म्यांमार-मोदी को नहीं दोष गुसांई, संघी हैं प्रोपेगण्डा में माहिर
म्यांमार-मोदी को नहीं दोष गुसांई, संघी हैं प्रोपेगण्डा में माहिर
कश्मीर में अलगाववादियों के सामने समर्पण से ध्यान हटाने की ओछी हरकत म्यांमार में सैनिक कार्यवाही का प्रोपेगण्डा
म्यांमार में सैनिक कार्यवाही
म्यांमार में भारतीय सेना ने उग्रवादियों के खिलाफ जो कार्यवाही की है, उसको लेकर पूरे भारतीय उप महाद्वीप में बड़ी हलचल है। स्वाभाविक भी है एक देश ने दूसरे देश की संप्रभुता को ललकारते हुये यह कार्यवाही की है। यद्यपि यह दावा भारतीय सेना द्वारा किया जा रहा है कि उसने म्यांमार में घुसकर उग्रवादियों के कैम्पों को तहस-नहस किया है, जबकि म्यांमार का कथन है कि ऐसा नहीं है उनकी टेरीटेरी में ऐसी कोई कार्यवाही नहीं हुई है।
जो भी हो, इतना तय है कि भारतीय सेना ने कुछ दिन पहले मणिपुर में मारे गये सेना के 18 जवानों की नृशंस हत्या का बदला ले लिया है। अब उस पर राजनीति जारी है जो कि आज चर्चा का विषय है। इस कार्यवाही पर भारतीय जनता पार्टी के नेतागण अति उत्साहित हैं जम्मू और कश्मीर में जिस प्रकार भारतीय जनता पार्टी की भद्द पिट रही है, उससे ध्यान बंटाने की मुहिम अधिक प्रतीत होती है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का दूसरा ही नाम भारतीय जनता पार्टी है। ये लोग इस कार्यवाही को हाईलाइट कर जम्मू और कश्मीर में भारत विरोधी प्रदर्शनों एवं कारगुजारियों से देश की जनता का ध्यान हटाना चाहते हैं। संघ के लोग प्रचार में सदैव माहिर रहे हैं और यह कुख्यात है कि संघ के लोगों को धजी का सांप बनाने में महारत हॉसिल है। गॉंधी के युग में इन लोगों ने तमाम ऐसे दुष्प्रचार किये जिससे हिन्दुओं ने गाँधी के आन्दोलन पर ही उंगलियॉं उठाना शुरू कर दिया था। जिन्ना और इसी प्रकार के हिन्दू भावनाओं को भड़काने वाले दलों ने देश का विभाजन करा दिया। फिर भी स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय जनमानस ने एक लम्बे समय तक इन्हें नहीं स्वीकारा। किन्तु दुर्भाग्यवश कांग्रेस कमजोर होती गयी और इन लोगों को दुष्प्रचार का लाभ मिलने लगा। जहाँ लोग इनकी बातों को कभी तवज्जो नहीं देते थे अब इनके दुष्प्रचारों को ध्यान से सुनने लगे हैं।
यदि कोई कहे कि मोदी ने जब से भाजपा पार्टी की कमान संभाली है तभी से मार्केटिंग कर फेस लिफ्टिंग का कार्य प्रारम्भ है, तो यह कथन गलत है। संघ के लोग मार्केटिंग में सदैव माहिर रहे हैं। 1998 में कारगिल में जो घुसपैठ हुई थी, उसकी जबरदस्त मार्केटिंग की गयी थी। कारगिल की घुसपैठ को युद्ध का नाम दिया गया, जबकि वह एक घुसपैठ ही थी, उस घुसपैठ में भारत को कुछ भी हासिल नहीं हुआ, किन्तु प्रचार यह किया गया कि कारगिल का युद्ध वाजपेई जी के नेतृत्व में जीत लिया गया है। पहली बार टेलीविजन पर भारतीय सेना के जवानों के मृत शरीरों के दाह संस्कार आदि के दृश्य दिखाये गये। मृत भारतीय सैनिकों के दाह संस्कार एवं उन्हें सरकारी योजनाओं से लाभान्वित किये जाने वाली कार्यवाहियों को हाईलाइट किया गया, यह भी मार्केटिंग का हिस्सा था।........जारी..... यहां क्लिक करके आगे पढ़ें
लब्बोलुवाब यह कि 1999 में देश ने यह जाना कि वाजपेई जी के नेतृत्व में 1971 की पाकिस्तान की लड़ाई की तरह देश ने कारगिल युद्ध जीत लिया है। मार्केटिंग का ही कमाल था कि कारगिल में हमारी विफलता को सफलता का सेहरा पहना दिया गया। फलतः 1999 के आम चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को दूसरे दलों के साथ सहयोग कर 5 साल सरकार चलाने का मौका मिला।
आम चुनावों से पहले मोदी ने अपनी सभाओं में बड़े-बड़े दावे किये थे देश को बताया गया था कि मोदी का सीना 56 इंच का है। 56 इंच के सीने से पाकिस्तान और चीन जैसे मुल्कों से मुकाबला किया जा सकता है। जनता को विश्वास हो गया उन्होंने यह भी देखा कि मनमोहन सिंह का सीना तो 36 इंच का भी नहीं है, वह बेचारे कैसे मुकाबला करेंगे ? परिणाम यह कि भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिल गया। 56 इंच के सीने वाला व्यक्ति प्रधानमंत्री बन गया। 56 इंच के सीने वाले प्रधानमंत्री ने अति उत्साह में सभी कुछ उलट-पुलट कर देखना शुरू कर दिया, उसे यह भी लगा कि विदेश नीति में हाथ आजमाना चाहिये। अभी तक की विदेश नीति भी कांग्रेसियों द्वारा बनाई गयी है, इसमें भी आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। अति आत्म विश्वास के भरे 56 इंच सीने वाले प्रधानमंत्री ने पड़ोसी मुल्क नवाज शरीफ को देश में शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने का न्योता दे डाला। देश ने देखा कि नवाज शरीफ भीगी बिल्ली बने शपथ ग्रहण समारोह में बैठे हैं, अब तो वह मोदी के सामने म्याऊॅं-म्याऊॅं करेंगे। किन्तु जैसे ही नवाज शरीफ सरहदों के उस पार पहुँचे फिर दहाड़ने लगे। 56 इंच सीने वाले को झटका लगा विदेश नीति में बदलाव के पहले कदम पर ही झटका लग गया था, किन्तु स्वीकार भी कैसे किया जाये। ऐसा ही कुछ चीन के साथ भी हुआ चीन के राष्ट्रपति का स्वागत सभी परम्पराओं को तोड़कर किया गया किन्तु जैसे ही राष्ट्रपति अपने देश में पहुँचे चीनी सैनिकों ने जबाव में लद्दाख में घुसपैठ कर डाली, बमुश्किल उन्हें वापस भेज कर देश की सरकार ने चैन की सांस ली।
भारतीय जनता पार्टी के लिये जम्मू और कश्मीर की सरकार गले की हड्डी बन गयी है, जब से वहाँ भाजपा के गठबन्धन के साथ नई सरकार अस्तित्व में आई है, वहाँ पर अब जो घट रहा है वह पहले कभी नहीं घटा। भारतीय जनता पार्टी के रण बाँकुरे केवल दहाड़ कर रह जाते हैं कर कुछ नहीं पा रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी के गृहमंत्री संसद में बयान देते हैं कि पाकिस्तान के समर्थन में जो नारे व बैनर घाटी में प्रदर्शित किये जा रहे हैं, उन्हें किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जायेगा, जबकि सारा देश जान रहा है कि जम्मू-कश्मीर की गठबन्धन सरकार के मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद का संरक्षण उन्हें मिला हुआ है, फिर यह बर्दाश्त न कर पाने वाली बात कहना देश को बेवकूफ बनाना नहीं तो और क्या है ? विदेश नीति में पूरी तरह विफल प्रधानमंत्री मोदी को म्यांमार में सैनिक कार्यवाही संजीवनी की तरह लग रही है। इसलिये इस घटना को हाईलाइट किया जा रहा है। खरीदे गये टी0वी0 समाचार चैनलों पर डिवेट चल रहे हैं, सोशल मीडिया पर इस घटना के प्रचार का घमासान मचा हुआ है। प्रोजेक्ट किया जा रहा है कि 56 इंच के सीने वाले ने विश्व जीत लिया है, किन्तु एक सवाल अवश्य है कि इस घटना से भारत के पड़ोसी मुल्कों से सम्बन्ध अब और खराब होंगे। किसी दूसरे राष्ट्र की टेरीटेरी में घुस कर कार्यवाही करने की बात को लेकर हम आज चाहे जितना खुशी मना लें, लेकिन इस तरह की कार्यवाहियों से देश की सीमायें अस्थिर होंगी, कहीं देश को एक और युद्ध के लिये तैयार न होना पड़े।
अनामदास


