निकलाय लितोफ़किन

मॉस्को(रूस-भारत संवाद)। रूसी विशेषज्ञों का मानना है कि वाशिंगटन ’रूसी हौआ’ का भय दिखाकर यूरोप के देशों में तैनात अपनी सैन्य प्रणाली को और बेहतर व मजबूत बनाएगा।

अमरीकी फौजी मन्त्रालय पेण्टागन ने यूरोप में तैनात अपनी वायु सुरक्षा प्रणाली को और बेहतर करने के लिए क़दम उठाने शुरू कर दिए हैं। रूस पर मध्यम और कम दूरी के मिसाइलों के उन्मूलन सम्बन्धी सन्धि को भंग करने का आरोप-प्रत्यारोप लगाते हुए अमरीका पिछले कई साल से इस काम में लगा हुआ है।

अमरीकी उपरक्षामन्त्री के राजनीतिक सवालों सम्बन्धी सहायक ब्रानयन मक्केओन ने विगत 13 अप्रैल को संसद की सैन्य समिति को सम्बोधित करते हुए कहा – रूस द्वारा मध्यम और कम दूरी के मिसाइलों के उन्मूलन सम्बन्धी सन्धि को भंग किए जाने के सिलसिले में हम रूसी सैन्य कार्रवाइयों के जवाब में जो रणनीति बना रहे हैं, उसके अनुसार हम अपनी वायु रक्षा प्रणाली का विस्तार करेंगे और उसमें आवश्यक बदलाव करेंगे ताकि रूस की आक्रामक क्षमताओं का मुकाबला किया जा सके।

तास समाचार समिति के सैन्य विश्लेषक वीक्तर लितोफ़किन का मानना है कि इस तरह अमरीका यूरोप पर अपनी सैन्य-प्रणाली को लादना चाहता है। उन्होंने कहा – अमरीका इस इलाके के देशों को रूसी हौए का भय दिखाकर डरा रहा है और नाटो सन्धि संगठन से जुड़े देशों को अपनी तकनीक बेचना चाहता है। इससे न केवल अमरीकी बजट को फ़ायदा होगा, बल्कि उसे इन देशों पर राजनीतिक दबाव डालने की सम्भावना भी मिलेगी।

वीक्तर लितोफ़किन ने कहा कि अमरीका यूरोप को रूसी वायु रक्षा प्रणाली एस-300 और नभ सुरक्षा प्रणाली पैट्रिएट आरए‍एस-3 जैसी ही अमरीकी वायु सुरक्षा प्रणालियाँ बेचना चाहता है। ये प्रणालियाँ अमरीका द्वारा यूरोप में बनाई जा रही मिसाइल प्रतिरक्षा व्यवस्था के अतिरिक्त होंगी।
रूस पर अमरीकी आरोप
पेण्टागन का कहना है कि ’इस्कान्दर-एम’ नामक सामरिक परिचालन प्रणाली 500 किलोमीटर की दूरी तक मार करने वाले जिन आर-500 नामक क्रूज मिसाइलों को छोड़ती है, उसके अलावा ’आरएस-26 ’रुबेझ’ नामक जो रूसी अन्तरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल है, ये दोनों मिसाइल भी मध्यम और कम दूरी के मिसाइलों के उन्मूलन की सन्धि के अन्तर्गत आते हैं क्योंकि इनका इस्तेमाल निशाना साधकर किया जाता है और ये मिसाइल 5500 किलोमीटर की दूरी से कम दूरी पर स्थित लक्ष्यों को भी भेद सकते हैं। और मध्यम व कम दूरी के मिसाइलों की सन्धि के अनुसार तय दूरी इन मिसाइलों की मार के भीतर है।

लेकिन मास्को ने वाशिंगटन के इन आरोपों को अनर्गल आरोप बताते हुए कहा है कि वाशिंगटन ने अपने आरोपों के पक्ष में अभी तक कोई दस्तावेज़ी सबूत पेश नहीं किया है। रूसी राजनयिकों का कहना है कि अमरीका के ये सभी आरोप ’ज़ुबानी चकल्लस’ के अलावा और कुछ नहीं हैं।

जून-2015 में मीडिया से एक पत्रकार सम्मेलन में बात करते हुए रूस के विदेश मन्त्री सिर्गेय लवरोफ़ ने कहा था – वे इस तरह बात करते हैं, ’आपने हाल ही में एक मिसाइल का परीक्षण किया है और आपको यह मालूम है कि हम क्या बात कर रहे हैं।’ लेकिन इस तरह तो गम्भीर ढंग से बात नहीं की जा सकती है।
मास्को के अमरीका पर आरोप
राजनीतिक और सैनिक विश्लेषण अनुसन्धान संस्थान के उपनिदेशक अलेक्सान्दर ख़्रमचीख़िन ने कहा – मास्को को डर है कि पूर्वी यूरोप में अमरीका ने जो मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली बना रखी है, उसे सुरक्षा प्रणाली की जगह हमलावर प्रणाली में बदल दिया जाएगा।

उन्होंने कहा – रूस का भी यह मानना है कि मिसाइल प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए अमरीका ने जो लक्ष्यभेदी मिसाइल बनाए हैं, वे भी मध्यम और कम दूरी के मिसाइलों के उन्मूलन से जुड़ी सन्धि के अन्तर्गत आते हैं। वास्तव में ये मिसाइल मध्यम दूरी के मिसाइल हैं, जिनपर बम नहीं लगे हुए हैं। लेकिन अमरीका इस बात को नहीं मानता है।

रूसी विशेषज्ञों के अनुसार, मध्यम और कम दूरी के मिसाइलों के उन्मूलन से जुड़ी सन्धि अमरीका के हमलावर चारवि (चालकरहित विमान) या ड्रोन विमानों पर भी लागू होनी चाहिए। इन चारवि या ड्रोन विमानों की विशेषताएँ ज़मीन पर तैनात किए जाने वाले उन क्रूज मिसाइलों जैसी ही हैं, जो मध्यम और कम दूरी के मिसाइलों के उन्मूलन की सन्धि के अन्तर्गत शामिल हैं।
क्या तोड़ देनी चाहिए यह सन्धि?
लेकिन आपसी मतभेदों के बावजूद रूस और अमरीका का यह कहना है कि वे मध्यम और कम दूरी के मिसाइलों के उन्मूलन की सन्धि पर काम आगे जारी रखेंगे।

जून-2015 में मीडिया से पत्रकार सम्मेलन में बात करते हुए रूस के विदेश मन्त्री सिर्गेय लवरोफ़ ने कहा था – इस सन्धि से जुड़े किसी भी सवाल को दूर करने के लिए हम पूरी तरह से तैयार हैं, लेकिन बात ईमानदारी से होनी चाहे, सिर्फ़ ज़ुबानी जमा-खर्च ही नहीं किया जाना चाहिए। व्हाइट हाउस भी दो देशों के बीच हुई इस सन्धि को बनाए रखना चाहता है।

साभार - रूस-भारत संवाद