यूपी में अपंग आरटीआई
यूपी में अपंग आरटीआई
उ.प्र. में सूचना के अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन की स्थिति
लखनऊ। जिस सूबे के सूचना निदेशालय में ही किसी को यह मालूम न हो कि जन सूचना अधिकारी कौन है उस सूबे में सूचना के अधिकार अधिनियम की क्या हालत होगी, यह सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। मजे की बात यह है कि 64 विभागों में से सिर्फ एक विभाग ऐसा है - पशुपालन, जिसने सभी 17 बिंदुओं पर जानकारी उपलब्ध कराई।
उत्तर प्रदेश सूचना का अधिकार अभियान एवं लोक राजनीति मंच के एक सर्वेक्षण में कुछ ऐसे ही तथ्य निकल कर सामने आए हैं जो बताते हैं कि देश के सबसे बड़े प्रदेश में सूचना के अधिकार की क्या दुर्गति है। उत्तर प्रदेश सूचना का अधिकार अभियान एवं लोक राजनीति मंच ने उ.प्र. में सूचना के अधिकार के क्रियान्वयन को जांचने के लिए हाल में तीन सर्वेक्षण किए। पहला 64 विभागों में जाकर एक सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन जमा कराने की कोशिश की गई, दूसरा विभिन्न विभागों में जाकर धारा 4(1)(बी) के क्रियान्वयन की स्थिति देखने की कोशिश की गई तो तीसरा वेबसाइट पर अधिनियम की धारा 4(1)(बी) के क्रियान्वयन की स्थिति देखने की कोशिश की गई।
मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पांडेय एवं नवीन तिवारी ने बताया कि सूचना के अधिकार के तहत आवेदन जमा कराने के प्रयास के दौरान अनुभव हुआ कि 64 विभागों में से सिर्फ 13 में जन सूचना अधिकारी के नाम की पट्टी मिली। 18 विभागों में जन सूचना अधिकारी अपने कार्यालय में मौजूद नहीं मिले जबकि सहकारी चीनी मिल व सिफ्सा में बताया गया कि सूचना का अधिकार अधिनियम उन पर लागू नहीं होता है।
चार विभागों में कहा गया कि अपने आवेदन डाक से भेजें। उ.प्र. पॉवर कॉरपोरेशन लिमिटेड व उ.प्र. शिया सेण्ट्रल वक्फ बोर्ड ने सूचना मांगने का कारण जानना चाहा। जबकि पिछड़ा वर्ग कल्याण निदेशालय में आवेदन लेने से मना कर दिया गया।
स्थानीय निकाय निदेशालय और उ.प्र. सहकारी जूट एवं कृषि विकास संगठन ने काफी दौड़ाया। तो सूचना निदेशालय में कौन जन सूचना अधिकारी है यह किसी को नहीं मालूम। जबकि बापू भवन, विधान सभा भवन, सचिवालय एनेक्सी व स्वास्थ्य भवन जहां जाने के लिए पास की जरूरत पड़ती है आम नागरिक की पहुंच से बाहर हैं।
64 विभागों में से सिर्फ 14 ने सूचना देने का कष्ट किया है। जो सूचना प्राप्त हुई है उसमें ज्यादातर विभागों ने लगभग सभी सूचनाएं दे देने का दावा किया है और चौंकाने वाली बात है कि बहुत कम मामले आयोग में जा रहे हैं। 36 कार्यालयों से जहां से जवाब आया उनमें कुल 10,065 आवेदन प्राप्त हुए हैं जिनमें से 9827 के जवाब दिए जा चुके हैं। मात्र 87 मामले राज्य सूचना आयोग में लम्बित हैं। जबकि हकीकत यह है कि सैकड़ों मामले रोजाना आयोग में पहुंच रहे हैं। ज्यादातर विभागों ने दावा किया है कि वे धारा 4(1)(बी) का अनुपालन कर रहे हैं और सूचनाएं उनकी वेबसाइट पर उपलब्ध हैं।
इसी तरह सर्वेक्षण में खुलासा हुआ है कि जिन विभागों में जाकर 4(1)(बी) के अनुपालन की स्थिति जानने की कोशिश की गई वहां कहीं भी फाइलों में, प्रकाशित स्वरूप में या सूचना पट पर कोई जानकारी नहीं मिली। सभी जगह यही कहा गया कि जानकारी वेबसाइट पर उपलब्ध है। 48 विभागों की वेबसाइटें देखी गईं। इनमें से मात्र 19 विभागों ने दस से ज्यादा बिंदुओं पर जानकारी उपलब्ध कराई है। सिर्फ एक विभाग ऐसा है - पशुपालन, जिसने सभी 17 बिंदुओं पर जानकारी उपलब्ध कराई है। पिछड़ा कल्याण ने 15 बिंदुओं पर सूचना उपलब्ध कराई है।
विभागों की वेबसाइट्स का आलम यह है कि एक जैसा प्रारूप न होने के कारण वेबसाइट देखने वाले को असुविधा होती है। तो कई बार अक्षर अपठनीय हैं और जानकारी अद्यतन नहीं हैं।
लखनऊ विकास प्राधिकरण की वेबसाइट पर नए-पुराने सभी शासनादेश डाल दिए गए हैं जिससे यह भ्रम की स्थिति पैदा होती है कि वर्तमान में कौन से नियम लागू हैं जबकि कई महत्वपूर्ण शासनादेश डाले ही नहीं गए हैं। नगर निगम की वेबसाइट पर 2010 की नियमावली जारी करने के अध्यादेश की प्रति है किंतु नियमावली 2010 नदारद हैं। ये प्रकाशित स्वरूप में भी उपलब्ध नहीं हैं। सूचना के अधिकार के तहत इसे मांगने पर भी नगर निगम देने में टाल-मटोल कर रहा है। बता दें कि नगर निगम, सख्त और कड़क मंत्री आजम खाँ का विभाग है जिनका छवि सूबे में सुपर मुख्यमंत्री की है।
प्रशासनिक सुधार विभाग क्या सुधार करता होगा इसका अंदाजा इससे लग सकता है कि उसकी वेबसाइट पर सूचना का अधिकार निर्देशिका का 2010 का संस्करण पड़ा हुआ है। जबकि राज्य सूचना आयोग खुद कितना सजग है अंदाजा लगा लें कि उसकी वेबसाइट पर धारा 25 के तहत अनुश्रवण की रपट, जो सालाना तैयार की जानी चाहिए, सर्वेक्षणकर्ताओं को नहीं दी गई।
संदीप पांडेय कहते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है कि सरकारी विभागों की स्वयं-स्फूर्त ढंग से जानकारी सार्वजनिक करने के बजाए, जैसा कि धारा 4(1)(बी) में उनसे अपेक्षा की गई है, उसे छुपाने में ज्यादा रुचि है। आवेदक को कोई भी सूचना प्राप्त करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही है।


