योगा की मार्केटिंग
योगा की मार्केटिंग
जागो हिन्दुओं जागो, मोदी जब तक देश के प्रधानमंत्री हैं, देश में विभिन्न धर्मों के मध्य माहौल सौहार्दपूर्ण नहीं रह सकता
21 जून का विशेष महत्व है भौगोलिक दृष्टिकोण से, साधारण शब्दों में बयान किया जाये तो यह वर्ष का सबसे बड़ा दिन होता है, इसी दिन को यू0एन0 ने विश्व योग दिवस घोषित किया है। पिछले वर्ष मोदी के प्रधानमंत्री बनने के पश्चात् विश्व योग दिवस मनाये जाने की बात मोदी द्वारा उठाई गयी थी। यू0एन0 के पास वैसे भी कोई काम नहीं रहता है, वर्ष का शायद ही कोई ऐसा दिन शेष हो, जिसे किसी न किसी विषय के लिये विश्व दिवस का नाम न दिया गया हो।
मार्केटिंग में उस्ताद मोदी ने पूरे भारत को जताया देखो कि वह प्रधानमंत्री बनते ही किस प्रकार विश्व स्तरीय नेता बन गये हैं। जैसे ही उन्होंने एक दिन को विश्व योग दिवस मनाये जाने की मांग की कि यू0एन0 ने पलक पांवड़े बिछा उनकी मांग को स्वीकार लिया। मार्केटिंग ही मार्केटिंग। भला मोदी कहाँ चूकने वाले विश्व योग दिवस पर तमाशे का इंतजाम कर ही लिया गया। विरोधी राजनीतिज्ञ भी अखाड़े में कूद पड़े, तत्काल योगा को धर्म से जोड़ दिया गया। कठमुल्ले कुरान को पलटने लगे। भला कुरान में कहाँ योगा का जिक्र मिलेगा और यदि कुरान में जिक्र नहीं, तो फिर तो यह काफिरों की साजिश है। मुस्लिम कठमुल्लाओं ने घोषणा कर दी कि सूर्य नमस्कार तो किसी की इबादत है, वे खुदा के अलावा किसी के सामने नहीं झुक सकते, इस योगा का बहिष्कार करेंगे। राजनीति के गणित में माहिर संघियों ने आनन-फानन नफा नुकसान का आंकलन किया, उन्हें लगा कि सूर्य नमस्कार को यदि निकाल दिया जाये तो भी कोई नुकसान नहीं होने वाला, सूर्य नमस्कार के बगैर भी योगा की मार्केटिंग की जा सकती है।
और फिर दिल्ली के ऐतिहासिक इंडिया गेट पर पूरे देश ने देखा कि देखने में योगी कम भोगी ज्यादा लगने वाले मोदी योगा कर रहे हैं। फिर यह भी देखा गया कि वे आगे की पंक्ति में बैठे योग प्रशिक्षुओं के पास जा-जाकर पूरे देश को जता रहे हैं कि वह देश के प्रत्येक नागरिक के स्वास्थ्य के लिये कितने चिंतित हैं। मंच पर बैठे बाबा रामदेव मुस्कुरा रहे थे उनकी दुकान अब खूब चलेगी, उनके शिविरों में अब और भीड़ होगी, शिविरों में आने वाले प्रशिक्षुओं से वह बढ़ी दरों से और वसूली कर सकेंगे, अब उनके साथ चाय पीने वाले या खाना खाने वालों से वसूली जाने वाली धनराशि में भी इजाफा हो सकेगा। आयोजित शिविरों में अपने उत्पादों का प्रचार करने का और मौका मिलेगा तब वह आसानी से लोगों की जेबों में डाका डाल कर अपने आर्थिक साम्राज्य का और विस्तार कर सकेंगे। जिन बाबाओं को इण्डिया गेट पर मंच नसीब नहीं हुआ, वे अवश्य कुढ़ रहे होंगे। फिर भी प्रसन्न होंगे चलो जो भी हो मोदी ने उनकी धन्धेबाजी में योगदान दिया है।
योगा की मार्केटिंग
मैं योगा को बुरा नहीं मानता, लोगों को बगैर किसी धार्मिक संक्रीणता के इस विधा को अपनाना चाहिये। योगा स्वास्थ्य के लिये बहुत अच्छी विधा है, किन्तु जिस प्रकार पिछले कई वर्षों से योगा को लेकर साधु-महात्माओं ने धन्धा बना लिया है, योगा की आड़ में ...... जारी..... आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.....
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देश के विभिन्न भागों में सैकड़ों बीघे जमीन हथिया कर अपने-अपने साम्राज्य खड़े कर लिये हैं, मुझे इस पर आपत्ति है। योगा की आड़ में लोग क्या-क्या धन्धे नहीं कर रहे हैं ? काले धन का विरोध करने वाले बाबा रामदेव ने इस योगा की आड़ में कितना काला धन सफेद कर दिया है इसे आम जनता नहीं समझ पा रही है और न ही समझेगी।
मार्क्स ने धर्म को अफीम कहा तो गलत नहीं कहा है। देश में धर्म के आधार पर हो रही राजनीति देश को अन्ततः पीछे की ओर ले जा रही है। मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि मैं जब भी किसी नये मुद्दे को संघियों या भाजपा के द्वारा उठाया हुआ देखता हूँ, तो मुझे साम्प्रदायिकता की बू आने लगती है। इसके पीछे कारण है कि भाजपा और संघ ने सदैव धर्म के आधार पर मुद्दों को परिभाषित किया है। भाजपा को चलाने वाले संघ के लोगों की राष्ट्रीयता अत्यन्त संकुचित है वे हिन्दुओं को ही राष्ट्रभक्त मानते हैं, उनकी राष्ट्रभक्ति में दूसरे धर्म से आये लोगों का कोई स्थान नहीं है। संघ के लोगों की इस मानसिकता को बदला नहीं जा सकता।
इसलिये जब-जब दिल्ली की कुर्सी पर कोई संघ से समर्थित व्यक्ति बैठेगा, तो देश सदैव साम्प्रदायिकता की भट्टी के आगे खड़ा दिखाई देगा। मोदी जब तक देश के प्रधानमंत्री हैं, देश में विभिन्न धर्मों के मध्य माहौल सौहार्दपूर्ण नहीं रह सकता है यह एक अकाट्य सत्य है जिसे सभी को स्वीकारना चाहिये। गोधरा कांड का कंलक मोदी के मस्तक पर लगा है जिसे वह ताउम्र धो नहीं सकते। वह प्रधानमंत्री बन सकते हैं, विश्व में और ख्याति अर्जित कर सकते हैं, किन्तु मुस्लिमों और इंसानियत का दिल नहीं जीत सकते।
हमारे हिन्दुत्ववादी भाईयों को मेरी दलीलें शायद पसन्द न आयें, किन्तु जब भी वे धर्म निरपेक्ष होकर, तटस्थ भाव से आकलन करेंगे, तो उन्हें लगेगा कि वे बहुसंख्यक होते हुये अल्पसंख्यकों के साथ न्याय नहीं कर रहे हैं। यदि देश के हिन्दू राष्ट्रभक्त हैं तो मुस्लिम क्यों नहीं ? इस मानसिकता को जब आम लोग समझ लेंगे उसी दिन भाजपा भरभरा कर गिर पड़ेगी, इसकी राजनैतिक हैसियत 1960-70 दशक की जनसंघ वाली हो जायेगी, जब कांग्रेस के नेतृत्व में सभी धर्म निरपेक्ष ताकतें एक थीं।
विभाजन की त्रासदी के बाद भी हिन्दू मुस्लिम एक होकर भारत को अपना देश मानते थे, तब किसी भी संघी के प्रचार को इस तरह तबज्जो नहीं मिलती थी, तब देश के हिन्दू इनके बहकावे में नहीं आते थे।
अनाम दास


