चंचल
ये बोलने नहीं देंगे। ये सुनेंगे नहीं। ये मानेंगे नहीं। क्यों कि केंद्र में इनकी सरकार है। देश के दो बड़े विश्वविद्यालय, काशी विश्वविद्यालय और प्रयाग विश्वविद्यालय में यह खेल खुल्लम खुल्ला हो रहा है। हैदराबाद भी इसमें शामिल है। अभी पता नहीं कहाँ-कहाँ यह खेल होगा।
आज प्रयाग विश्वविद्यालय में प्रसिद्ध चिंतक और नुकीले पत्रकार सिद्धार्थ वर्धराजन को नहीं बोलने दिया गया। छात्र संघ अध्यक्ष सुश्री ऋचा सिंह अपनी बात पर अड़ी रहीं। चड्ढी वालों ने पूरी ताकत लगा कर अध्यक्ष के समर्थकों को गरियाया, मारपीट पर आमादा रहे।
यह कोई अनहोनी बात नहीं है। विश्वविद्यालय ने अगर मना किया तो कोई बात नहीं, यह सभा कहीं और कर लेते। “न मारेंगे, न मानेंगे”, के हिसाब से सिद्धार्थ कहीं भी बोलते,चर्चा तो होती ही, बल्कि कुछ ज्यादा ही।
1974 का एक वाकया है। भाई मोहन प्रकाश काशी विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थे, अंजना प्रकाश जी उपाध्यक्ष थीं। जे पी आंदोलन पूरे जोर पर था। देबू दा यानी देवब्रत मजूमदार ने हमें जिम्मेवारी दी कि जे पी को विश्वविद्यालय लाना है। हम 1972 में ही जे पी के नजदीक हो गए थे, जब जे पी विश्वविद्यालय में इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती थे।
हम सीधे पटना और कदम कुवा उनके आवास पर गए। जे पी अपने आवास के पहले माले पर बैठे दाढ़ी बना रहे थे, साथ सच्चिदा नन्द जी थे।
हमने आने का कारण बताया।
जे पी बोले हम नहीं आएंगे, क्यों कि कुलपति कालू लाल श्रीमाली नहीं चाहते कि हम विश्वविद्यालय में आएं।
हमने कहा लेकिन हम आपको ले चलेंगे।
बोले कि हम बनारस तो कई बार बोल चुके हैं।
हमने कहा हम आपको बनारस नहीं बुला रहे हैं, हमारे पास एक जगह और है। उसे no man’s land कहते हैं। वह बनारस और विश्वविद्यालय के बीच है, जहां मालवीय जी खड़े हैं। उसे सिंह द्वार कहते हैं, वहाँ किसी की हुकूमत नहीं चलती।
जे पी हँसे थे। बोले, चलो वहाँ आऊँगा। और आये थे। इतिहास बदल गया था। वही इतिहास अपने को दुहराने जा रहा है। फैज साब की एक सतर है
लाजिम है हम देखेंगे
जो लौह अजल पर लिखा है
सब ताज उड़ाए जाएंगे
सब तख़्त गिराये जाएंगे।
यह इनके रुखसती का वक्त है, अपढ़ों का खेल है कितनी देर टिकेगा ?
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