डियर मोदीजी अब किस मुंह से पाकिस्तान को कश्मीर पर न बोलने की चेतावनी देंगे?
महेंद्र मिश्र
प्रधानमंत्री मोदी ने रविवार को कोझीकोड से पाकिस्तान की जनता से संवाद स्थापित किया। ...और उसके अगले ही दिन दिल्ली आकर उसका पानी बंद करने में जुट गए।
इस कड़ी में मोदी साहब ने पहले मंत्रियों और आला अफसरों की बैठक की। और फिर सिंधु नदी समझौते की समीक्षा के लिए मंत्रियों के एक समूह का गठन कर दिया। साथ ही पानी-खून एक साथ नहीं बहने का फिल्मी मार्का नया जुमला भी दे दिया।
लेकिन पानी रोकने के बाद क्या खून नहीं बहेगा?
ठहरकर इस पर दो मिनट सोचने की जरूरत है। या तो देश का नेतृत्व इतना दिग्रभमित और दिशाहीन हो गया है। या फिर यह किसी बड़ी साजिश का हिस्सा है। जिसमें भारत की जनता को स्थाई तौर पर पाक की जनता के खिलाफ खड़ा कर देना है। या फिर यह युद्ध के हजारों साल तक खींचने की व्यवस्था है।
अनायास नहीं संघ और उससे जुड़े लोग पाकिस्तान का पूरा नामो-निशान मिटाने की बात करते रहते हैं।
लोग पूछ रहे हैं कि आखिरकार सिंधु नदी का पानी रोककर कहां ले जाएंगे? या फिर चंद दिनों के भीतर कोई ऐसा बांध खड़ा कर देंगे जिसमें सारा पानी समा जाएगा?
कश्मीर ने अभी एक साल पहले ही बाढ़ की विभीषिका देखी है।
क्या एक बार फिर उसे डुबोने का इरादा है? दो देशों के बीच की यह संधि एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है। ऐसे में क्या आप इसके जरिये कश्मीर समेत पूरे मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण नहीं कर रहे हैं?
जिस कश्मीर पर बातचीत में आप पाकिस्तान को भी नहीं शामिल करना चाहते हैं, अब उस पर पूरी दुनिया में चर्चा करवा रहे हैं।

कुछ लोग तो यह भी पूछ रहे हैं कि खुदा न खास्ता तिब्बत से निकलने वाली इन नदियों के पानी की अगर चीन ने समीक्षा शुरू कर दी? तब क्या होगा?
सिर्फ यही नहीं इसी कतार में रावी, व्यास, सतलज, झेलम और चेनाब भी हैं। जो चीन से निकलती हैं। और चीन पाकिस्तान के करीब है। यह बात जगजाहिर है। ऐसे में अगर उसकी दोस्ती हिलोरे मारने लगी। और उसने इन समझौतों की समीक्षा शुरू कर दी तब?
इसलिए कोई भी कदम उठाने से पहले उसके नतीजों पर सरकार को जरूर गौर करना चाहिए।
पाक विरोध की आग में खुद के भी हाथ जलने की तमाम आशंकाएं हैं।
ऐसा न हो कि एक से बचे तो दूसरे में फंसे।
किसी भी अंतरराष्ट्रीय मसले में कूटनीति की केंद्रीय भूमिका होती है। और अभी तक इस मामले में पाक हमसे 20 है। चीन हर स्तर पर उसके साथ है। रूस उसके साथ सैन्याभ्यास कर रहा है। और अमेरिका ने भी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए उसकी पीठ थपथपाई है। ऐसे में हमारी स्थिति थोड़ी नाजुक है। लिहाजा सरकार की एक भी गलत हरकत पूरे देश पर भारी पड़ सकती है।
सुषमा स्वराज के यूएन भाषण की बड़ी तारीफ हो रही है।
कुछ लोग तो लट्टू हुए जा रहे हैं। इसमें ऐसे लोग ज्यादा हैं जो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का क भी नहीं जानते। उनके लिए हिंदी में दिया गया भाषण और पाक विरोध ही काफी है। क्योंकि उनके लिए अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मतलब है पाक और चीन विरोध।
भाषण की कलात्मकता एक बात है, लेकिन उसकी अंतर्वस्तु किसी भी लिहाज से भारत की जरूरत और उसकी हैसियत में फिट नहीं बैठती है।
इस भाषण से देश को कम पाकिस्तान को ज्यादा फायदा हुआ, क्योंकि पाक इसके जरिये एक बार फिर कश्मीर मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण करने में सफल रहा।
अगर आप सचमुच में बड़ी ताकत हैं तो किसी एक मसले को अंतरराष्ट्रीय संस्था में केंद्रित करने का कोई मतलब ही नहीं था। ऐसी हालत में जबकि आपके पास अलापने के लिए वही पुराना राग हो। बलूचिस्तान का जिक्र कर आप ने अपने उन्हीं सिद्धांतों पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है, जिसके तहत पाकिस्तान को भारत के अंदरूनी मामलों में दखल देने के लिए घेरते रहे हैं।

अब किस मुंह से पा किस्तान को कश्मीर पर न बोलने की चेतावनी देंगे?
पाक को आतंकी राष्ट्र बताना और दूसरे देशों से उसे अलग-थलग करने की मांग करना, अगर कोई जुमला नहीं है तो सबसे पहले इसकी शुरुआत भारत से होगी।
सिंधु का पानी बंद करने से पहले पाक से सारे राजनयिक रिश्ते खत्म करने होंगे। दूतावास बंद होगा। बसों की आवाजाही रुकेगी। पाक का एमएफएन स्टैटस रद्द होगा। तब उसके बाद किसी दूसरे मुल्क से कोई कदम उठाने के लिए कहा जा सकता है। लेकिन इसके लिए भी तमाम प्रभावशाली देशों का अपने पक्ष में समर्थन हासिल करना होगा।

दरअसल मोदी साहब और संघ के जेहन में पाक एक ग्रंथि है।
विश्वगुरू और अंतरराष्ट्रीय ताकत बनने की तमाम लफ्फाजियों के बाद पूरा मामला उसी पर आकर केंद्रित हो जाता है। अनायास नहीं एक समय अमेरिका और चीन के समानांतर देश को खड़ा करने के दावों के बाद अब मोदी जी पाक से मुकाबला कर रहे हैं। विकास की मैराथनी दौड़ में मोदी जी पाकिस्तान तक पहुंचते-पहुंचते हांफने लगते हैं। बाकी की दौड़ अमेरिका के सहारे पूरी करना चाहते हैं।
आधी से ज्यादा दुनिया के देशों की यात्रा के बाद कुल जमा हासिल यह है कि एक भी मुल्क खुलकर भारत के साथ नहीं है। और हम अब पाकिस्तान से जूझ रहे हैं। मोदी जी यही चाहते भी हैं। इसीलिए उन्होंने जल्दी-जल्दी सारे देशों की यात्राएं पूरी कर लीं। नवाज शरीफ को बुला भी लिया और उनके बिन बुलाए मेहमान भी हो गए। जिससे कोई यह न कह पाए कि आपने कोई प्रयास ही नहीं किया। क्योंकि 2019 की वैतरणी की पाक ही नैया है। इसलिए अब घर में बैठकर पूरे दो साल पाक के खिलाफ माहौल बनाया जाएगा। और अगर उससे भी सदन में बहुमत मिलता नहीं दिखा।

फिर युद्ध तो आखिरी विकल्प है ही।
पाकिस्तान के बहाने पूरा जोर देश में जनता की गोलबंदी और उसके सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर है।
अनायास नहीं मोदी साहब ने पाक को नसीहत देते-देते देश के मुसलमानों के शुद्धीकरण की सलाह दे डाली। इतना ही नहीं कालीकट के कोझीकोड बनने का हवाला देकर उन्होंने मुसलमानों को अपनी जड़ों की ओर लौटने का आह्वान तक कर डाला।
प्रधानमंत्री जी अपने पद की गरिमा भले भूल गए हों। लेकिन उन्हें संविधान और उसके सम्मान का तो जरूर ख्याल रखना चाहिए।

मोदी जी का भाषण घृणास्पद होने के साथ आपत्तिजनक भी है।
यह खतरनाक और घोर सांप्रदायिक है। 1200 साल की गुलामी से छुटकारा पाने वाले भाषण के बाद यह दूसरा मौका है जब खुलेआम उन्होंने अपने फिरकावाराना मंसूबों का इजहार किया है।
दरअसल इसके पीछे देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की साजिश है।
पाकिस्तान पर हमले की खिचड़ी तो पकती रहेगी। लेकिन उसके साथ ही घर में सांप्रदायिक तवे को गरम करना जरूरी है। क्योंकि आखिर में वोट की रोटी तो उसी पर सिंकनी है। गणवेशधारियों और उनके समर्थकों ने तो इसकी शुरुआत कर ही दी थी। अब कमान मोदी जी ने संभाल ली है।