आज़म शहाब

अभी अब्दुलकरीम टुंडा की गिरफ्तारी और आतंकी घटनाओं में उस की भागीदारी का दावा ही गले नहीं उतर रहा था कि एनआईए और कर्नाटक स्पेशल टास्क फोर्स के संयुक्त ऑपरेशन से इंडियन मुजाहिदीन के संस्थापक यासीन भटकल और असदुल्लाह अख्तर की गिरफ्तारी की खबर आ गई। यासीन भटकल को उस इंडियन मुजाहिदीन का संस्थापक बताया जाता है कि जिसके अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है और जिसके बारे में आम राय यह है कि वो आईबी की क्रिएशन यानी कि बनाई हुई है। इस राय की बुनियाद यह है कि विभिन्न स्तरों से इंडियन मुजाहिदीन के अस्तित्व को चुनौती देने और उस पर श्वेतपत्र जारी किए जाने के कई बार की मांग के बावजूद आज तक इंडियन मुजाहिदीन के अस्तित्व में होने या न होने के बारे में दावों के विपरित कोई ठोस सबूत सामने नहीं आसका है।

गिरफ्तार किये गए यासीन भटकल के साथ अन्य तीन व्यक्ति महाराष्ट्र एटीएस की ओर से वाँछित हैं और सभी पर दस-दस लाख रूपये के इनाम की घोषणा है। मुंबई के हर चौराहे और सर्कल पर एटीएस की ओर से लगाए गए वांटेड के यह पोस्टर आपको नजर आ जायेंगे जिस पर यासीन भटकल के साथ असदुल्लाह अख्तर, तहसीन अख्तर और वकास के नाम दर्ज हैं। 11 फरवरी 2013 को इन्हें वांटेड घोषित किया गया और इन की गिरफ़्तारी पर इनाम की घोषणा की गई, लेकिन इसके ठीक दो दिन बाद यानि की कि 13 फरवरी 2013 को असदुल्लाह अख्तर के पिता जावेद अख्तर ने मुंबई में एक प्रेस कांफ्रेंस करके एटीएस पर अपना बेटे को नाहक फँसाने का आरोप लगाया था और दावा किया था कि मेरा बेटा निर्दोष है और पुलिस निर्दोष मुस्लिम युवकों को फँसा रही है।

एबीपी न्यूज चैनल के अनुसार यासीन भटकल पर 50 से अधिक बम धमाकों में लिप्त होने का आरोप है जबकि मीडिया के अन्य साधन दो दर्जन से अधिक आतंकवादी घटनाओं में लिप्त होने की बात कह रहे हैं। जो अहमदाबाद ( 2008) , सूरत ( 2008) , जयपुर ( 2008) , नई दिल्ली ( 2008) , बनारस के दशाव्मेध घाट ( 2010) , बंगलौर के चिन्नास्वामी स्टेडियम ( 2010) , पुणे के जर्मन बेकरी ( 2011 ) , मुंबई ( 2011 ) , हैदराबाद ( 2013 ) और बेंगलूर ( 2013 ) में हुए थे। वर्तमान में गया के महाबोधी मंदिर में हुए सीरियल बम विस्फोट में भी यासीन भटकल पर संदेह व्यक्त किया गया था। 12 राज्यों की आतंकवाद विरोधी एजेंसियों के द्वारा यासीन भटकल के विरुद्ध दर्ज किये गए आरोप पत्र के अनुसार 2008 से हुए कम से कम 10 बम धमाकों का उसे मास्टर माइंड बताया गया है। यासीन भटकल को केवल महाराष्ट्र की एटीएस ही नहीं बल्कि एनआईए भी मोस्ट वांटेड अपराधी घोषित कर चुकी थी। उसके ऊपर कुल 25 लाख रुपये के पुरस्कार था, 10 लाख रुपये महाराष्ट्र एटीएस और 15 लाख रुपये दिल्ली पुलिस की ओर से दिए जाने की घोषणा थी। जबकि प्रभात खबर डॉट कॉम के अनुसार उस पर कुल 35 लाख रुपये के इनाम की घोषणा थी।( प्रभात खबर डॉट कम , Aug 29 2013 12:00 AM )

एनआईए द्वारा मोस्ट वांटेड की जो सूची जारी है उसमें यासीन भटकल का नाम भी शामिल है। इसलिए अगर एक आतंकवादी को गिरफ्तार करने की दृष्टी से देखा जाए तो यह न केवल महाराष्ट्र एटीएस बल्कि एनआईए के लिए एक बड़ी सफलता हो सकती है। लेकिन अगर हम संबंधित तथ्यों पर नजर डालें तो यह प्रकरण भी अब्दुलकरीम टुंडा की तरह ही नजर आता है जिसे सऊदी अरबिया से डिपोट किए जाने के बाद गिरफ्तार गया और जिसके बारे में विश्लेषक यह आशंका जताते हैं कि वो आईबी का ही एक मोहरा है और काम' पूरा' हो जाने के बाद इसे ‘जमा’ कर लिया गया।

यह बात इसलिए भी कही जा सकती है कि यासीन भटकल की गिरफ्तारी के संबंध में जो खबरें आई हैं और इसके आतंकवादी वारदातों में शामिल होने के जो दावे सामने आए हैं उस में इतना विरोधाभास है कि उस ने इस पूरे मामले को ही संदिग्ध बना दिया है। यह विरोधाभास इस बात की ओर इशारा कर रहा है कि यह एक नाटक मात्र है जो आईबी की भागीदारी मंच हुआ है और जिस के कई उद्देश्यों में से एक उद्देश इंडियन मुजहिदीन के अस्तित्व को साबित करना, आई बी की तेज़ी से गिरती हुई साख को मज़बूत करना और वह 35 लाख रुपये की राशि हथियाना जो इस मामले में पुरस्कार के रूप में घोषित की गई थी। आइए संक्षेप में इन विरोधाभासों पर एक नज़र डालते चलें, जो इस पूरे मामले को एक सुनियोजित नाटक का रूप देता है।

पहला विरोधाभास यह कि गिरफ्तार किये गए जिस व्यक्ति के बारे में दावा किया जा रहा है वह यासीन भटकल है, उसके बारे में जांच एजेंसियां खुद ही असमंजस में हैं कि वो यासीन भटकल ही है। क्योंकि समाचारों के अनुसार जब उसे गिरफ्तार गया तो उसने कहा कि मैं यासीन भटकल नहीं हूँ। (दैनिक भास्कर, 29 अगस्त 2013,19:15 PM IST)।

यासीन भटकल की पहचान के लिए सुरक्षा एजेंसियों ने कर्नाटक पुलिस से संपर्क किया और पहचान के लिए एक टीम भेजने का अनुरोध किया। (समय लाइव डॉट कॉम, 29 अगस्त 2013, 07:37:06 PM IST)।

कर्नाटक पुलिस की पुष्टि के बाद भी जब गिरफ्तार किए गए व्यक्ति की पहचान निर्धारित नहीं हुई तो जांच एजेंसियों ने उसका डीएनए टेस्ट कराने का फैसला किया। (इंडियन एक्सप्रेस, 29 अगस्त 2013, 20:14 hrs)।

यह अलग बात है की यासीन भटकल ने सुरक्षा एजिंसियों द्वारा पूछ ताछ में अपनी पहचान और कई बम धमाकों में अपनी भूमिका स्वीकार कर ली है, परन्तु पुलिस की जांच में कौन क्या स्वीकार करता है? न्यायालयों में इसका कोई महत्व नहीं होता। इसके विपरीत गिरफ्तार किए गए व्यक्ति की जो छायाचित्र 29 अगस्त 2013 को मीडिया के माध्यम सामने आई वह इस छवि से बिल्कुल अलग है जो महाराष्ट्र एटीएस ने यासीन भटकल के नाम से मुंबई के चौराहों पर लगा रखी है।

दूसरा विरोधाभास गिरफ्तारी का स्थान है, पहले यह दावा किया गया उसे बिहार के मधुबनी जिले के भारत-नेपाल सीमा से कर्नाटक टास्क फोर्स और एनआईए के संयुक्त अभियान में गिरफ्तार किया गया, लेकिन बाद में न केवल राज्य बदल गया बल्कि इसमें आईबी का नाम भी शामिल हो गया। समाचारों के अनुसार यासीन भटकल मधुबनी के रास्ते अक्सर नेपाल आता जाता रहता था, इसकी सूचना एनआईए को मिली जिसने बिहार पुलिस और कर्नाटक टास्क फोर्स के साथ उत्तर बिहार के भारत-नेपाल सीमा से यासीन भटकल को गिरफ्तार कर लिया। जबकि एक खबर यह भी है कि एनआईए के साथ आईबी भी गिरफ्तारी की इस मुहिम में शामिल थी, और उसे मधुबनी से नहीं बल्कि सोनौली भारत-नेपाल सीमा से गिरफ्तार किया गया। (एबीपी न्यूज , 29 अगस्त 2013,18:58)

ज्ञात रहे कि सोनौली, बिहार में नहीं बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के महाराजगंज जिले में स्थित है, जहां से कुछ महीने पहले पहले कश्मीर के लियाकत अली शाह को दिल्ली स्पेशल सेल के माध्यम से गिरफ्तार करने की खबर आई थी। इसके अलावा नवभारत टाइम्स का दावा है कि यह गिरफ्तारी किसी तीसरे देश में हुई है, फिर उसे नेपाल के रास्ते भारत लाया गया और बिहार के भारत-नेपाल सीमा पर स्थित रक्सौल में उसकी गिरफ्तारी दिखाई गई। इस पूरे मिशन में तीन देशों की खुफिया जांच एजेंसियां सक्रिय थीं। ( नवभारत टाइम्स , 29 अगस्त 2013,06।48 PM IST )

इन खबरों से जहाँ गिरफ्तारी साबित होती है, वहीं गिरफ्तारी का स्थान निर्धारित नहीं है कि आखिर किस जगह से यह गिरफ्तारी हुई है।

तीसरा विरोधाभास एनआईए को मिलने वाली खुफिया सूचना यानी कि इनपुट है, जिसके आधार पर यह गिरफ्तारी हुई है। ‘आज तक’ न्यूज चैनल ने एनआईए के माध्यम से खबर दी कि यासीन भटकल की गिरफ्तारी अब्दुलकरीम टुंडा की दी गई जानकारी के आधार पर हुई है। (आज तक, 29 अगस्त 2013 ,18:17 IST )

जबकि ‘एबीपी न्यूज’ के अनुसार यासीन भटकल की गिरफ्तारी फसीह महमूद की निशानदेही पर हुई है, जो आईएम् का ऑपरेटिव है और जिसे एनआईए सऊदी अरब से लाई थी। (एबीपी न्यूज, 29 अगस्त 2013,18:58 IST)

इसके अलावा ‘एनडीटीवी’ की खबर यह है कि यह गिरफ्तारी एफबीआई की टिप पर हुई है।(एनडीटीवी 29 अगस्त 2013,14 : 44 IST )

उपरोक्त खबरों में जो विभिन्न सोर्सेस का उल्लेख है, उनसे यह पूरा इनपुट ही संदिग्ध हो जाता है, इसके बावजूद हम गिरफ्तारी के संबंध में किसी संदेह में नहीं है। क्योंकि इन सोर्सेस में भले ही विरोधाभास हो, लेकिन यह तो साबित होता ही है कि गिरफ्तारी हुई है। परन्तु यह गिरफ्तारी किस की हुई है? इसका ज्ञान केवल जांच एजेंसियों को है। ऐसे कई विरोधाभास हैं, जिनका यहाँ उल्लेख केवल लेख की लंबाई का कारण होगा।

अब आइए मैं आपका ध्यान एक ऐसी खबर की ओर आकर्षित कराता हूँ , जिस से इस पूरे मामले का झोल उजागर हो जाता है। यह खबर ‘दैनिक भास्कर’ में 30 नवम्बर 2011 को प्रकाशित हुई थी, जिसके अनुसार दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के तीन दर्जन से अधिक जांबाजों ने एक नहीं बल्कि तीन आतंकवादी वारदातों के खुलासे का दावा करते हुए बिहार और दिल्ली से 6 मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया था। उन गिरफ्तार युवकों के नामों के साथ उपनाम इस तरह लगाये गए थे जिस तरह यासीन भटकल के नाम के साथ लगाया गया है, मानो यह सभी लोग अपने पूरे जीवन केवल अपना नाम ही बदलते रहे हैं। उसका एक उदाहरण मोहम्मद कतील है जिसे मोहम्मद कतील सिद्दीकी उर्फ साजन उर्फ सज्जन उर्फ जावेद उर्फ शहजाद सलीम बताया गया था। ज्ञात रहे कि उसी अभागे कतील सिद्दीकी को 8 जून 2012 को पुणे के यारोडा जेल में मौत के घाट उतार दिया गया था। जिन आतंकवादी वारदातों के सिलसिले में उन्हें गिरफ्तार किया गया था उनमें से एक दिल्ली जामा मस्जिद के बाहर गोलीबारी का भी मामला था जिसमें 55 लाख रुपये इनाम घोषित था। इस मामले में यासीन भटकल का नाम भी शामिल था जिसे उस समय फ़रार बताया गया। संक्षेप में यह कि इन युवकों की गिरफ्तारी के बाद वे 55 लाख रुपये दिल्ली पुलिस के जाँबाज़ों के बीच तो बँट गए, मगर जिन मामलों में इनकी गिरफ्तारी हुई थी, उस पर पर्दा ही पड़ा रहा। अब यह मामला अदालत में विचाराधीन है और बचाव पक्ष के वकीलों का दावा है कि सभी गिरफ्तार आरोपी निर्दोष हैं जल्द ही उनकी रिहाई हो जाएगी। इससे साबित यह होता है कि गिरफ्तारी का यह पूरा मामला एक नाटक था और जिसका उद्देश्य 55 लाख रुपये की पुरस्कार राशि हथियाना था।

यासीन भटकल मामले में हम यह बिल्कुल नहीं कहेंगे कि उस की गिरफ्तारी में भी ऐसा ही कुछ उद्देश्य है जिसकी गिरफ्तारी पर 35 लाख रुपये के इनाम की घोषणा है, परन्तु ये ज़रूर है कि इस गिरफ्तारी के पीछे भी इस पुरस्कार राशि की लालच किसी न किसी प्रकार निश्चित रूप से है। इसके अलावा इसके पीछे एक पूरी योजना की भी बू आती है क्योंकि यासीन भटकल की गिरफ्तारी से अगर किसी को कुछ लाभ हो सकता है तो वह आईबी है जिस की उपस्थिति की खबर भटकल की गिरफ्तारी के कुछ ही देर बाद मीडिया में आ गई थी। इससे आईबी को अपना महत्व साबित करने का भरपूर मौका मिल गया है जो गुजरात सहित पूरे देश में फर्जी इनकाउंटर्स और झूठी गिरफ्तारियों के उजागर होने के मामले में किसी प्रकार कम हो गई थी। इसके अलावा एक प्रश्न यह भी उठता है कि कहीं यासीन भटकल ख़ुफ़िया व एजेंसियों का 'मोहरा' तो नहीं है ? यह सवाल इसलिए भी उठता है कि जिन- जिन मामलों में उसकी भागीदारी उजागर हुई या उजागर की गई, उन सभी मामलों में उसे भगोड़ा करार दिया गया। जबकि इन मामलों में जिन जिन लोगों के नाम आए, सभी गिरफ्तार हुए। चाहे वह औरंगाबाद हथियार पकड़े जाने का प्रकरण का हो, जर्मन बेकरी विस्फोट हो, दिल्ली जामा मस्जिद गोलीबारी हो या फिर बेंगलुरु के चिन्नास्वामी स्टेडियम विस्फोट का मामला हो। इससे ऐसा लगता है कि जांच एजेंसियों के साथ यासीन भटकल का चूहे बिल्ली का यह खेल एक योजनाबद्ध था और जब यह 'योजना' पूरी हो गयी तो उसे गिरफ्तार कर लिया गया। याद होगा कि ऐसा ही कुछ मामला जबीहुद्दीन उर्फ अबूजिंदाल के संबंध में भी सामने आया था जिसे जांच एजेंसियां आतंकवादी वारदातों का मास्टर माइंड बताती रहीं लेकिन पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने भारत आकर यह दावा किया था कि उसका रिश्ता भारतीय खुफिया एजिंसियों से है और यह खबर पीटीआई के हवाले से 16 दिसम्बर 2012 को टाइम्स ऑफ इंडिया समेत देश के अधिकतर समाचारपत्रों में प्रकाशित हुई थी। इसके अलावा देश आज जिस आर्थिक बदहाली से गुजर रहा है, उस ने सरकार के लिए मुश्किल पैदा कर दी है। अब यह जरूरी था कि लोगों का ध्यान (कुछ देर के लिए ही सही ) किसी खिलौने की ओर आकर्षित किया जाए, तो यासीन भटकल से खिलौना और क्या हो सकता था ? किस्सा संक्षेप में यह कि इस गिरफ्तारी से ऐसे बहुत से प्रश्न पैदा होते हैं जो उसे एक प्लान्ड मामला साबित करने के लिए पर्याप्त हैं।