सत्येंद्र प्रताप सिंह

काशी हिंदू विश्वविद्यालय। छात्र एक हफ्ते से वहां 24 घंटे लाइब्रेरी खोले जाने की मांग कर रहे हैं। लाइब्रेरी बंद होने के बाद 11 बजे रात के बाद वहीं सामने विश्वनाथ मंदिर के सामने बच्चे सड़क पर रोड लाइट के नीचे बैठकर पढ़ रहे हैं।
अभी हाल ही में जाने माने साहित्यकार (मुझे लगता है कि यह लिखने की जरूरत नहीं है) Uday Prakash से मिला था। किसी देश के बारे में चर्चा होने लगी तो उन्होंने कहा कि अब वहीं रह कर कुछ लिखूंगा, यहां लिख नहीं पा रहा हूं। बताने लगे कि 24 घंटे लाइब्रेरी खुलती है। किसी से कोई सदस्यता शुल्क नहीं लिया जाता। जिसकी मर्जी हो जाए, और जब तक मन हो, दिन रात पढ़े। मैं खुश और हतप्रभ होकर उनकी बातें सुनते रहा कि क्या भारत में भी कभी यह हो पाएगा?
मुझे भी करीब डेढ़ दशक पहले बीएचयू में पढने का मौका मिला। मेरा सामान्य अनुभव है कि अगर कोई विद्यार्थी लाइब्रेरी में जाता है तो क्लास से ज्यादा हर हाल में पढ़ लेता है। करीब 4 साल तक गोरखपुर की रेलवे लाइब्रेरी में जाता रहा। बीएचयू में लाइब्रेरी में जाना कम ही था, लेकिन लाइब्रेरी शानदार है। पुस्तकें भरी हैं।
लाइब्रेरी लंदन विश्वविद्यालय के पुस्तकालय भवन के डिजाइन की है। शानदार। किताबें भी हैं। और शायद वहां बैठकर पढ़ने की इच्छा रखने वाले बच्चे भी हैं। दुख की बात है कि वह पठन पाठन वाला कल्चर कहां से आए। क्या विश्वविद्यालयों के विभिन्न प्रमुख पदों को कब्जियाए मनुवादी, पोंगापंथी पंडित बच्चों को पढ़ने देंगे?
हालांकि मौजूदा सरकार से उम्मीद करना कठिन है कि वह छात्रों के हित में फैसले करेगी। उसका अभियान तो शिक्षण संस्थानों के डाउन का है, जबकि बच्चे ओपन की मांग कर रहे हैं।
फिर भी... इस सरकार से अनुरोध है कि बच्चे अगर पढ़ना चाहते हैं तो उन्हें पढ़ने दिया जाए। अगर पूरी लाइब्रेरी नहीं खोली जा सकती है तो जितने बच्चे आ रहे हैं, उनके लिए एक सेक्शन खोल दिया जाए। अगर रात में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ती है तो उसी के मुताबिक कुछ और पोर्शन खोला जाए।
पढ़ने दीजिए सरकार। बच्चों को पढ़ने दीजिए। एक जेएनयू है जिसका दुनिया में नाम है। उसकी तो आप लोग रेड़ मारे पड़े हैं। फिर भी मेरा अनुरोध यही होगा कि जो बच्चे पढ़ रहे हैं उन्हें पढ़ने दिया जाए। इसमें कोई खजाना नहीं लुट जाने वाला है देश का।
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Photo courtesy : Vikas Singh
सत्येंद्र प्रताप सिंह की फेसबुक टाइमलाइन से साभार