सुन्दर लोहिया
अपने चुनाव अभियान में नरेन्द्र मोदी ने देश के मतदाताओं को सम्बोधित करते हुए कहा था कि कांग्रेस को साठ साल तक शासन करने का अवसर दिया मुझे केवल साठ महीने दीजिए। मैं देश को भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र में बदल दूंगा। उनकी बातों पर विश्वास करते हुए उन्हें पूर्णबहुमत का वरदान देकर वचन को कर्म में बदलने का मौका दिया। सत्तासीन होने पर पहला बदलाव जो जनता ने देखा वह था शपथ ग्रहण सम्मारोह जिसे सामंती परम्परा के मुताबिक सम्पन्न किया गया। नया प्रयोग होने के कारण जनता ने इसे विदेश नीति में अहम परिवर्तन के तौर पर स्वीकार कर लिया। इसमें पड़ोसी देशों के शासनाध्यक्षों का दिल्ली दरबार लगा कर वाहवाही लूटी और नेपाल में जाकर कम्यूनिस्टों की संविधान निर्माण में भूमिका की तारीफ करके उनसे तालियां बजवाई। भारत के माओवादी वामपंथियों को शस्त्र छोड़ कर कंधे पर हल लेकर विकास में भागीदारी निभाने का संदेश दिया। हरियाणा सरकार में कार्यरत आईएएस अधिकारी खेमका को दिल्ली स्थित प्रधानमन्त्री कार्यालय में नियुक्त करके ईमानदार अफसरों को प्रश्रय देने का श्रेय लूटा। पाकिस्तान के साथ प्रस्तावित सचिव स्तरीय द्विपक्षीय वार्ता को इस लिए अस्वीकार करके अपनी सरकार के कड़े फैसले लेने का प्रचार किया। हाल ही में मोदी उन राज्यों में केन्द्र सरकार की विभिन्न योजनाओं का श्रीगणेश करने के लिए जन सभाओं में राज्यों के मुख्यमन्त्रियों के विरुद्ध नारेबाज़ी में मौन धारण करके इस राजनीतिक हुल्लड़बाज़ी को मौन समर्थन देने की रणनीति अपनाई। पार्टी प्रवक्ता इसे उन मुख्यमन्त्रियों की घटती हुई लोकप्रियता का प्रमाण बता रहे हैं जिन्हें बोलने नहीं दिया गया। इन सारे परिदृश्य में उनके स्वतन्त्रता दिवस पर राष्ट्र के नाम संदेश में यह बात सबसे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण थी कि देश में दस सालों तक साम्प्रदायिक दंगों पर जनता द्वारा पाबन्दी लगाने की अपील। दस सालों के बाद स्वतन्त्रता दिवस पर लोगों को लगा कि प्रधानमन्त्री उनसे मुखातिब है। भले ही उसके भाषण में सार न हो लेकिन शोर था और लोग मन्त्रमुग्ध हो कर सुन रहे थे। ऐसे सम्मोहन में कथनी और करणी का अंतर गा़यब हो जाता है। इस सम्मोहन से मुक्त होकर ही उन विरोधाभसों को पहचान पा रहे हैं जिन्हें हम भुगतने के लिए अभिशप्त हो गये हैं।
बात उनके राष्ट्र के नाम सम्बोधन से शुरु करें तो हमें मन्त्रमुग्ध करने वाले बयान को ही लिया जाये कि देश के विकास के लिए साम्प्रदायिक दंगों पर पाबन्दी लगनी चाहिये। पहली बात कि यह पाबन्दी दस साल के लिए क्यों है? साम्प्रदायिकता असंवैधानिक है यह धर्मनिरपेक्ष गणराज्य की संकल्पना के विरुद्ध है इसे हमेशा के लिए त्यागने की अपील क्यों नहीं कर रहे नरेन्द्र मोदी?यदि वे अपने कहे के प्रति ईमानदार हैं तो वह देश के कानून के अंतर्गत तोगड़िया, गिरिराज किशोर और योगी आदित्यनाथ जैसे संघ परिवार और भाजपा के नेताओं पर कारवाई क्यों नहीं कर रहे? भारत के माओवादी नेपाल के कम्यूनिस्टों की तरह बन्दूक के बजाये अपने कंधो पर हल उठा लें तो देश प्रगति की दिशा में अग्रसर हो सकता है। लेकिन नरेन्द्र मोदी भूल गये या जानबूझ कर अनजान बन रहे हैं कि यदि ये लोग बन्दूक छोड़ उनके कहे अनुसार हल उठा भी लें तो जोतेंगे कहां ? उनके खेत तो सरकार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हवाले कर चुकी है और उनकी नदियों का पानी तक बिक चुका है। अब आप चाहते हैं कि वे लुप्त सरस्वती को ढूंढ निकालें? नेपाल के माओवादियों ने अगर बन्दूक से रिश्ता तोड़ने का संकल्प लिया तो उन्होंने बन्दूक के सहारे निरंकुश सामंतशाही का खात्मा करने के बाद ही लिया था। आज वे नेपाल की नीतिनिर्धारण में बराबर के हिस्सेदार हैं जबकि इस देश के आदिवासी विकास के नाम पर विनाश की ओर धकेले जा रहे हैं। ऐसे हालात पैदा करिये कि ये लोग भी विकास के नीतिनिर्माण में शामिल हो सकें तो शायद आपकी अपील का असर पड़े।
जिस समय इस सरकार ने हरियाणा केडर के प्रशासनिक अधिकारी को प्रधानमन्त्री कार्यालय में नियुक्ति किया तो जनता को लगा कि ईमानदार अफसर की कदर की जा रही है लेकिन जब एम्स में कार्यरत केन्द्रीय सेवा के अधिकारी संजीव चतुर्वेदी को पद से हटाया गया तो जनता का विश्वास आहत हुआ। कहा जा रहा है कि यह इस पद के योग्य नहीं था। जनता को लगा कि जब उसने एम्स के घोटालों का पर्दाफाश किया तब सरकार को लगता है कि यह आदमी गलत जगह पर है? इस घटना से खेमका की ईमानदारी की कद्र भी संदेहास्पद हो जाती है। अफसर भले ही ईमानदार हो लेकिन मोदी सरकार उसका उपयोग ईमानदारी के लिए शायद ही करे ?
नरेन्द्र मोदी अपने आप को संघीय ढांचे का समर्थक बतलाते हैं। संप्रग सरकार के लोकपाल कानून का आपने विरोध इसलिए किया था कि इससे राज्य की स्वायत्तता पर संकट आ रहा था। लेकिन अब जिन राज्यों के दौरों में जनसभाओं के दौरान मुख्य मन्त्रियों को हूट किया गया और प्रधानमन्त्री मौन धारण करके अपने पद की गरिमा बचाने का उपक्रम करते देखे गये। लेकिन ऐसी घटनाओं को संघीय परम्परा के विरुद्ध बताकर प्रधानमन्त्री की जनसभाओं का बहिष्कार किया तो भाजपा के प्रवक्ताओं ने इसे संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन कह कर प्रचारित किया। यह भी जोड़ दिया कि मुख्यमन्त्रियों की हूटिंग उनकी अलोकप्रियता की परिचायक है। यह बात कौन सी संवैधानिक मर्यादा का पालन करने वाली है? शायद भाजपा यह बताना चाहती है कि मर्यादा वही जिसे वे माने परम्परा भी केवल भाजपा द्वारा तय की जायेगी और इस तरह इन्साफ भी वही होगा जो भाजपा करेगी क्योंकि कानून बनाना अब पूर्णबहुमत के कारण उनकी मुट्ठी में बन्द है।
सुन्दर लोहिया, लेखक वरिष्ठ साहित्यकार व स्तंभकार हैं। आपने वर्ष 2013 में अपने जीवन के 80 वर्ष पूर्ण किए हैं। इनका न केवल साहित्य और संस्कृति के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान रहा है बल्कि वे सामाजिक जीवन में भी इस उम्र में सक्रिय रहते हुए समाज सेवा के साथ-साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी काम कर रहे हैं। अपने जीवन के 80 वर्ष पार करने के उपरान्त भी साहित्य और संस्कृति के साथ सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिकाएं निभा रहे हैं। हस्तक्षेप.कॉम के सम्मानित स्तंभकार हैं।