ओवैसी तकरीर के नेता हैं, मुसलमानों के प्रवीण तोगड़िया हैं।
औवैसी भी जामा मस्ज़िद के बुखारी ही साबित होंगे।
जब से असुद्दीन ओवैसी किशनगंज आए और अपनी इंक्लाबी तकरीर दी, तब से उनके असर के बारे में सोच और समझने की कोशिश कर रहा हूं।
कभी जवानी में किशनगंज गया था, फिर जा नहीं पाया। किशनगंज गज़ब का कसबा है। इसे मुस्लिम बहुल माना जाता है, हमारे मुल्क के राष्ट्रवादियों ने यहां बड़ी कोशिश की दंगा – फसाद कराने की – पर कभी हुआ नहीं।
असली कारण यह है कि यहां के हिंदू कारोबारी नहीं चाहते कि दंगा – फसाद हो। यही ख़्याल कुछ कुछ गरीब़ – कुछ कुछ अमीर किसानों का भी है।
वह किशनगंज अख्तर उल ईमान की दावत पर गए। ईमान बड़ी ऊंची चीज़ हैं। कोचाधामन विधान सभा क्षेत्र से राजद के विधायक हुआ करते थे। राजद छोड़ कर जदयू में शामिल हो गए और जदयू ने उन्हें किशनगंज से लोकसभा का टिकट भी दे दिया। उन्होने नामांकन के बाद ऐलान किया कि कांग्रेस के मौलाना असरारुल हक़ के लिए नामांकन के बाद मौलाना के हिमायत का फ़ैसला लिया। मौलाना ही जीते, ईमान लड़ते तो भी हारते, क्योंकि मौलाना कभी आज़ाद उम्मीदवार, कभी समाजवादी पार्टी से, कभी कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर लड़ते रहे और 2009 में और 2014 में जीते। मौलाना किशनगंज की ज़मीन से जुड़े हैं।
ओवैसी तकरीर के नेता हैं, मुसलमानों के प्रवीण तोगड़िया हैं। वह भीड़ जमा कर लेते हैं, पर वोट जमा करना उनके लिए मुश्किल होगा।
औवैसी भी जामा मस्ज़िद के बुखारी ही साबित होंगे। वह बेहतरीन सांसद हैं, पर हिंदुस्तान का किशनगंज और बिहार का सीमांचल हैदराबाद नहीं हो सकता।
जुगनू शारदेय
जुगनू शारदेय लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. फिलहाल सलाहकार संपादक ( हिंदी ) – दानिश बुक्स