मोदी सरकार - मुद्दों को नकारती कट्टरता
हाल ही में शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा है, देश में मुसलमानों का मताधिकार खत्म कर देना चाहिए। इसके जबाव में मुस्लिम नेता औवेसी ने उन्हें चुनौती दी और कहा, इस देश में राउत के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी, क्योंकि कार्रवाई को केवल एक ही संप्रदाय के खिलाफ की जाती है। इसी दिन भाजपा नेता साक्षी ने कहा, देश में नसबंदी के लिए कानून बनाया जाना चाहिए, क्योंकि जो चार शादी करते हैं और चालीस बच्चे पैदा करते हैं, वे नसबंदी नहीं मानते। इसके पहले भी वे चार बच्चे और पांच बच्चे पैदा करने की अपील कर चुके हैं। बयान देने में संघ प्रमुख मोहन भागवत भी पीछे नहीं हैं, उन्होंने नोबेल पुरस्कार विजेता मदर टैरेसा तक पर सवाल खड़े कर दिए।
केन्द्र में नरेन्द्र मोदी सरकार बनने के बाद से इस प्रकार के बयानों की बाढ़ आ गई है। कुछ लोगों की राय है, इससे मोदी खुश नहीं हैं, क्योंकि इस तरह के बयान उन्हें नुकसान पहुंचा रहे हैं, दिल्ली इसका उदाहरण है। कुछ लोगों की यह भी राय है, कि संघ परिवार पर मोदी का अंकुश नहीं है। भाजपा ने कुछ मौकों पर अपने नेताओं को संयंम में रहने की नसीहत भी दी है, पर केवल इतना काफी नहीं है। असल में सांप्रदायिक कट्टरता का इस्तेमाल मुद्दों से भटकाने के लिए किया जाता है और खासकर गरीबों की एकता को तोडऩे के लिए। इसीलिए अटल सरकार के समय भी इसी प्रकार के बयान सुनने को मिलते थे। उस समय चर्चा का विषय एम एफ हुसैन की पेंटिंग्स और वॉटर की शूटिंग कहां होगी? यह होता था। यह अलग बात है, हुसैन का मूल्यांकन वे लोग करते थे, जिन्हें पेंटिंग का पी भी नहीं पता था। पर अर्थ नीति पर सरकार की असफलता तमाम प्रयासों के बाद भी नहीं छिप पाई और केन्द्र में यूपीए की सरकार आ गई, इस सरकार के दौरान चर्चा के मुद्दे बदले और लोग आर्थिक नीतियों पर चर्चा करने लगे। भ्रष्टाचार इसीलिए इतना बड़ा मुद्दा बना, कि सरकार बदल गई। हालांकि मोदी सरकार कट्टरता के नाम पर नहीं, विकास के मुद्दे पर केन्द्र में आई थी, इसीलिए कट्टरता फैलाकर यह कोशिश की जा रही है, कि जनता का ध्यान असली मुद्दों से भटकाया जा सके।
असल में मोदी के सामने विकास और बेरोजगारी बड़ा मु्द्दा है, जिसका अभी तक वे कोई बड़ा हल नहीं खोज पाए हैं। महंगाई के हाल भी पुराने हैं। विकास को लेकर मोदी की वही कोशिश है, जो उन्होंने गुजरात में किया। वहां उन्होंने विनिवेश सम्मेलन किए और गुजरात में निवेश लेकर आए। यही कोशिश उनकी यहां भी है। मेक इन इंडिया का नारा देकर वे निर्माण क्षेत्र को बढ़ाना चाहते हैं, पर यहां एक अलग चक्कर है। इस समय पूरी दुनिया का निर्माण क्षेत्र मंदी के दौर से गुजर रहा है, खुद हमारे देश में जो कारखाने हैं, वे संकट में हैं, क्योंकि चीन और कोरिया के माल ने पूरी दुनिया के माल पर कब्जा कर लिया है। वहां का माल यहां बने माल से सस्ता पड़ रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी पूरी दुनिया में घूम-घूम कर पूंजीपतियों को मुनाफे की गारंटी दे रहे हैं, इसके लिए वे श्रम कानूनों में बदलाव के लिए तैयार हैं, जबरिया भूमि अधिग्रहण का कानून पास कराने के लिए किसानों और विपक्ष तक की सुनने को तैयार नहीं हैं। सरकार के इन कदमों से जनता के बीच जो नाराजगी फैल रही है, उसे रोकने के लिए उनमें धार्मिक श्रेष्ठता का भाव जगाना जरुरी है, जो काम संघ परिवार व भाजपा के नेता कर रहे हैं।
गरीबों की एकता तोड़ऩे के लिए कट्टरवादी ताकतों का किस तरह इस्तेमाल किया जाता है, शिवसेना इसका सटीक उदाहरण है। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे एक अखबार में कार्टून बनाया करते थे। इस समय मुंबई कपड़ा मिलों का केन्द्र हुआ करती थी। अधिकांश मिलें मारवाड़ी सेठों की थीं। उन्हें जब मिलों के आधुनिकीकरण की जरूरत पड़ी, तब यह बात सामने आई, कि इसके लिए मजदूरों की छंटनी करनी पड़ेगी, उस समय मुंबई में मजदूर आंदोलन काफी मजबूत था। ऐसे में मजदूरों की छंटनी आसान नहीं थी, दूसरा इन मजदूरों को जो देनदारियां देना पड़ती, उससे काफी कम कीमत में कारखानों को आधुनिक किया जा सकता था। ऐसे में बाल ठाकरे की उत्पत्ति हुई, जो अपनी उग्रता के लिए प्रसिद्ध हो चुके थे। उन्होंने सबसे पहले 'उठाओ लुंगी-बजाओ पुंगी’ का नारा दिया। यह दक्षिण भारतीय मजदूरों पर हमला था। उन्होंने महाराष्ट्र अस्मिता का नारा भी दिया। इन हमलों से मजदूरों की एकता टूट गई और कारखाना मजदूर अपनी योजना में कामयाब हो गए। उनका अगला निशाना उत्तर प्रदेश व बिहार से आए मजदूर बने। आज मुंबई कपड़ा मिलों की कब्रगाह बन गया है। शिवसेना का हर बार हमला गरीब मजदूरों पर ही रहा। आज तक उन्होंने यह नारा नहीं दिया, कि अंबानी गुजराती है, उसके शेयर मत खरीदो, बिड़ला मारवाड़ी है, मुंबई से उसे बाहर निकालो। कभी कभार लोकप्रियता हासिल करने के लिए अमिताभ या शाहरुख पर भले ही बयान दे दिए गए हों, पर शिवसेना के पूरे इतिहास में किसी भी पूंजीपति पर मराठी अस्मिता के नाम पर हमला नहीं किया गया।
अंत में साक्षी महाराज के सच को भी जान लेते हैं। हाल में जो आंकड़े आए हैं, उसके हिसाब से मुस्लिमों में स्त्री-पुरुष अनुपात में भारी गिरावट आई है। 2004-05 में 1000 पुरुष पर 968 स्त्रियां होती थीं, जो 2009-10 में घटकर 921 रह गई हैं। यह सरकारी आंकड़ा है। अगर इसे गलत मान लें और 1000 पुरुषों पर हजार स्त्रियां मान लें, तब भी 75 फीसदी मुसलमान कुंवारे रह जाने चाहिए, क्योंकि 4 महिलाओं से तो एक ही मुसलमान शादी कर लेता है। दूसरा मुद्दा बच्चों का, जनगणना के आंकड़े बताते हैं, कि इस दशक में मुस्लिम आबादी की विकास की गति 24 फीसदी रही, जो पिछले दशक के विकास दर 29 फीसदी से 5 फीसदी कम है।
भारत शर्मा
भारत शर्मा, लेखक देशबंधु के दिल्ली संस्करण के स्थानीय संपादक रह चुके हैं।