न्याय की नाकामी है याकूब मेमन का फांसी चढ़ाया जाना
याकूब मेमन का फांसी चढ़ाया जाना न्याय की नाकामी है! जिस शख्स की सजा को घटाए जाने के पक्ष में अनेक गुरुता कम करने वाली परिस्थितियां मौजूद हों, उसे फांसी चढ़ाए जाने को इसके सिवा और कहा भी क्या जा सकता है।
बेशक, याकूब मेमन ने एक अपराध किया था। वह उस षडयंत्र में शामिल रहा था, जिसके फलस्वरूप मुंबई में जघन्य बम धमाके हुए थे, जिनमें 257 लोगों की जानें गयी थीं। लेकिन, इस प्रकरण में उसकी भूमिका और उसके अपराध की प्रकृति ऐसी नहीं थी, जो सजा ए मौत की हकदार हो।
न्याय के तकाजे उसे भी उसी तरह आजीवन कारावास की सजा देने से पूरे हो जाते, जैसे दस अन्य के मामले में हुए हैं, जिनकी मौत की सजा बदलकर आजीवन कारावास में तब्दील कर दी गयी थी।
याकूब मेमन को छांटकर अनुपातहीन सजा इसलिए मिली कि उसका बड़ा भाई टाइगर मेमन, जो कि मुख्य षडयंत्रकर्ता था, दाऊद इब्राहीम के साथ कानून की पकड़ से बाहर बना रहा।
याकूब मेमन बम धमाकों के बाद पाकिस्तान से वापस लौटने और अधिकारियों के साथ सहयोग करने के लिए तैयार था। उसने इस संबंध में मूल्यवान जानकारी दी थी और साक्ष्य मुहैया कराए थे कि किस तरह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी, आइएसआइ ने मुंबई बम धमाकों के षडयंत्र में मदद की थी।
तत्कालीन वरिष्ठ खुफिया अधिकारी, दिवंगत बी रमन ने इसकी सचाई की पुष्टिï की है। सुप्रीम कोर्ट ने इन दोष-हल्का करने वाले कारकों को अनदेखा करते हुए, संशोधन याचिका को रद्द कर दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट की ही तीन सदस्यीय बैंच ने शुद्धिकारी या क्यूरेटिव याचिका को भी रद्द कर दिया। ऐसा करते हुए अदालत ने सुप्रीम कोर्ट की ही दो सदस्यीय बैंच में न्यायमूर्ति कोरियन जोसफ द्वारा उठाए गए प्रक्रियागत खामियों के सवाल को भी खारिज कर दिया।
भारत के राष्ट्रपति, संविधान की धारा-72 के अंतर्गत अपनी शक्तियों का प्रयोग कर न्यायिक निर्णय को अमान्य कर सकते थे और मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल सकते थे। लेकिन, दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ।
याकूब मेमन से पहले हमारे देश में दी गयी आखिरी फांसी, अफजल गुरु को 2013 के मार्च में दी गयी थी। जिस गुपचुप तरीके से और सजा पाने वाले के अधिकारों का उल्लंघन करते हुए, यह फांसी दी गयी थी, उससे साफ था कि यह सजा दिया जाना राजनीतिक रूप से तय हुआ था।
वास्तव में मौत की सजा के खिलाफ अपीलों पर सुप्रीम कोर्ट के भी फैसलों में परस्पर संगति का अभाव रहा है और इन निर्णयों पर संबंधित बैंच में शामिल न्यायाधीशों के अपने विचारों की छाप देखी जा सकती है।
2014 में सुप्रीम कोर्ट ने आतंकवाद के कुछ महत्वपूर्ण मामलों में मौत सजा को, अजीवन कारावास की सजा में बदला था। राजीव गांधी की हत्या का प्रकरण, ऐसा ही एक महत्वपूर्ण प्रकरण था और इस प्रकरण में फांसी की सजा पाने वाले तीन व्यक्तियों की सजा, आजीवन कारावास में तब्दील कर दी गयी। इसके कुछ ही बाद में, एक आतंकवादी बम विस्फोट के मामले में ही मौत की सजा पा चुके देविंदरपाल सिंह भुल्लर की भी सजा घटाकर, आजीवन कारावास में बदल दी गयी।
इन दोनों ही मामलों में, उनकी सजा घटाकर आजीवन कारावास में बदलने के पक्ष में, क्रमश: तमिलनाडु तथा पंजाब में जबर्दस्त राजनीतिक समर्थन था।
वास्तव में 2004 के बाद से, पिछले ग्यारह साल में फांसी की सजा पाने वाले सिर्फ तीन लोगों को फांसी पर लटकाया गया है। अगर हम पाकिस्तानी नागरिक होने के नाते अजमल कस्साब के मामले को अलग भी कर दें, तब भी फांसी पर चढ़ऩे वाले अन्य दोनों भी मुसलमान ही थे, अफजल गुरु और अब याकूब मेमन। इससे यही धारणा और पुख्ता होती है कि हमारे देश की अपराध-न्याय व्यवस्था में मुसलमान अलग से निशाने पर होते हैं और उनके मामले में अलग पैमाने अपनाए जाते हैं।
यह ऐसी बात है जिसका ओवैसी जैसे लोग, सांप्रदायिक भवनाएं भड़काने के लिए इस्तेमाल करते हैं। आतंकवाद के अभियुक्तों के मामले में भाजपा, शिव सेना तथा ऐसी ही अन्य ताकतों द्वारा जो खून की प्यास दिखाई जाती है, वह भी छांट-छांटकर निशाने खोजती है।
हम देख ही रहे हैं कि किस तरह हिंदुत्ववादी आतंकवाद के प्रकरणों-अजमेर शरीफ, मालेगांव तथा समझौता एक्सप्रैस विस्फोट प्रकरणों-को, सरकारी मिलीभगत से कमजोर किया जा रहा है। आतंकवाद के ही इन अपराधों के लिए फांसी की सजा की तो बात ही कौन कहे, अब तो हिंदुत्ववादी आतंकवादियों को कोई सजा मिल पाने तक में संदेह है।
याकूब मेनन के साथ जो कुछ हुआ, मौत की सजा को ही खत्म किए जाने की जरूरत को ही रेखांकित करता है, जिसकी मांग सी पी आइ (एम) पहले से उठाती आयी है। मौत की सजा मनमाने तरीके से दी जाती है। 'दुर्लभ से दुर्लभ’ मामले के सिद्धांत की भी व्याख्या अलग-अलग न्यायाधीशों द्वारा मनोगत तरीके से की जाती है। दिल्ली की नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी का एक अध्ययन दिखाता है कि मौत की सजा पाने वालों में ज्यादातर, गरीब और सामाजिक रूप से उत्पीड़ित तबकों के लोग ही होते हैं।
जिन लोगों को फांसी सजा सुनायी जा चुकी है, उनमें से 75 फीसद आर्थिक रूप से कमजोर यानी गरीब हैं। यह सजा पाने वालों में से 75 फीसद, पिछड़े वर्गो तथा अल्पसंख्यक समुदाय से हैं।
अनेक पूर्व-न्यायाधीशों और न्यायविदों ने मौत की सजा खत्म किए जाने की वकालत की है। यह जरूरी है कि मौत की सजा को कानून से ही हटवाने के पक्ष में जनमत को और राजनीतिक पार्टियों को गोलबंद किया जाए। सी पी आइ (एम), इस लक्ष्य के लिए सक्रिय रूप से काम करेगी।
0 प्रकाश कारात
प्रकाश कारात, लेखक भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के पूर्व महासचिव हैं।