एच एल दुसाध

इसमें कोई शक नहीं कि बहुजन समाज में जन्मे अखिलेश यादव एक बहुत ही सज्जन और मिलनसार नेता हैं, जिनमें भविष्य के एक पीएम का मैटेरियल है. किन्तु जिस तरह वह विकास और सिर्फ विकास के जरिये सत्ता में आने का प्रयास कर रहे हैं, वह सामाजिक न्याय की राजनीति के लिए घातक है. यदि उनके विकास का मुद्दा क्लिक कर जाता है तो निरंतर कमजोर पड़ती सामाजिक न्याय की राजनीति का अंत हो जाएगा. तब तमाम बहुजन नेता/नेत्री सामाजिक न्याय की पूरी तरह अनदेखी करते हुए विकास के मुद्दे पर मुस्तैद हो जायेंगे. ऐसा होने पर शक्ति के स्रोतों बहुजनों की भागीदारी सपना बन जाएगी और टॉप की जिस 10 प्रतिशत आबादी का संपदा और संसाधनों सहित शक्ति के स्रोतों पर 80-85 %कब्ज़ा है, उसे तोड़ना और मुश्किल हो जायेगा.

अतः आप ऐसा कुछ करें जिससे भविष्य का अन्यतम बहुजन पीएम विपक्ष का अनुभव लेने के लिए बाध्य हो.

यदि आप उनके विकास के मुद्दे को ख़ारिज कर देते हैं, भविष्य में सामाजिक न्यायवादी अखिलेश का उभार देख पाएंगे, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है.

एच एल दुसाधविकास : नई सदी में बहुजनों के खिलाफ सबसे बड़ी साजिश

मित्रों, नई सदी में मोदी के लोगों ने विकास के मुद्दे का जो शोर मचाया, वह बहुजन समाज के खिलाफ सबसे भयावह साजिश साबित हुआ. इसके चलते बाबा साहेब ने 1949 में आर्थिक और सामाजिक गैर-बराबरी के खात्मे का जो आह्वान किया था, वह नई सदी में बहुजनों में आई पर्याप्त जागरूकता के बावजूद बड़ा मुद्दा नहीं बन पाया. विकास के चमकीले आवरण में शक्ति के स्रोतों पर परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त 80-85 प्रतिशत कब्जे को बहुजनों की नज़रों से ओझल कर दिया. इसके चमक-दमक में नई सदी में बहुजनों की तमाम क्षेत्रों में भागीदारी का मुद्दा परवान न चढ़ सका.

बहुजनों का सर्वनाश करने वाला ‘विकास’ का मुद्दा उस यूपी की फिजां में फिर गूंज रहा है, जहां से देश की दिशा तय होती है.

क्या यूपी का जागरूक बहुजन विकासवादियों को सबक सिखाने के लिए कमर कसेगा?