युद्ध प्रिय देशभक्तों के नाम एक पाती
गौरव अवस्थी
युद्ध प्रिय देशभक्तों,
18 सिंतबर को उड़ी में सेना के बेस कैंप पर पाक समर्थित आतंकियों द्वारा किए गए कायराना हमले में आप सबमें एक भावनात्मक उद्वेलन हुआ। उस उद्वेलन से हम भी गुजरे लेकिन 'युद्ध' की सीमा तक नहीं।

स्थानीय अखबारों और न्यूज चैनलों का काफी स्पेस आपकी भावनाओं को व्यक्त करने में खर्च भी हुआ।
आप सबके दबाव-सम्मान में ही भारत सरकार ने सेना को पाक अधिकृत कश्मीर में आंतकियों के लांच पैड और कैम्पों पर सर्जिकल ऑपरेशन की अनुमति दे दी।

भारतीय सेना ने सफलता पूर्वक ऑपरेशन (जैसा दावा किया जा रहा है) पूरा भी किया। सुना है कि कई आतंकी मार भी गिराए गए।
अब आप देखिए न! सेना के सर्जिकल ऑपरेशन से ही दोनों देशों में युद्ध सा माहौल बन गया है। पंजाब-जम्मू एंड कश्मीर के सीमावर्ती गांव खाली हो रहे हैं।

सुना है कोई दो लाख लोगों के सरकारी कैपों में रहने की व्यवस्था की जा रही है।
देश के दूसरे तमाम हिस्सों (जिनका देश की सीमाओं पर कोई वास्ता नहीं है) के लोगों के लिए युद्ध भले भावनाओं भरा मसला हो, लेकिन फिरोजपुर-फाजिल्का समेत पाकिस्तान सीमा से सटे तमाम जिलों और जिलों से ज्यादा गांवों के रहने वालों के लिए 'युद्ध' शब्द ही बड़ा भयानक है।
इसीलिए एक आंतकी हरकत पर पाकिस्तान के जितने पुतले जुलूस निकालकर यूपी, एमपी, महाराष्ट्र, बिहार में फूंके जाते हैं उतने पंजाब के फिरोजपुर और फाजिल्का में नहीं। यहां के लोग युद्ध का मतलब जानते ही नहीं भोगते हैं।

सर्जिकल आपरेशन से प्रधानमंत्री मोदी जी ने आपका भी सीना 56 इंच का कर ही दिया।
देखिए न! युद्ध सरीखे माहौल भर से सीमा से सटे गांव खाली हो रहे हैं। सामान समेटकर लोग पलायन कर रहे हैं। घर छोड़कर घर सा जीवन बिताना कितना कठिन होता है, इसे आप समझें न समझें लेकिन पाक सीमा पर रहने वालों को इसका दर्द खूब पता है। लेकिन आपको यह तो अहसास होगा ही कि पसीने की कमाई से बनाए घर कितने प्यारे होते हैं। इन्हें छोड़ने का फैसला लेना भी कितना कठिन होता है।

अगर बुरा न मानें तो एक बात मैं भी कह दूं।
क्या यह अच्छा लगेगा कि घर होते हुए बेघर हो गए सीमावर्ती लोग सरकारी कैंपों में रहें। जरूरी सुविधाओं के लिए भटकें? हम देश के लिए लड़ तो नहीं सकते। हां, देश सेवा में एक कदम तो (जुलूस-पुतला फूंकने के अलावे) बढ़ा ही सकते हैं।
अब यह हमारी-आपकी (पुतला जलाने-जुलूस निकालने वालों की) सार्वजनिक और नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि तनाव भरे माहौल (युद्ध नहीं) से घर छोड़ने वाले ज्यादा नहीं एक-एक परिवार को अपने घर में थोड़े या ज्यादा 'आतिथ्य भाव' से रहने की जगह दें।
हमारे इस कदम से शरणार्थियों और सरकार दोनों को राहत मिलेगी और आपका-हमारा ज्यादा कुछ जाएगा भी नहीं। हमारी देशभक्ति भी प्रूव हो जाएगी। मीडिया को भी आलोचना का मौका नहीं मिलेगा। नहीं तो आप जानते ही हैं कि शरणार्थी कैम्पों में सुविधा-असुविधा की खबरों से यह मीडियावाले देशभक्ति की हवा निकालने में जुट जाएंगे।

हमें विश्वास है कि ऐसा सुनहरा मौका आप भी छोड़ना नहीं ही चाहेंगे?
देश का हाथ इस तरह बंटाने की भावनाओं का भी उभार बढ़ाया जाए तो बुरा है क्या?
मेरी अपनी निजी राय में अगर कोई इस देशसेवा के लिए आगे नहीं आता है तो भारत सरकार को एक ऐसा कानून भी बना देना चाहिए कि युद्ध के लिए उकसाने वालों पर देशद्रोह का या तो मुकदमा चले या उन्हें एक-एक शरणार्थी परिवार को गोद लेने के लिए कानूनन मजबूर किया जा सके। अखबारों के स्थानीय संस्करण ऐसे देशभक्तों की पहचान का मजबूत आधार बनेंगे।
यह निश्चित मानिए कि युद्ध काल में अगर ऐसा हो जाए तो अखबारों में बयान देने वाले या खबरें छपवाने वालों की पहचान करके उन्हें ऐसे उत्तरदायित्व दिए जाएं, तो निश्चित देशप्रेम बढ़ेगा और प्रांत-जाति-धर्म में बंटे लोगों के बीच सामंजस्य और समन्वय भी।
आइए, अपनी देशभक्ति को 'बांगुर सीमेंट' की तरह 'सस्ता नहीं सबसे अच्छा...' बनाने में योगदान हम भी दें..
जय हिन्द जय भारत
भारत माता की जय भारत माता की जय