ये सरकार भी विकास को "कुमकुम भाग्य" की तरह ही विकास को पेट में ही मार चुकी है

विकास किसका - जनता का या कार्पोरेट घरानों का

उदय चे

जी टीवी पर एक सीरियल अप्रैल 2014 से "कुमकुम भाग्य" आता है, जिसको एकता कपूर ने बनाया है। उसमें एक लड़की थी जिसका नाम तन्नू था। तन्नू सीरियल में खलनायिका किस्म की भूमिका में थी।

चलिए। इसको छोड़ते हैं, वो क्या थी और क्या नहीं थी, क्या नाम था, हम इस पर आगे चर्चा करते हैं।

अब मुद्दे पर आते हैं। मुद्दा ये है कि तन्नू गर्भवती हो गई। अरे असलियत में नहीं सीरियल में ही गर्भवती हुई।

सीरियल का हीरो अभिषेक समझता है कि बच्चा उसका है, लेकिन तन्नू को मालूम है कि बच्चा तो अभिषेक का नहीं किसी और का है।

हीरो को लगता है कि अब होगा बच्चा, अब होगा बच्चा, बच्चे के इंतजार व प्यार में वो तन्नू के कमीनेपन को भी नजरअंदाज कर देता है।

महीना गुजरा, दूसरा गुजरा थोड़ा पेट भी दिखने लग गया। कहानी में ट्विस्ट आते गए, झगड़े, प्यार, शैतानी चाल, मक्कारियों से गुजरते हुए तन्नू ने पेट मे बच्चा लिए-लिए कब 2 साल गुजार दिए, पता ही नहीं चला। इसी बीच जो बच्चे का असली पापा है, वो भी खलनायक है, वो तन्नू को ब्लैकमेल करता रहता है और रुपये ऐंठता रहता है वो धमकी देता रहता है कि अगर उसने उसकी मांगे पूरी नहीं की तो वह उसके पति को असलियत बता दूंगा कि इस बच्चे का असली बाप कौन है। असलियत जानकर, जो तुम उसकी मेहनत की कमाई पर ऐशो-आराम, अय्याशियां कर रही हो सब खत्म हो जाएगा, फिर मांगना कटोरा पकड़ कर सड़कों पर भीख।

ये लूट-खसोट के बीच आखिर में एक दिन तन्नू का बच्चा पेट में ही मर जाता है।

क्या आपको नहीं लगता कि ये ही हालात हमारी सरकार की है जो विकास पैदा करने वाली थी। देश की जनता को भी लग रहा था कि विकास आएगा, हमारा विकास होगा।

जैसे कर्ण-अर्जुन में माँ को लगता है कि मेरे कर्ण-अर्जुन आएंगे।

सरकार ने भी भरोसा दिया था कि विकास होगा। विकास जनता का होगा।

जब जनता में से दबे स्वर में किसी ने पूछ लिया कि मुझे शक है कि विकास हमारा नहीं, उनका है जिनके साथ हवाई जहाजों में सफर किया है, जिनके साथ काली राते रंगीन की हैं। जिन्होंने होटलों के बिल चुकाए हैं। जिनके साथ विदेश में डेटिंग की है। विकास तो उनका होगा।

अब सवाल जनता से आया था और जवाब भी जनता में ही देना था तो विकास की मम्मी आंखों में आँसू ले आईं और दहाड़े मारते हुए बोलीं कि विकास तो सिर्फ तुम्हारा है, सिर्फ तुम्हारा, मैं आग में जल जाऊं अगर विकास तुम्हारा न हो तो।

फिर जनता से आवाज आई ठीक है-ठीक है, विकास हमारा होगा वो तो जब होगा तब मालूम हो जाएगा। मगर होगा कब

आंसू टपकाते हुए.....

अगर तुम्हारा विकास 100 दिन में न हो तो मुझे गोली मार देना, मुझे बीच चौराहे फांसी चढ़ा देना। मै चली जाऊंगी झोला उठा कर, कभी मुँह भी नहीं दिखाऊंगी।

महीना गुजरा, साल गुजरी और गुजर गयी पंचवर्षीय योजना, लेकिन विकास नहीं हुआ। हां एक काम जरूर हुआ वो जिसने भी विकास की देरी पर सवाल उठाए उस के साथ गाली गलौच, मारपीट, नई-नई चालबाजिया, गुंडागर्दी की गई, मक्कारियों की तो पूछो ही मत।

विकास तो हाथों में नहीं आया लेकिन उसके बदले जनता की लाशें जरूर हाथों में आयीं।

वही दूसरी तरफ उस दिन के बाद से अब तक सत्ता को तन्नू की तरह विकास के असली पापा ब्लैकमेल कर रहे हैं और जनता की मेहनत की कमाई को लूट रहे हैं। सत्ता पोल खुलने के डर से चुप है कि अगर गलती से जनता के सामने पोल खुल गई तो अय्याशियां तो बन्द होंगी ही क्या पता जान से भी हाथ धोना पड़ जाए।

ये सरकार भी विकास को "कुमकुम भाग्य" सीरियल की तरह ही विकास को पेट में ही मार चुकी है। लेकिन सत्ता अब भी दहाड़े मार-मार कर आंखों में आँसू लाकर, झूठी कसमें खा कर जनता को बोल रही है कि विकास होगा, जरूर होगा 2022 में होगा।

जनता को भी जो गलतफहमी थी कि विकास हमारे नाम का है वो बहुत हद तक निकल चुकी होगी या हो सकता है कि बहुत से अभी भी 2022 में विकास के होने के इंतजार में और धोखा खाते रहें, लुटते रहें। लेकिन ये शैतान सत्ता भी तन्नू की तरह अपना अकाउंट कही दूसरी जगह खुलवाए हुई है। अडानी, माल्या, नीरव, अम्बानी, जिंदल, बिड़ला..........

जितने नाम लिखो उतने कम होंगे।

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