यह सरकारी जमीन है
यह सरकारी जमीन है
जुगनू शारदेय
घोंघा प्रसाद ने वसंत लाल से पूछा , दिख नहीं रहा है आपको – साफ साफ लिखा है कि यहां लघु शंका मना है ।इसीलिए तो कर रहा हूं क्योंकि यह लघु शंका है , वसंत लाल ने बड़ी लंबी सांस के साथ जवाब दिया , आपके पास इस शंका का कोई समाधान है । नहीं न , फिर इसलिए अपनी लघु शंका का समाधान कर रहा हूं क्योंकि यह सरकारी जमीन है ।
दुखी मन से घोंघा प्रसाद जी ममता मइया माता राम की शरण में पहुंचे ।
भरोसा था कि माता राम सरकारी जमीन की लघु शंका को समाप्त करंगी । माता राम अपने घर का कूड़ा कचरा साफ करने की कोशिश कर रही थीं । अब माता राम का संकट यह था कि सारा जाल जंजाल उनका ही फैलाया हुआ था । घोंघा प्रसाद को बड़ा दुख हुआ कि अपने घर का कुड़ा कचरा माता राम घर के बाहर की सड़क पर फेंक रही थीं । घोंघा जी वहां घोंघियाए , माते आप भी !
हां, भइए , धनमन बात बात पर हमारी बात मान कर भी नहीं मानता । कुड़ा कचरा तो साफ ही नहीं करता । ऐसी हालत में क्या करुं – फिर यह सरकारी जमीन है । घोंघा को लगा कि सरकारी जमीन पर लघु शंका का समाधान , कचरा की सफाई के खिलाफ मीडिया में जाना चाहिए । यह समय है कि जनता को जागृत किया जाए ।अखबार लाल और ब्रोकेन न्यूज कुमार पास के पड़ोसी जैसे थे । कहीं न हो कर सब जगह होते थे ।
यह क्या दोनों एक साथ बैठ कर सोचते हुए पिच पिच जमीन पर अपना थूक दान करते हुए अपनी सनसनी के बारे में बतिया रहे थे । कुछ डर कर , कुछ साहस भर कर घोंघा ने कहा , आप भी जमीन पर पिच पिच कर रहे हो ।
दोनों घोंघा पर कुछ इस तरह टूट पड़े , जैसे घोंघा न हो कर सड़ा हुआ समाचार हो । तुरत ब्रोकेन न्यूज की पट्टी पर चल रहा था – जनता समझे कि यह सरकारी जमीन है । अखबार लाल का बैनर था सिंगुर का संदेश – यह सरकारी जमीन है ।
घोंघा प्रसाद की समझ में न आए कि हर काम सरकरी जमीन पर ही क्यों हो रहा है । क्या यह गरीबी रेखा के नीचे है । अथवा यह महंगाई है या पेट्रोल का भाव है । सब सरकारी जमीन का ही क्यों इस्तेमाल करते हैं । कोई बौद्धिक ही इस पर बौद्धिक बात कर सकता था । हालांकि इस बात का पूरा खतरा था कि बौद्धिक की बात एक नई जमीन ही किताबों में खोज ले । किताब जमीन कम काला अक्षर भैंस बराबर जैसी दिखने लगी । खोज की जमीन बड़ी अदभुत होती है ।जैसे वास्को द गामा ने भारत की खोज की थी , वैसे ही कभी कभी सरकार भी अपनी जमीन खोज लेती है । जनता इसमें सरकार से चार कदम आगे होती है । उसे हमेशा पता होता है कि यह सरकारी जमीन है ।
बौद्धिक जी ने कहा कि यह हमेशा से एक प्रश्न है कि जमीन किसकी है । अगर कार्नवालिस कोड को आप नहीं मानते हैं तो सबै भूमि गोपाल की होती है । और कार्नविलास कोड को मानें तो भी सभी भूमि भूमिपाल की होती है । कोई भी जमीन सरकार की नहीं होती । ऐसा इसलिए कि सरकार को पता ही नहीं होता कि उसकी जमीन कौन सी है । ऐसी हालत से बचने के लिए सरकार ने तय किया है कि जमीन की खरीद – बिक्री हो सकती है । वह लोग जो सरकारी जमीन पर लघु शंका करते हैं या कुड़ा – कचरा फेंकते हैं या पिच पिच करते हैं , बहुत महान लोग होते हैं । साहसी भी क्योंकि निजी जमीन पर कोई लघु शंका नहीं करता क्योंकि वहां पर न जाने कब से गधा कर रहा होता है । यह हमेशा याद रखिए कि गधा समझ नहीं पाता कि यह जमीन किसकी है क्योंकि वह इतना ही जानता है कि यह सरकारी जमीन है ।
अब घोंघा प्रसाद को अकेले ही इस समस्या का समाधान करना था । लघु शंका के सवाल पर वसंत लाल से उनकी जोड़ी टूट चुकी थी । जोड़ी न हुआ कि यूपीए 2 हो गया जो साथ साथ रह कर भी सरकारी जमीन पर अलग अलग रहते हैं ।
घोंघा प्रसाद ने सोचा कि वह लोग बड़े भले लोग हैं जो सरकारी जमीन सरकार को ही बेच देते हैं । कमसे कम उनसे तो भले हैं जो सरकार के ऊपर महंगाई –भ्रष्टाचार थोप देते हैं । ऐसे पर ही सूझा कि भ्रष्टाचारियों से पूछा जाए कि क्यों भ्रष्टाचार करते हैं । भ्रष्टाचारी ने विनम्रता से कहा कि इसलिए
करते हैं कि यह सरकारी जमीन है ।


