ये किताबें जलाने वाले विद्या के दुश्मन “स्वामी”
ये किताबें जलाने वाले विद्या के दुश्मन “स्वामी”
आलोक बाजपेयी
सुब्रह्मण्यम स्वामी ने आरएसएस के आनुषांगिक संगठन अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के कार्यक्रम में कहा है कि बिपनचन्द्र, रोमिला थापर जैसे नेहरूवादी इतिहासकारों की किताबें जला देनी जानी चाहिए। आखिर क्यों कहा उन्होंने ऐसा या उन्हें ये क्यों कहना पड़ा, यह लेख इस बात की पड़ताल का प्रयास है।
सबसे पहले तो यह जान लें कि श्री स्वामी कोई 'नासमझ’, कम पढ़े-लिखे व्यक्ति नहीं हैं। उनके पास हार्वर्ड विश्वविद्यालय की पी.एच.डी. डिग्री है और बौद्धिक जगत में कुछ योगदान भी अवश्य रहा है। अनजाने में, भूलवश या गलती से मुँह से कुछ भी निकल जाए, ऐसे वे नहीं हैं। इसलिए उनके इस कथन के प्रयोजन और निहितार्थ का परीक्षण करना अधिक जरूरी हो जाता है।
श्री स्वामी मूलत: एक राजनीतिक व्यक्ति हैं और राजनीतिक महत्वाकाँक्षाएँ रखते हैं। राजनीति के सोपान में ऊँचे पहुँचना चाहते हैं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ भी किसी जमाने में उनकी निकटता रही है और गैरकांग्रेसी-गैरभाजपाई दलों व गठबंधनों में भी उनकी तगड़ी पैठ रह चुकी है। वर्तमान में उन्होंने अपनी पार्टी का विलयन भारतीय जनता पार्टी के साथ कर भाजपा ज्वाइन कर रखी है। यूँ भी पिछले चार साल से कांग्रेस का जहाज डूबता सा दिख रहा था, इसलिए उन्होंने अपने राजनीतिक बयान और रुझान भाजपा की पसन्द के कर लिए। चूँकि उनकी राजनीतिक विचारधारा कभी सुस्पष्ट नहीं रही है और उसमें परस्पर विरोधी बातें भी समय-समय पर समायोजित हो जाती रही हैं, इसलिए उन्होंने विगत कुछ वर्षों में आसानी से कांग्रेस-विरोध का बाना धारण कर लिया। भाजपा के लिए वह उपयुक्त व्यक्ति हैं, क्योंकि एक ओर तो धुर कांग्रेस विरोधी हैं (कल क्या होगा किसको पता), दूसरी ओर उच्च शिक्षा डिग्रीधारक भी हैं और बुद्धिजीवी होने का उनका दावा भी खोखला नहीं है।
श्री स्वामी की कुछ अपनी राजनीतिक सीमितताएँ भी हैं। वह अतिराजनीतिक महत्वाकाँक्षाओं से भरे तो हैं और राष्ट्रीय राजनीति में दखल देते रहते हैं, लेकिन उनका कोई राजनीतिक जनाधार नहीं है। अब चूँकि वह अत्यधिक पढ़े-लिखे और विद्वान हैं, इसलिए आधारभूत स्तर पर जाकर राजनीति करना, गांवों, कस्बों, गरीब बस्तियों में घूमना उनके लिए असुविधाजनक और तौहीन जैसा हो सकता है, इसलिए वे पार्टी के (जिस भी पार्टी में हों) शीर्ष नेतृत्व से नजदीकी रखकर ही अपनी राजनीतिक इच्छाओं की पूर्ति कर सकते हैं। वास्तव में श्री स्वामी देश में उपलब्ध उन तमाम बौद्धिक उच्च वर्ग के महानुभावों की तरह हैं, जो अपने बुद्धिकौशल से पल भर में अपनी निष्ठाएँ और प्रतिबद्धताएँ बदल लेने में सिद्धहस्त होते हैं। श्री स्वामी इस उच्च बौद्धिक वर्ग के एक शानदार नुमाइंदे हैं।
श्री स्वामी जैसे व्यक्तिवों के लिए यह अनिवार्य है कि वह खबरों में सुर्खियों में बने रहें। इसके लिए वह उन बातों का सहारा लेते हैं, जो कि उन्हें मीडिया कवरेज और चर्चित बनाएँ। इसके अलावा वर्तमान सत्ता 'हिन्दुत्व’ प्रेमियों के हाथ में है और आर.एस.एस. उस हिन्दुत्व सत्ता प्रतिष्ठान का एक गौरवशाली गढ़ बना हुआ है, अत: यदि स्वामी ने उस गढ़ में धर्मनिरपेक्ष इतिहासकारों की किताबों को जला देने की बात कही है, तो इसमें आश्चर्य जैसा कुछ नहीं है। उनके किताबें जलाने वाले वक्तव्य को इसी रोशनी में समझने की जरूरत है।
दरअसल साम्प्रदायिक-फासिस्ट विचारधारा के अनवरत फैलाव में मुख्य रोड़ा भारत का इतिहास लेखन रहा है। भारत में जो इतिहास लेखन हुआ है, उससे उन मान्यताओं की पुष्टि नहीं होती है, जो कि आर.एस.एस. व उसके आनुषांगिक संगठन लोगों के जेहन में उतारने की कोशिश में लगे हुए हैं। इतिहास की जो साम्प्रदायिक व्याख्या करने की कोशिश आर.एस.एस. आदि करते रहे हैं, उसकी काट भारतीय इतिहास लेखकों ने खूब की है और अभी भी साम्प्रदायिकता की जड़ें भारतीय भूमि पर जम नहीं पाई हैं। यह बात हिन्दुत्ववादियों को सालती है। श्री स्वामी जब उस धर्मनिरपेक्ष इतिहास लेखन और प्रसिद्ध इतिहासकारों पर घृणात्मक टीका-टिप्पणी करते हैं, तो लामुहाला अपने को उस हिन्दुत्व ब्रिगेड का सच्चा रहनुमा साबित कर देते हैं, जिससे फिलहाल उनके राजनीतिक भविष्य को और स्थिरता व नए आयाम प्राप्त हो सकें।
सोचने की बात है कि किताबें जलाने की बात कौन कर सकता है। वह नहीं जो उन किताबों से असहमत हो, बल्कि वह जो उन किताबों से डरता हो। बिपिनचन्द्र और रोमिला थापर ऐसे इतिहासकार रहे हैं, जिन्हें पूरी दुनिया में अपनी बौद्धिक ऊँचाइयों के कारण जाना-माना जाता है। ऐसा नहीं कि इनका लेखन सारी दुनिया में सर्वमान्य है। तमाम इतिहासकार बिपिन, रोमिला के निष्कर्षों, तथ्यों से तर्क वितर्क व बौद्धिक संवाद करते रहे हैं, लेकिन किताबें जला देना जैसी बातें तो वही करेगा, जिसके पास बिपिन, रोमिला के तर्कों का जवाब न हो और वह मन से इतना भयभीत हो कि अगर वह किताबें भारत की आम जनता कभी पढ़-समझ लेगी, तो हिन्दुत्व की ब्रिगेड निरूत्तरित हो जाएगी।
सच तो ये है कि साम्प्रदायिक, फासिस्ट विचारधारा उस महान वाद-विवाद-संवाद की परम्परा की विरोधी है, जिसके सहारे मानव सभ्यता आगे बढ़ी है। इस विचारधारा के तौर-तरीके के मूल में हिंसक मनोवृत्ति है। विरोधी को 'शांत’ कर देना, उसे दृश्य से 'हटा देना’ देश और विचारों को 'कुचल देना’ जैसे हथकंडे हर देश में साम्प्रदायिक फासिस्ट विचारधारा अपनाती है। साथ ही धर्म के आधार पर किसी एक बिरादरी को 'दुश्मन’ घोषित करने का दुष्प्रचार फैलाना उनकी विचारधारात्मक मजबूरी है। भारत के महानतम इतिहासकारों की किताबें उनके इस कृत्य में अड़चन है और इसीलिए सुब्रह्मण्यम स्वामी जैसे अवसरवादी अतिराजनीतिक महत्वाकाँक्षा वाले चालाक बुद्धिजीवी हिन्दुत्व ब्रिगेड की मदद में उतरते हैं।
आखिर में एक बात। जब हम सब छोटे थे तो घर, स्कूल में सिखाया जाता था कि किताबों पर पैर नहीं लगाना चाहिए, अगर जमीन पर गिर जाए तो उठाकर चूमना चाहिए, क्योंकि किताबों में विद्या होती है। किताबों को जलाने की बात कहने वाले किस भारतीय सभ्यता और संस्कृति के वाहक हैं यह भी सोचने की बात है।
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