................ये दास्तान अधूरी है।

बारह बरस कूकर जीवे तेरह बरस जिए सियार।

बरस अठारह क्षत्रिय जीवे आगे के जीवन को धिक्कार।

(ये प्रसिद्ध पक्तियां वीरगाथा काल के कवि जगनकि की हैं जिसने आल्हा खंड लिखा था)

मैं अभी तक उस वक्त के दरिया के किनारे खड़ा था, जिसमें इतिहास बह रहा है। अब मैं दरिया की मुख्य धारा में प्रवेश कर गया हूं। किंतु यह क्या दरिया की मुख्य धारा में तो रक्त बह रहा है और वह भी अठारह बरस के किशोरों का। मैं रक्त से सराबोर हो गया हूं। मैं तो आज तक नहीं समझ पाया कि राजपूत हमेशा अविवेक पूर्ण॔ फैसले क्यों लेते रहे? पृथ्वीराज चौहान से लेकर बहादुर शाह जफर तक के समय तक छाती पर गोलियां क्यों खाते आए ? क्या उन्होंने कभी नहीं सोचा कि उन्हें भी शिवाजी की तरह गुरिल्ला युद्ध कर दुश्मन के दांत खट्टे करने चाहिए। किंतु एकता के अभाव में राजपूत कुछ भी हासिल नहीं कर सके। अहंकार दम्भ और वैचारिक संकीर्णता का आलम यह रहा कि महमूद गजनी से लेकर नादिर शाह तक तमाम लुटेरों को मूक दर्शक बने देखते रहे।

मध्यकालीन भारत में हिंदुओं का लड़ने का मतलब राजपूतों के लड़ने से था। वे खूब लड़े, लेकिन आपस में। 1192 मे ताराइन के द्वितीय युद्ध, जिसमे मो. गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को हराया था, के पश्चात किसी भी राजपूत राजा ने किसी विदेशी आक्रान्ता के विरुद्ध कोई निर्णायक युद्ध नहीं लड़ा। अब दिल्ली की गद्दी के लिए गैर हिन्दुओं के मध्य संघर्ष होने लगा था। हां कुछ राजपूतों ने समझदारी का परिचय दिया, जब उन्होंने अकबर से हाथ मिलाया एवं रोटी और बेटी के सम्बन्ध स्थापित किए। अकबर से शाहजहां तक के सवा सौ साल के पीरियड में मध्यकालीन भारत के लोगों को राजनीतिक स्थिरता का अहसास हुआ, किंतु एक बार फिर राजपूतों ने आपसी कलह में दाराशिकोह का साथ छोड़ कर औरंगजेब का दामन थाम लिया। मध्यकालीन भारत के इतिहास में अधिकांश समय हिन्दू राजा लड़ाई से बाहर दिखाई देते हैं। मेरे कहने का मतलब यह है कि अब देश हिंदुओं का ही नहीं था मुसलमानों का भी अपना था। 1857 की लड़ाई ने साबित भी कर दिया, जब बहादुर शाह जफर को हिन्दू और मुसलमान दोनों ने नेतृत्व थमा दिया था। सबको पता है कि किस प्रकार अंग्रेज़ों का बिगाड़ा गांधी ने संभालने का प्रयास किया किंतु अन्त में जिन्ना सब कुछ ले डूबे। विभाजन के समय गांधी ने भारत में रुकने वाले मुसलमानों को भरोसा दिलाया था कि यह देश उनका भी है। अब तो हालात बदले हुए हैं। मुक्तिबोध ने कहा था कि दुनिया न कूड़े का ढेर जिस पर चढ़ा हुआ कोई मुर्गा या कुक्कुट दे बांग जोरदार और बन जाए मसीहा। लेकिन अब ऐसे ही लोग मसीहा बनने लगे हैं।

.........अब तक जो मैंने कहा आज की बात उसके आगे का सिलसिला नहीं है। मैं आज उन प्रतिक्रियाओं का जबाब दूंगा जो मेरे लेखन पर की गईं। लेकिन उससे पहले एक आवश्यक सूचना दे दूं कि याकूब मेमन के फांसी पर लटकते ही देश में सैकड़ो टाइगर मेमन ने जन्म ले लिया है काटते रहिए इसी तरह फसलें।

सबसे पहले मैं उन मित्रों को शुक्रिया अदा करना चाहूँगा, जिन्होंने मुझे प्रोत्साहित किया। मेरे एक साहित्यकार मित्र ने राणा प्रताप के बारे में लिखा कि उन्होंने साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी। बड़ी विनम्रता के साथ कहना चाहूंगा कि उनकी यह सूचना गलत है। मुझे बहुत सुकून मिला कि मेरी बात का कुछ असर हुआ क्योंकि इन्ही मित्र ने स्वीकार किया कि हिन्दू अपने मुस्लिम भाइयों के साथ ज्यादती कर रहे हैं।

मेरे एक मित्र ने 28 साल पहले की किसी घटना की याद दिलाना चाहा उनसे मैं बड़ी विनम्रता के साथ गुजारिश करूंगा कि अब मैं कटी हुई फसलों के पूले नहीं गिनता मेरी निगाहें जड़ों पर टिकी हुई हैं। मेरे कुछ आत्मीयों ने बड़ी चौधराहट के साथ न्यायिक प्रक्रिया की दुहाई देते हुए मेरी बात को दरकिनार कर दिया। मैं उन चौधरी मित्रों को बताना चाहूँगा कि मैं भी गजब का ढीठ हूं अपनी बात पूरी किए बिना टलूंगा नहीं। कुछ मित्र ऐसे भी हैं जिनकी कुछ मजबूरियां भी है जो खुल कर मेरा साथ नहीं दे सकते। ऐसे में मुझे फिर मुक्तिबोध याद आ जाते हैं अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही होंगे, तोड़ने होंगे मठ और गढ़ सब।

चल पड़े जिधर दो डग मग में ——————

साबरमती के संत तूने ————————

मैं मध्यकालीन भारत के इतिहास के खंडकाल से बाहर आना चाहता हूं। मुझे सामन्तों की जीवन शैली से घृणा है दूसरे के श्रम पर पलते हैं, परजीवी हैं ये लोग। मुझे नदी से बाहर निकलना है किसी भी तरह। और यह क्या मैं अपने प्रयास में सफल भी रहा। मैं अब नदी से निकल कर बाहर एक ऐसे खुले मैदान मे आ गया हूं जहाँ बड़ी तेज हवाएं चल रही हैं। चारों तरफ मोगरे के चांदनी के फूल खिले हुए हैं। मैं बहुत खुश हूं। अभी अभी मैंने देखा है कि हजारों की संख्या में लोग एक दिशा में चले जा रहे हैं। मैं उनको पहचानने का प्रयास करता हूं।

अरे यह क्या, यह तो गांधी के नेतृत्व में डांडी यात्रा का दृश्य है। गजब का आकर्षण है इस दृश्य में। जिनके राज में सूरज डूबता न हो, उनसे लड़ने के लिए सारा हिन्दुस्तान खड़ा हो गया है। कितना अद्भुत है यह दृश्य और उस से भी अधिक भास्वर है गांधी का सांवला चेहरा। कितना कुछ बदल गया देखते ही देखते। पहली बार, पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान दिखाई दी। पहली बार कवि ने राज दरबार से बाहर निकल कर उस पर कविता लिखी और वह भी कितनी खूबसूरत।

अनामदास