ये आग तो भाजपा ने खुद लगायी है
ये आग तो भाजपा ने खुद लगायी है
अनुराग मिश्र
जैसे जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं राजनैतिक दलों की हड़बड़ाहट भी साफ़ दिखायी पड़ रही है। इस हड़बड़ी का ताज़ा उदाहरण भाजपा की गोवा कार्यसमिति में देखने को मिला जहाँ बैठक के अन्तिम दिन तक यह स्पष्ट नहीं था कि भाजपा नरेन्द्र मोदी को लोकसभा चुनाव के सन्दर्भ में कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देगी या नहीं। खैर असमंजस में ही सही लेकिन भाजपा ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं विशेषकर लाल कृष्ण आडवाणी की भावनाओं को दरकिनार करते हुये बैठक के अन्तिम दिन नरेन्द्र मोदी को भाजपा चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बना दिया। इससे नाराज भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण अडवाणी ने सभी पदों से इस्तीफा दे दिया।
यहाँ जो मूल सवाल खड़ा हो रहा वो ये कि आखिर ऐसी परिस्थति बनी क्यों ? क्यों अडवाणी को इस्तीफ़ा देना पड़ा और क्यों खुद को लोकतान्त्रिक पार्टी कहने वाली भाजपा एक तानाशाह पार्टी (भाजपा नेताओं की जुबानी) काँग्रेस से रूप में पिछड़ती जा रही है।
वस्तुतः इन सारी घटनाओं के मूल में अगर कोई बात छिपी है तो वो है अभिमान और वर्चस्व। खुद को लोकतान्त्रिक पद्धति की पार्टी कहने वाली भाजपा अब पूरी तरह से तानाशाहों की पार्टी हो गयी है। जिसमें हर दूसरा नेता अपने आप को स्वयम्-भू समझने लगा है और ये मानने लगा है कि भाजपा का जो भी जनाधार है वो उसी की बदौलत है। यही कारण है कि अक्सर प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के भाजपा नेताओं में आपसी अनबन की बात मीडिया में गुटबाजी के रूप में सामने आती रहती है। मौजूदा घटनक्रम भी इसी सोच की परिणिति है।
लाल कृष्ण अडवाणी जो की भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेता हैं उनका मानना है कि चूँकि वो पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता हैं और पार्टी को उन्होंने एक समय में फर्श से अर्श तक पहुँचाया है तो प्रधानमन्त्री की कुर्सी उन्हीं को मिलनी चाहिये। नरेन्द्र मोदी जिनको आज का युवा सबसे ज्यादा पसंद कर रहा है, को लगता है कि चूँकि मैं पार्टी का सबसे चर्चित चेहरा हूँ इसलिए प्रधानमन्त्री की कुर्सी मुझे मिलनी चाहिये। सोचने वाली बात ये है कि यदि अभी ये निर्धारित कर भी दिया जाये कि मोदी,अडवाणी या कोई अन्य भाजपाई नेता प्रधानमन्त्री बनेगा तो क्या वास्तव में वो प्रधानमन्त्री बन जायेगा। जाहिर है जवाब न ही होगा क्योकि प्रधानमन्त्री बनने के लिये लोकसभा चुनाव जीतना होता है। फिर काहे भाजपा में इतनी उथल पुथल मची है।
वास्तव में यह भाजपा में मची जल्दबाजी का साक्ष्य है। भाजपा को यह लगने लगा है कि वह अपनी प्रतिदव्न्दी काँग्रेस से पिछड़ रही है। काँग्रेस में जहाँ पिछले वर्ष ही ये तय हो गया था कि पार्टी लोकसभा चुनाव 2014 पार्टी उपाध्यक्ष और काँग्रेस युवराज राहुल गाँधी के नेतृत्व में लड़ेगी और जीत की स्थिति में राहुल ही प्रधानमन्त्री बनेंगे वहीं भाजपा में यह पिछले माह तक भी तय नहीं हो पाया था कि पार्टी किसके नेतृत्व में लोकसभा चुनाव लड़ेगी और पार्टी का प्रधानमन्त्री पद का अधिकृत उम्मीदवार कौन होगा। इतना ही नहीं हाल ही में गोवा में सम्पन हुयी तीन दिवसीय कार्यकारणी की बैठक में भी शुरुआत के दो दिन तक ये तय नहीं हो पा रहा था कि मोदी को प्रधानमन्त्री पद का अधिकृत उम्मीदवार घोषित क्या जाये या नहीं।
यहाँ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि मौजूदा दौर में भाजपा स्वयम् में कुछ भी नहीं है जो कुछ भी वो हैं राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन (राजग) है। राजग में कई ऐसे दल हैं जो भाजपा के चुनाव प्रचार समिति के वर्तमान अध्यक्ष नरेन्द्र मोदी को बिलकुल भी पसन्द नहीं करते। जिसका संकेत प्रमुख सहयोगी दल जेडीयू दे दिया है। जेडीयू नेता और बिहार के मुख्यमन्त्री नितीश कुमार ने अपने बयान में कहा है कि नरेन्द्र मोदी के मसले पर पार्टी अपना रुख अब जल्दी ही साफ़ करेगी। नीतीश कुमार को मोदी का धुर विरोधी माना जाता है ऐसी स्थिति में ये स्पष्ट है कि मतभेद की जो बात अभी भाजपा के मंच तक सीमित है वो जैसे है राजग के मंच पर पहुँचेगी उसमें उफान आयेगा। तमाम सहयोगी दल मोदी को हटाने की माँग करेंगे। इस आग को हवा देंगे अडवाणी। जो अपनी पार्टी में भले ही मोदी से हार गये हों। पर सहयोगियों की मदद से गठबंधन के मंच पर वो मोदी को हराने का एक प्रयास और करेंगे। ऐसे में यह भी सवाल खड़ा हो रहा है कि मौजूदा परिस्थतियों में क्या भाजपा लोकसभा चुनाव 2014 लड़ने की स्थिति में है?
"दिल बहलाने के लिये ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है " की तर्ज पर भाजपा के वरिष्ठ नेता ये कह सकते हैं कि हाँ हम चुनाव लड़ने की स्थिति में हैं पर वास्तविकता इससे काफी दूर प्रतीत होती है। भाजपा लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में मौजूदा काँग्रेस सरकार को भ्रष्टाचार, महँगाई, और विदेश नीति जैसे गम्भीर मसलों पर घेरने की तैयारी में है। वो खुद को भ्रष्टचारी काँग्रेस सरकार का विकल्प बतायेगी। पर क्या कभी भाजपा ने इस पर विचार किया अगर काँग्रेस ने भाजपा की आन्तरिक राजनीति को ही चुनावी का मुद्दा बना लिया तो उसके पास क्या जवाब होगा ?
काँग्रेस तो भाजपा के सभी आरोपों कुछ न कुछ तोड़ जरूर निकाल लेगी पर भाजपा काँग्रेस के आरोपों का तोड़ कैसे निकालेगी। बेहतर होगा कि समय रहते भाजपा इस विषय पर विचार करे और आपसी गुटबाजी को नियन्त्रित करें अन्यथा वो दिन दूर नहीं होगा जब काँग्रेस के तीसरे कार्यकाल का रास्ता भाजपा स्वयम् प्रशस्त कर देगी और स्वयम् पतन की ओर अग्रसर हो जायेगी।


