राजनीति में मतभेद और पाचनशक्ति
राजनीति में मतभेद और पाचनशक्ति
राजनीति में मतभेद - कांग्रेस का इतिहास ही जनतंत्र का इतिहास है
हमें गिरोह से कोइ परेशानी है न होगी। हमें चिंता रहती है उन अबोध लोगों की जो गदः पचीसी की उम्र में ही इनके प्रपंच में फंस जाते हैं और अनाप-शनाप इतिहास सुन-सुना कर समाज में अनजाने ही जहर फैलाते रहते हैं। आज एक बेहद खूबसूरत बहस चली है श्रीमती सोनिया गांधी बनाम (?) राहल गांधी। नेता सुभाष चंद बोस बनाम जवाहर लाल नेहरू। इसी के बहाने यह भी लपेटे में है कि दल के अंदर का जनतंत्र ?
इस पर स्वस्थ बहस चलनी चाहिए। कुछ सवालों के साथ। एक - इस बहस की शुरुआत किसने की ? जानने के पहले उस मुहाने को देखिये जो अतीत के तमाम खेलों का माहिर रहा है। वह है गिरोह। तुर्रा ये कि इस तरह की बेहूदी हरकतों की शुरुआत किसी जिम्मेदार की तरफ से नहीं होती। कोई ऐरो गेरू भागता हुआ आएगा और बकबकाते हुए आगे निकल जायगा और जब कुछ नहीं निकलेगा तो पल्ला झाड़ कर गिरोह अलग खड़ा हो जायगा। और जब कभी पकड़ में आ जायेंगे तो कह देंगे यह तो जुमला था। ऐसे थेथर लोग इस देश को चला (?) रहे हैं।
कांग्रेस के अंदर का विवाद नया नहीं है। मतभेद जनतंत्र का पहला पाठ है। गिरोह मतभेद जानता ही नहीं, क्यों कि उस दरबे में किसी भी प्रश्न पर प्रतिबंध है। नागपुर जो बोले उसे सुनो। दूसरी तरफ कांग्रेस का कोई भी कदम बगैर प्रश्न के शुरू ही नहीं होता इसे मतभेद कहते हैं। जहां मतभेद होगा वहाँ बहुमत और अल्पमत की गिनती चलेगी। इन कमबख़्तों को इतना भी नहीं मालूम कि जनतंत्र है क्या। कांग्रेस का इतिहास ही जनतंत्र का इतिहास है। हम ज्यादा दूर नही जायेंगे। बाल गंगाधर तिलक और गोपाल कृष्ण गोखले के बीच मतभेद रहा लेकिन दोनों कांग्रेस के पुरखे हैं। गांधी जी का मतभेद बारी-बारी सबसे रहा है। हिन्द स्वराज और मेरे सपनों का भारत से गोखले जी का जबरदस्त विरोध रहा, लेकिन वही गोखले जी गांधी को कांग्रेस संभालने की सलाह देते हैं अपने पुराने मतभेद गोखले जी से मिलने की सलाह भी देते हैं। गांधी का मतभेद जिन्ना से ही नहीं पटेल, रवीन्द्रनाथ टैगोर जी से हुआ। मदन मोहन मालवीय, मोतीलाल नेहरू से रहा। पंडित नेहरू से बापू का मतभेद जबरदस्त रहा लेकिन ये मतभेद था मनभेद नहीं था। इसी तरह गांधी का मतभेद नेता सुभाषचंद बोस से रहा। नेता जी ने गांधी को बापू का सम्बोधन और राष्ट्रपिता कह कर संबोधित करते रहे। 45 में नेता जी का आख़िरी सम्बोधन जापान रेडियो से प्रसारित हुआ जिसमें बापू के प्रति उनका आदर भाव देखा जा सकता है। डॉ. अम्बेडकर और बापू के बीच जबरदस्त मतभेद रहे लेकिन वही गांधी रहे जो उन्होंने संविधान बनाने की जिम्मेवारी डॉ. आंबेडकर को दी। हम पीछे की कतार के कांग्रेसी मतभेद की बात नहीं कर रहे। बहुत है। बहुत रहा है। यह कांग्रेस की पाचन शक्ति है जो दल के अंदरूनी हिस्से में जनतंत्र को कायम रखा हुआ है। आज की स्थिति में यह बहस चलाना कि कांग्रेस में गुटबाजी है, उसे सुधार कर बोलो गिरोह और हे डिब्बा कुछ पढ़-लिख कर गला फाड़ो, जिसे तुम काहिल जाहिल लोग गुटबाजी कहते हो, वही जनतंत्र है।
चंचल


