योग पर ये नज़रे इनायत क्यों?

21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस क्या घोषित किया गया, केंद्र सरकार और हिन्दू पुनरुत्थांवादियो की बांछे खिल गयी। क्यों?

1. यह सरकार मात्र लोगों का ध्यान मूलभूत समस्याओं से हटाने के लिए काम कर रही है, ताकि देश में कोई सार्थक बहस ही न हो सके और ये अमीरों के हक़ में बिला बाधा नीतियां बना सके। गरीब तो इसलिए गरीब है कि वो इसी लायक है। इनकी बदहाली में भरे पेट लोगों और धन पशुओं का कोई दोष नहीं।

2. आखिर संघ गिरोह और हिन्दू पुनरुत्थानवादी इतने सालों से देश की जनता को समझाने की जुगत कर रहे हैं कि प्राचीन भारत में ज्ञान विज्ञान के ऐसे स्रोत भरे पड़े है कि आज का ज्ञान विज्ञान उसके सामने पानी भरे। लीजिये अब तो सारी दुनिया ने ये बात मान ली।अरे योग करिये योग जो बाबा रामदेव जैसे आधुनिक योगी बता रहे हैं।

3. हिन्दू सर्वश्रेष्ठता की बात आखिर सब हिन्दुओं के गले उतारनी ही है। योग का ढिंढोरा पीटकर ये बात शायद सबको समझाई जा सके। खाली शाखाएं लगाने, गांधी-नेहरू को गरियाने से बात पूरी बनी नहीं तो अब शायद योग से नैय्या पूरी पार हो जाए।

4. चिकित्सा नीति को गरीब के हक़ में मोड़ना तो बहुत कठिन है न। दवा कंपनियो और उनके आकाओ से पंगा कैसे लें, दवाएं तो महंगी और इलाज़ और महंगा तो करना ही पड़ेगा भाई। तो कहां चक्कर में पड़े हो। योग करो और मौज करो।
और भी कुछ कारण है पर वो कभी और।

जब आरएसएस की शाखाओ में भी बाबा रामदेव टाइप उछलकूद योग कराएंगे, तब विस्तृत चर्चा करेंगे।

इनके षडयंत्रो से दूर रहिये। घर में अपने बच्चों के साथ बच्चे बनकर खेलिए। किसी अच्छे सच्चे फिज़ीशियन के संपर्क में रहिये और फिर मरना तो हम सबकी नियति ही है एक दिन।
आलोक वाजपेयी
आलोक वाजपेयी, लेखक इतिहासकार हैं।