर के कामकाज को लेकर स्वायत्त रह सकते हैं। यह स्वायत्तता की सीमा है।
स्वायत्तता के तहत विश्वविद्यालय वही काम कर सकते हैं जो उनको सौंपे गए हैं। लेकिन जेएनयू उससे भिन्न भूमिका अदा करता रहा है, वह उनके प्रति भी जिम्मेदारी निभाता रहा है जो स्वायत्तता देने वाली एजेंसी नहीं हैं। यानी गैर-सत्ता केन्द्रों या विश्व समाज के वृहत्तर तबकों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाता रहा है। यही वजह है कि जेएनयू के छात्रों में सरकारी चेतना की बजाय विश्व चेतना, सामाजिक चेतना प्रबल होती है। इस अर्थ में वे देश के अन्य संस्थानों से भिन्न होते हैं।
जगदीश्वर चतुर्वेदी


