मोदी सरकार के मजदूरविरोधी कदम
मोदी सरकार के मजदूरविरोधी कदम
भारत के मजदूर वर्ग का संघर्ष, मोदी सरकार की तानाशाही की बढ़ती प्रवृत्ति के खिलाफ संघर्ष का एक महत्वपूर्ण हिस्सा
मोदी सरकार के मजदूरविरोधी कदमों का सिलसिला बेरोक जारी
प्रकाश कारात
मई दिवस पर यह दर्ज किया जाना जरूरी है कि मोदी सरकार के मजदूरविरोधी कदमों का सिलसिला बेरोक जारी है। इस बार के केंद्रीय बजट में कर्मचारी प्रोवीडेंट फंड (ई पी एफ) के 60 फीसद की निकासी पर कर लगाने का प्रस्ताव किया गया था। इसका मकसद यही था कि ईपीएफ में अंशदानों को नयी पेंशन योजना के समकक्ष बनाया जाए, जिसमें से धन की निकासी पर कर लगता है। इसके पीछे मंशा यही थी कि ईपीएफ के सदस्यों को नयी पेंशन योजना की अपनाने की ओर धकेला जाए, जिसके कोष को पूंजी बाजार में लगाया जा सकता है।
मजदूरों तथा कर्मचारियों के व्यापक विरोध और तमाम ट्रेड यूनियनों तथा यहां तक कि भाजपा के एनडीए के सहयोगियों के भी नाराजगी जताने के बाद, वित्त मंत्री को संसद में चर्चा शुरू होने से पहले ही उक्त प्रस्ताव वापस लेना पड़ा था। उसके बाद केंद्र सरकार ने प्रोवीडेंट फंड, नेशनल सेविंग्स सार्टिफिकेट तथा पोस्ट ऑफ जमाओं जैसी लघु बचत योजनाओं में भारी कटौतियां कर दीं। जहां पीपीएफ तथा वरिष्ठ नागरिकों के लिए बचतों के लिए ब्याज दरों में 0.6 फीसद की कटौती कर दी गयी, पोस्ट ऑफिस जमाओं के मामले में ब्याज की दरों में 0.6 फीसद से 1.3 फीसद तक की कटौतियां की गयी हैं। लघु बचतों में इन कटौतियों की मजदूरवर्गीय तथा मध्यवर्गीय परिवारों पर बहुत ज्यादा मार पड़ी है क्योंकि उनकी ज्यादातर बचतें लघु बचत योजनाओं के रूप में ही होती हैं। इस मामले में भी मकसद यही है कि इन बचतों को बाजार-आधारित फंडों की ओर धकेला जाए। इस शृंखला में ताजातरीन हमला वित्त मंत्री द्वारा ईपीएफ में ब्याज की दर घटाए जाने के रूप में हुआ है। यह कटौती इसके बावजूद की गयी है कि कर्मचारी प्रोवीडेंट फंड संगठन (ईपीएफओ) के केंद्रीय ट्रस्टी बोर्ड की सिफारिश इसके खिलाफ थी और वास्तव में इस योजना में ब्याज की दर में और बढ़ोतरी के लिए ही फंड उपलब्ध थे।
ईपीएफ के फंड को हथियाने की सरकार की कोशिशें लगातार जारी हैं। 18 मार्च को वित्त मंत्री ने इसकी अधिसूचना जारी की कि एक वरिष्ठ नागरिक कल्याण फंड का गठन किया जा रहा है, जिसके लिए पोस्ट ऑफिस बचत खातों की लघु बचत योजनाओं, पब्लिक प्रोवीडेंट फंड तथा ईपीएफ के दावेदारविहीन जमाओं को हस्तांतरित किया जा रहा है। ईपीएफ की जमा राशियों को इस तरह की किसी अधिसूचना के जरिए हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है। वास्तव में पिछले साल के बजट में भी, ‘‘ईपीएफ के फंड से 6,000 करोड़ रु0 उठाने’’ का ऐसा ही प्रस्ताव किया गया था, जिसका इस फंड के केंद्रीय ट्रस्टी बोर्ड की 11 मार्च 2015 को हुई बैठक में, इस ट्रस्टी बोर्ड में ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधियों ने कड़ा विरोध किया था। जहां तक ईपीएफ का सवाल है, सरकार की वर्तमान अधिसूचना कानूनी लिहाज से भी गलत है और नैतिक लिहाज से भी।
ईपीएफ की जमाओं की निकासी पर कर लगाने की अपनी विफल कोशिश से कोई सबक न लेते हुए, सरकार ने इस फरवरी में ईपीएफ की जमाओं की निकासी के नियमों में संशोधनों की अधिसूचना जारी कर दी। इस अधिसूचना में कहा गया है कि सेवानिवृत्ति से पहले रोजगार छिनने, इस्तीफे आदि की सूरत में जमा में से निकासी की सूरत में, मजदूर ईपीएफ में अंशदान का सिर्फ एक हिस्सा निकाल सकेंगे और सिर्फ 58 वर्ष की आयु के बाद ही इस फंड में ‘‘मालिकान का अंशदान’’ निकाला जा सकेगा। इसका सभी ट्रेड यूनियनों ने विरोध किया और मांग उठायी कि मजदूरों को यह तय करने का अधिकार होना चाहिए कि वे ईपीएफ से अपना पैसा निकालना चाहते हैं या उसी में रखना चाहते हैं।
जब इस संशोधन को लागू करने की कोशिश की जा रही थी, उसे मजदूरों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा था। बंगलूरु में मजदूरों की तथा खासतौर पर महिला मजदूरों और विशाखापट्टनम में हुई विरोध कार्रवाइयों ने सरकार को उक्त अधिसूचना वापस लेने के लिए मजबूर किया है। इस तरह मजदूरों ने ईपीएफ के अपने पैसे का एक हिस्सा छीनने की सरकार की कोशिश को विफल कर दिया है।
ये मजदूरविरोधी कदम, विभिन्न श्रम कानूनों को कमजोर करने की मोदी सरकार की कोशिशों की पृष्ठभूमि में आए हैं। ऐसा ही एक और कदम, फैक्ट्री कानून में संशोधन का प्रस्ताव है, जिससे संबंधित विधेयक विचार के लिए संसद के सामने आने वाला है। इन संशोधनों को अगर संसद की मंजूरी मिल जाती है तो इनके जरिए, फैक्ट्री की परिभाषा बदलने के रास्ते से, 75 फीसद से ज्यादा औद्योगिक श्रमशक्ति को इस कानून के दायरे से ही बाहर कर दिया जाएगा। 40 तक मजदूरों वाली सभी फैक्टरियों को फैक्ट्री कानून से बाहर किए जाने की तैयारी है। छोटी यानी 40 मजूदरों तक की फैक्टरियों के लिए एक नया विधेयक लाया जाने वाला है। इस विधेयक के जरिए यह तय कर दिया जाएगा कि 14 बुनियादी श्रम कानून ऐसी छोटी फैक्टरियों पर लागू नहीं होंगे।
मोदी सरकार, ‘‘कारोबार करना आसान बनाने’’ के नाम पर और इनसे रोजगार बढऩे के फर्जी दावे के साथ, ये तमाम मजदूर वर्ग-विरोधी कदम उठा रही है। मजदूर वर्ग का आंदोलन इन तमाम मजदूरविरोधी कदमों का जोर-शोर से विरोध कर रहा है। इन मजदूरविरोधी कदमों के खिलाफ और अपनी अन्य मांगों को लेकर, केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने 2 सितंबर को आम हड़ताल का आह्वान किया है। भारत के मजदूर वर्ग का संघर्ष, मोदी सरकार की तानाशाही की बढ़ती प्रवृत्ति के खिलाफ संघर्ष का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।


