मोहन धारिया : वह पीढ़ी खत्म हो रही है
मोहन धारिया : वह पीढ़ी खत्म हो रही है
चंचल
कल मोहन धारिया के निधन की खबर मिली।
अच्छा नहीं लगा, यह जानते हुये भी कि उम्र हो चुकी थी। मोहन धारिया समाजवादी आंदोलन से निकले थे और आजीवन समाजवादी मूल्यों के लिये लड़ते रहे। 1975 में जब श्रीमती इंदिरा गांधी ने संसद में संविधान संशोधन कर के आपातकाल की घोषणा की तो जिन लोगों ने कांग्रेस में रहते हुये उस संशोधन का मुखर विरोध किया उसमे मोहन धारिया प्रमुख थे।
गौर तलब है कि ये मोहन धारिया वही थे जिन्होंने 1969 में जब इंदिरा गांधी को कांग्रेस से बाहर किया गया था तब इंदिरा जी के साथ कांग्रेस से बाहर आये थे। इन्हें 'यंग तुर्क' के नाम से बुलाया जाता था। इनमे चंद्रशेखर, मोहन धारिया, कृष्णकांत, राम धन और अर्जुन अरोड़ा भी थे। आपातकाल की घोषणा होते ही सब के सब जेल में डाल दिये गये। 77 में देश ने परिवर्तन देखा और जनता पार्टी की सरकार बनी तो मोहन धारिया कॉमर्स मिनिस्टर बने।
77 का ही वाकया है। मै जॉर्ज (जॉर्ज फर्नांडीज़) के पास बैठा था। जॉर्ज ने कहा कि तुम मोहन के पास चले जाओ और उनके साथ कृष्णकांत के घर पहुँचो। मैं कहीं और जा रहा हूँ, वहाँ से सीधे कृष्ण कान्त के घर पहुँचूँगा। उद्योग भवन में जहाँ मोहन धारिया का दफ्तर था वहाँ पहुचा तो धारिया साहब तैयार बैठे थे। हम दोनों के बीच उम्र और अनुभव का लम्बा फासला था। लेकिन रास्ते में जिस तरह की बात हुयी उससे बार-बार हमें यह लगा कि ये लोग वाकई कितने बड़े हैं। उससे बड़ी मेरी उपलब्धि रही कृष्ण कान्त से मिलना। (कृष्णकांत जी बाद में देश के उपराष्ट्रपति भी बने )।
कृष्ण कान्त के घर की सादगी ने बहुत कुछ बता दिया। और जब उनकी माँ ने अपने हाथ से बनाया हुआ पोहा लेकर खुद हाजिर हुयीं तो मोहन धारिया ने खुद खड़े होकर पहले अभिवादन किया और बोले- माई इस बार हमें कम से कम एक टोपी तो बना देना। और सब हँसने लगे। हमें 'टोपी' का प्रकरण नहीं मालूम था। इतने में जॉर्ज भी आ गये। और बात बहुत सहज ढंग से होने लगी। सबसे बड़ी बात जो लगी कि इन चारों में कोई भी ऐसा नहीं रहा जिसने बात चीत में मुझे शामिल होने के लिये न उकसाया हो। चाय पीते-पीते हमने मोहन जी से पूछा- यह टोपी का का क्या मामला है। उस दिन पता चला कि कृष्ण कान्त के हर जन्म दिन पर उनकी माँ अपने द्वारा
काते हुये सूत की धोती देती थी।
वह पीढ़ी खत्म हो रही है।
कल मोहन धारिया के निधन ने उस पीढ़ी को फिर याद दिलाया। सलाम मोहन।
सदाशयता, धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र और 'गाँव' कांग्रेस का उद्येश्य है, यही उसकी ताकत है। आज यही सब कुछ कांग्रेस की परम्परा में ढल गया है। कांग्रेस इसी 'धर्म ' के साथ जी रही है। अभी जब हम प्रसिद्ध समाजवादी मोहन धरिया के निधन पर शोक व्यक्त रहे थे, भाई धर्मेन्द्र राय ने फेसबुक पर याद दिलाया कि इन्ही मोहन धारिया जो आपातकाल के बाद श्रीमती इंदिरागांधी के कटु आलोचक हो गये थे और वर्तमान राजनीति की मौजूदा तमीज से ऊबकर गाँव की तरफ मुड़ गये थे, को मौजूदा कांग्रेस अध्यक्ष श्री मती सोनिया गांधी ने 26 वाँ इंदिरा गांधी एकता पुरस्कार (इंदिरा गांधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार) दे कर सम्मानित किया था।
मत भेद अपनी जगह होता है और 'देश रचना' के प्रति उसकी प्रतिबद्धता अपनी जगह। कांग्रेस उसका निर्वहन करती है। ...और दूसरे लोग ?
धन्यवाद सोनिया जी !


