राजनीतिक पार्टियों के लिए विदेशी फंडिंग : एक खतरनाक कदम
राजनीतिक पार्टियों के लिए विदेशी फंडिंग : एक खतरनाक कदम
Foreign funding for political parties: a dangerous move
राजनीतिक पार्टियों के लिए विदेशी फंडिंग हमारी राजनीतिक व्यवस्था में बहुराष्ट्रीय निगमों की सीधी दखलंदाजी की ओर ले जाएगा और संसदीय जनतंत्र को ही भीतर से खोखला कर देगा।
प्रकाश कारात
भाजपा की सरकार ने एक खतरनाक कदम उठाते हुए, विदेशी कंपनियों को भारत में राजनीतिक पार्टियों को फंड देने की इजाजत दे दी है। अब तक विदेशी चंदा (नियमन) कानून (एफसीआरए) के तहत, राजनीतिक पार्टियों के बाहर से पैसा लेने पर रोक थी। इस रोक के दायरे में विदेशी कंपनियां और भारत में उनकी सब्सीडरियां भी आती थीं।
अब तक की कानूनी स्थिति यह थी कि भारत में काम कर रही ऐसी किसी भी कंपनी को विदेशी कंपनी माना जाता था, जिसकी 51 फीसद या उससे ज्यादा हिस्सा पूंजी विदेशी स्रोत से आयी हो। अब एफसीआरए के इसी प्रावधान में संशोधन कर दिया गया है और यह प्रावधान कर दिया गया है कि विदेशी निवेश भले ही 50 फीसद से ऊपर हो, जब तक विदेशी पूंजी अंश विदेशी मुद्रा कानून के अंतर्गत या नियम-कायदों के तहत, विदेशी निवेश के लिए तय की गयी अधिकतम सीमा के अंदर रहता है, संबंधित कंपनी को इस कानून के लिए विदेशी नहीं माना जाएगा। इसका अर्थ यह है कि मिसाल के तौर पर टेलीकॉम क्षेत्र में, जिसमें विदेशी पूंजी निवेश की अधिकतम सीमा 74 फीसद है, विदेशी हिस्सा पूंजी के प्रचंड बहुमत के बावजूद, संबंधित कंपनी को विदेशी कंपनी नहीं माना जाएगा। उदाहरण के रूप में टेलीकॉम कंपनी, वोडाफोन को भी अब भारतीय कंपनी की तरह ही देखा जा रहा होगा!
इसका मतलब यह हुआ कि आइबीएम, सेमसुंग, जनरल मोटर्स आदि, आदि, तमाम बहुराष्ट्रीय निगम भारत में राजनीतिक पार्टियों को चंदा दे सकेंगे। जाहिर है कि ये चंदे भारतीय कार्पोरेटों के चंदों के ऊपर से होंगे, जिनकी पहले भी इजाजत थी।
इस तरह सिरे से बदलाव करते हुए, सभी विदेशी उद्यमों तथा बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारतीय का दर्जा दे दिया गया है और उन्हें मान्यताप्राप्त राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने की खुली छूट दे दी गयी है। इसके हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था के लिए बहुत गंभीर दुष्परिणाम होंगे और राजनीतिक पार्टियों पर आधारित व्यवस्था पर ही इसका बहुत भारी असर पड़ेगा। यह हमारी राजनीतिक व्यवस्था में बहुराष्ट्रीय निगमों की सीधी दखलंदाजी की ओर ले जाएगा और संसदीय जनतंत्र को ही भीतर से खोखला कर देगा।
इस तरह के बदलाव के साथ, गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) के लिए विदेशी कंपनियों के चंदे भी वैध हो जाएंगे। इस तरह, यह एफसीआरए की जड़ ही काटना होगा, जिसका उद्देश्य ही यह था कि विभिन्न सार्वजनिक गतिविधियों में विदेशी चंदों के प्रवाह का नियनम किया जाए, ताकि देश की एकता व अखंडता की हिफाजत की जा सके।
यह बदलाव इसलिए और भी निंदनीय है कि यह संशोधन इसीलिए किया गया है ताकि भाजपा को, विदेशी कंपनी से चंदा लेकर, देश के कानून का उल्लंघन करने के आरोपों से बरी कराया जा सके। राजनीतिक पार्टियों के चंदा लेने से संबंधित एक मामले में, 2014 के अपने एक फैसले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कांग्रेस और भाजपा, दोनों को एफसीआरए के तहत विदेशी चंदे लेने पर लगी पाबंदी का उल्लंघन कर, विदेशी चंदे लेने का दोषी पाया था। इन पार्टियों ने, विदेशी कंपनी वेदांता की सब्सीडियरी से चंदे लिए थे। इन दोनों पार्टियों ने उच्च न्यायालय के उक्त फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जहां यह मामला विचाराधीन है। इतना ही नहीं, वित्त विधायक के साथ जोडऩे के जरिए, एफसीआरए में इस संशोधन को विगत प्रभाव से, सन 2010 से लागू किया गया है, ताकि इन दोनों पार्टियों को उक्त प्रकरण में राहत मिल जाए।
वित्त विधेयक का सहारा लेकर, पिछले दरवाजे से एफसीआरए में संशोधन करना और अन्य कानूनों में विदेशी कंपनी की परिभाषा में भी बदलाव करना, विधायी मामलों में मोदी सरकार द्वारा की जा रही तिकड़मबाजी की ही एक और मिसाल है। इससे पहले भी मोदी सरकार ने ऐसी ही तिकड़मबाजी कर के, स्पीकार के जरिए आधार विधेयक को एक ‘‘मनी बिल’’ घोषित करा लिया था।
राजनीतिक पार्टियों के लिए विदेशी चंदों को कानूनी बनाना एक राष्ट्रविरोधी तथा जनतंत्रविरोधी कदम है। मोदी सरकार ने जहरीले विदेशी राजनीतिक प्रभाव के लिए दरवाजे खोल दिए हैं, जो राजनीतिक पार्टियों को प्रदूषित करेगा और जनतंत्र को भीतर से खोखला कर देगा।
सभी जनतांत्रिक शक्तियों को एकजुट होकर इसके लिए जोर लगाना चाहिए कि इस नुकसानदेह संशोधन को निरस्त किया जाए। 0


