यह कैसा लोकतन्त्र है जहाँ सरकार का विरोध करो तो लाठी गोली मिलती है
संध्या नवोदिता
पुलिस आखिर इतनी बेरहमी से क्यों पीटती है! यह कैसा लोकतन्त्र है जहाँ सरकार का विरोध करो तो लाठी गोली मिलती है!!
हमारे ही चुने हुए जन प्रतिनिधि कैसे जनता की जान लेने पर तुल जाते हैं ! जनता का ही पैसा, जनता की मेहनत पर ही चन्द लोग जनप्रतिनिधि की जगह शासक और गुलाम का बर्ताव करने लगते हैं।
वैसे तो यह जगह भारत में कोई भी हो सकती है, क्योंकि हर राज्य , हर शहर, हर गाँव में पुलिस का गरीब आदमी से यही दमनकारी रवैया है।

फिलहाल यह जगह सुशासन बाबू का राज्य है।
भागलपुर में जिलाधिकारी कार्यालय पर चार दिनों से आमरण अनशन पर बैठे प्रदर्शनकारियों पर कल यानी 8 दिसम्बर पुलिस ने कैसा कहर बरपाया है तस्वीरें गवाह हैं।
तस्वीरें इस बात की भी गवाह हैं कि गरीबों की जमीनें छीन कर चन्द अमीरों को देने के लिए सरकारें पागल हुई जा रही हैं। और अपने पागलपन में वे जनता को कुचल रही हैं।
रूपेश कुमार सिंह बताते हैं कि नीतीश कुमार ने डी. बंदोपाध्याय की अध्यक्षता में भूमि सुधार आयोग का गठन किया था, जिसने अपनी रिपोर्ट में लाखों एकड़ जमीन गैरमजुरवा, सीलिंग से फाजिल जमीन व भूदान की जमीन होने की बात कही थी और साथ में लाखों भूमिहीन परिवार के होने की बात भी कही थी।

लेकिन नीतीश कुमार ने बिहार के सामंतों, अपराधियों व भूमिचोरों के सामने घुटने टेकते हुए डी. बंदोपाध्याय की रिपोर्ट को रद्दी की टोकरी में फेंक दिया क्योंकि इन सारे जमीनों पर उनके वोट मैनेजरों का ही कब्जा है।
वैसे अभी के विपक्ष भाजपा भी उस समय सत्ता में हिस्सेदार थी और राजद विपक्ष में था लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि बिहार में वामदलों को छोड़कर किसी ने भी भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का दबाव नहीं बनाया।
वामदलों में भी माले ने जरूर कुछ धरना-प्रदर्शनों के जरिए और इसे 2010 में अपना चुनावी मुद्दा भी बनाकर भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का दबाव बनाना चाहा, लेकिन सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगी।
भूमिहीन परिवार सिर्फ बिहार में ही नहीं बल्कि पूरे देश में एक बदतर जिंदगी जीने को विवश है। कहीं - कहीं सरकार ने अगर भूमिहीनों को जमीन का पर्चा दे भी दिया है तो दशकों से वे उसपर कब्जा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

कोई भी सरकार भूमि सुधार नहीं चाहती
रूपेश कुमार कहते हैं भागलपुर में काम करते वक्त मैं ऐसे हजारों परिवारों से मिला था, जिनको जमीन का परचा तो मिल गया है लेकिन अब तक कब्जा नहीं मिला था और उनकी सारी जमीने सत्ता संरक्षित अपराधियों के कब्जे में थी।
एक बात पूरी तरह से साफ है कि कोई भी सरकार भूमि सुधार नहीं चाहती और अगर भूमिहीनों को जमीन चाहिए तो सरकार से भीख मांगने के बजाय बिहार के गौरवशाली किसान आंदोलन का रास्ता अख्तियार करना चाहिए और "जोतनेवालों के हाथ में जमीन" के नारे के साथ ऐसी सारी बेनामी जमीन पर कब्जा कर लेना चाहिए।