मोदी सरकार का भूमि अधिग्रहण कानून
मोदी सरकार का भूमि अधिग्रहण कानून
मोदी सरकार का भूमि अधिग्रहण कानून साम्राज्यवादी ताकतों व उनके भारतीय दलालों के और विकास का सूत्र
नई दिल्ली। आजकल सभी संगठन अपने कार्यकलापों की प्रेस विज्ञप्तियां मीडिया संगठनों को भेजते रहते हैं।
ऐसे ही दो संगठनों की एक ही मुद्दे पर दो प्रेस विज्ञप्तियां हमें मिलीं। दोनो की ही प्रेस विज्ञप्तियां संसद में अभी हाल में पास हुए भूमि अधिग्रहण बिल पर हैं। पहले उस राजनीतिक दल की विज्ञप्ति की बात करते हैं, जिसका प्रभाव अधिक है।
ये विज्ञप्ति उस राजनीतिक दल के एक सांसद के हवाले से आई थी। विज्ञप्ति की प्रमुख बातें इस प्रकार हैं।
कि भूमि अधिग्रहण बिल किसानों के भले के लिए है, इसके लिए एकजुट होना समय की मांग है, ये गांवों का विकास करने के लिए है।
कि नए भूमि अधिग्रहण बिल से परियोजनाओं के लिए अधिग्रहीत की गई जमीनों के लिए किसानों को उचित मुआवजा, सहायता व पुनर्वास की सुविधा दी जाएगी जो 100 सालों से नहीं दी गई थी।
कि किसानों को अपनी जमीन के बाजार मूल्य का चार गुना मिलेगा और वे विकास के बाद विकास और अधिग्रहण लागत का भुगतान करके मूल भूमि का 20 प्रतिशत भी प्राप्त कर सकते हैं।
कि बिजली संयंत्रों से बिजली उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी जिससे किसानों का जीवन बेहतर होगा और उत्पादकता में भी वृद्धि होगी।
कि पुराने बिल की कमजोरियों से राज्य सरकारें परेशान थी ।
कि देश में 1894 में सर्वप्रथम भूमिअधिग्रहण कानून लागू किया गया। जिसमें बडी मात्रा में विसंगतियां व खामियां रही फिर भी 120 साल तक उस कानून सहित 13 अन्य अधिनियमों के माध्यम से भूमि का अधिग्रहण किया जाता रहा। किसानों को उनकी भूमि का ना तो उचित मुआवजा मिल पा रहा था ना ही मूलभूत सुविधाओं का विकास हो पा रहा था। जिसके कारण शहरी जीवन और ग्रामीण जीवन के बीच जमीन आसमान का अन्तर आ गया।
कि एक ओर देश में चमचमाते शहर बनने लगे वहीं दूसरी ओर गांवों से रोजगार, शिक्षा व स्वास्थ्य एवं बेहतर जीवन की आस में बडी मात्रा में पलायन हुआ। शहरों में आकर भी उक्त ग्रामीणों में से अधिकांश को तो अस्वास्थ्यकारी स्लम बस्तियों में जीवन जीना पड़ रहा है।
अब दूसरे संगठन की विज्ञप्ति की बात करते हैं। उसकी प्रमुख बातें हैं –
कि देश में बढ़ती बेरोजगारी, दरिद्रता, भूख, कुपोषण, भुखमरी, किसानों की कर्जदारी और किसानों व बुनकरों की लगातार जारी आत्महत्याओं का हल कारपोरेट घरानों, स्मार्ट सिटी, बड़े बांधों आदि के लिए खेती की जमीन का अधिग्रहण करने से नहीं निकलेगा। उसके लिए खेती का विकास करना होगा।
कि यह नीति पूर्व यूपीए सरकार की नीति की तरह किसानों को उजाड़ेगी, खेती को नष्ट करेगी और खाद्य असुरक्षा और बेरोजगारी को और बढ़ा देगी।
कि खेती का विकास लोगों की क्रय क्षमता बढ़ाएगा, जिससे घरेलू बाजार व स्थानीय उद्योग पुनर्जीवित होंगे और इससे पूरे देश में मेहनतकश लोगों का विकास होगा।
कि दबाव बनाकर सरकार को मजबूर किया जाए कि वह ”किसानों के जबरन विस्थापन से पीछे हटे“, “विदेशी कम्पनियों व लुटेरों को जमीन, खनिज संसाधन तथा जलस्रोत देना बन्द करे“ और “उद्योग व शहरीकरण के लिए खेती की जमीन देना बंद करे“।
कि सारा आवश्यक औद्योगिक विकास पुराने औद्योकि घरानो द्वारा छोड़ी गयी खाली जमीनों पर किया जा सकता है।
कि मोदी सरकार का भूमि अधिग्रहण कानून साम्राज्यवादी ताकतों व उनके भारतीय दलालों के और विकास का सूत्र है। वास्तव में विश्व बैंक भारत सरकार पर दबाव बना रहा है कि वह किसानों का शहरीकरण करे और खेती के स्वरूप को मूल आवश्यकता वाले अनाजों के उत्पादन से बदल कर सब्जी, फल व इमारती लकड़ी के उत्पादन की ओर ले जाए।
कि देश में अधिरचना के विकास की मुख्य दिशा खेती के विकास की होनी चाहिए जिसमें खेती में पैदावार में वृद्धि के आधार पर जमीन की सीलिंग घटनी चाहिए और सीलिंग से फाजिल जमीन भूमिहीन व गरीब किसानों को बांटी जानी चाहिए ताकि उन्हें सुरक्षित जीविका का साधन मिल सके।
कि खेती की अधिरचना को विकसित करके बीज, खाद आदि की नियमित व गुणवत्तायुक्त आपूर्ति की जा सके और गहरे तालाब व नहरें खुदवाकर सिंचाई सुनिश्चित हो सके।
कि फसलों के भंडारण व शीतगृह विकसित करना चाहिए और सभी फसलों के लाभकारी मूल्य दिये जाने चाहिए।
कि सभी मूल सुविधाओं व आधुनिक तकनीकों के साथ स्मार्ट गांव बनाए जाने चाहिए। छतों पर सौर ऊर्जा यंत्र लगाकर व वायु ऊर्जा से सभी खेतों, गरीबों के आवासों तथा छोटे दुकानदारों को मुफ्त बिजली दी जानी चाहिए।
दोनो ही प्रेस विज्ञप्तियों में उठाई गई बातों के विश्लेषण का कार्य बुद्धिजीवियों की जीविका ध्यान रखते हुए उनके लिए ही छोड़ देना चाहिए।
- अवनीश कुमार


