ये हंगामा क्यों बरपा है
ये हंगामा क्यों बरपा है
हंगामा क्यों बरपा
सलमान खान को पाॅंच साल की सजा क्या सुना दी गई मानों पूरा हिन्दुस्तान सड़कों पर आ गया। ये किसी कलाकार की प्रसिद्धि का मंजर ही नहीं था बल्कि लोगों के अन्दर जुगुप्सा का भाव अधिक था। सलमान खान ने मुम्बई की सड़क के किनारे फुटपाथ पर सो रहे लोगों के ऊपर गाड़ी चढ़ा दी थी कुछ घायल हो गये, एक की मौत भी तस्दीक हुई। यह कोई किसी घटना का तस्करा नहीं है। इस तरह की दुर्घटनायें इस मुल्क में आम बात हैं। देश के प्रत्येक शहर में ट्रैफिक नियमों का खुला उल्लघंन होता है जिसके शिकार सड़क पर पैदल चलने वाले फुटपाथ पर चलने वाले अक्सर ही होते रहते हैं। इस प्रकार की घटनायें अखबार के स्थानीय संस्करणों में छपकर दम तोड़ देती हैं। चूंकि इस घटना से सलमान खान जुड़े थे, घटना हाईलाइट हो गयी थी, अतः यह प्रकरण मीडिया ट्राइल बन गया। देश के लोग अब अच्छी तरह जानने लगे हैं कि ऐसे मामलों में न्यायालय मीडिया के दबाव में रहते हैं। पिछले डेढ़ दशक में तमाम ऐसे मुकद्मों में न्यायालय को मीडिया के दबाव के चलते, बगैर किसी पुख्ता सबूतों के जनभावनाओं के माफिक, निर्णय देने पड़े हैं। मिसाल के तौर पर जेसिका लाल हत्या कांड, डी0पी0 यादव से जुड़े मुकद्में, डी0पी0 यादव की पुत्री भारती यादव से जुड़ा मुकद्मा आदि-आदि। इन सब केसों में यदि मीडिया का दखल न होता तो अपराधियों का बाल-बाॅंका भी नहीं होता।
बात मैं कुछ हटकर करना चाहता हॅूं। यदि, उस रात, जिस रात सलमान खान नशे में धुत्त होकर गाड़ी चला रहे थे (वैसे ये देश में कोई अपराध की बात नहीं है अधिकांश लोग नशे के बाद ही ड्राइवर को डपट कर पीछे बैठा देते हैं और स्वयं गाड़ी चलाने का आनन्द लेते हैं) यदि उस रात उस फुटपाथ पर लोग सो न रहे होते तो कुछ भी न हुआ होता। यह भी कहने की गलती नहीं करूॅंगा कि लोग फुटपाथ पर क्यों सो रहे थे ? मुम्बई में गरीबों के फुटपाथ पर सोने की परम्परा है। इन्हीं फुटपाथों पर सोते-सोते लोग बड़े-बड़े फिल्म स्टार बन गये। फिर वही बात कि लोग फुटपाथ पर क्यों सो रहे थे ? क्योंकि वे गरीब थे, फुटपाथ पर सोने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं था। अभिजीत भट्टाचार्य ने कहा कि उन्हें गलियों में सोना चाहिये था, मेरा कहना है कि भट्टाचार्य जी ! गलियोें में नींद अच्छी नहीं आती क्योंकि वे सँकरी होती हैं, उनमें हवा ढंग से प्रवेश नहीं कर पाती है इसलिये मुम्बई में गरीबों के लिये चौड़ी-चौड़ी सड़कों के फुटपाथ ही मुफीद स्थान होते हैं।
मेरा किसी से नहीं सिर्फ देश के सियासतदारों से प्रश्न है कि लोग कब तक फुटपाथ पर सोने के लिये मजबूर होते रहेंगे ? वे क्या कर रहे हैं ? लोगों के सिरों पर छत मुहइया कराने का वायदा दशकों से देते आ रहे हैं कब इन लोगों को छत मुहइया होगी। क्या हमारी सरकारें इस समस्या के प्रति संजीदा हैं। मैं कहता हूँ कि नहीं । केवल एक बार इमरजेंसी के दौरान इस समस्या से निपटने के लिये कुछ कारगर प्रयास किये गये थे किन्तु देश के गैर जिम्मेदार नेता जो कि केन्द्र में अपनी सरकार बनाये जाने के लिये ढाई दशक से परेशान थे, ने नारा दिया कि आधी रोटी खायेंगे, नसबन्दी नहीं करायेंगे। तब से लेकर आज तक बढ़ती हुई आबादी के लिये कोई सार्थक प्रयास नहीं किये गये। मैंने जब होश संभाला था तब देश की आबादी लगभग 75 करोड़ रही होगी, साढ़े तीन दशकों में हमने 50 करोड़ और खाते में जमा कर लिये, सियासतदार खुश कि उनका वोट बैंक बढ़ रहा है। गरीबों की राजनीति का बहुत सी पार्टियों ने धन्धा बना लिया है। पश्चिम बंगाल में तो तीन दशक तक गरीब किसान मजदूरों को संजो कर रखा गया। उनकी गरीबी की नुमाइश कर कम्युनिस्ट पार्टियों के नेता पूरे देश में हाईलाइट होते रहे। 1991 में मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री बनने के बाद कुछ आशायें जगी थीं कुछ परिणाम भी अच्छे मिले थे, पश्चिम बंगाल में गरीबों की नुमाइश करने वाले वाम दलों का सफाया भी हुआ, किन्तु वहाॅं चेहरा तो बदला काम का तौर तरीका वही रहा, गरीबी की नुमाइश आज भी हो रही है। दिल्ली में केजरीवाल के आते ही परिवर्तन का पहिया उल्टी तरफ घूम गया। फुटपाथ आबाद रहेंगे, सलमान खान जैसे रईसों की गाडि़यों से ऐसी दुर्घटनायें होती रहेंगी, लोगों को इस तरह के चटपटे समाचार मिलते रहेंगे, इलेक्ट्रोनिक मीडिया की टी0आर0पी0 बढ़ती रहेगी।
दादा साहब फाल्के एवार्ड को दिये जाने के लिये जो नियम बनाये गये हैं उनमें क्या इस बात का भी ख्याल रखने की व्यवस्था है कि व्यक्ति को तभी इस पुरूस्कार से नवाजा जायेगा, जब वह स्ट्रेचर अथवा व्हील चेयर पर आ जायेगा। पिछले दो दशकों से फिल्म इण्डस्ट्री में शशि कपूर ने कोई योगदान नहीं दिया। फिर दो दशकों तक क्यों इन्तजार किया गया ? इन पुरूस्कारों के पीछे राजनीति होती है यह सब जानते हैं लेकिन पिछले दो दशकों में कांग्रेस, भाजपा और तीसरे मोर्चे सभी की सरकारें रहीं हैं, फिर तो यह एंगिल भी नहीं बनता है। फिर क्या निर्णय लेने वालों के मन में यह ख्याल रहता है कि किसी स्वस्थ व्यक्ति का कम उम्र में इस पुरूस्कार से नवाजे जाने से पुरूस्कार का दोहन हो जायेगा। खैर जो भी हो यहाॅं भी व्यवस्था व सोच बदलने के बारे में कोरा वौद्धिक विलास ही कर सकते हैं हम।
अनामदास


