इस बात पर भरोसा करते हुए कि भारत की सरकार और सेना झूठ नहीं बोलेगी, मेरा कहना है कि अगर म्यांमार की सरकार और सेना ने हमें सहयोग किया और किसी वजह से वे नहीं चाहते हों कि यह बात सार्वजनिक हो, तो क्या उन्हें असहज परिस्थिति में डालने से बचा नहीं जा सकता था?

जो हमें सहयोग करे, उसे 24 घंटे के भीतर ऐसी स्थिति में डालने की क्या ज़रूरत थी कि उसे खंडन करना पड़ जाए कि नहीं, भारतीय सेना का ऑपरेशन हमारी सरहद के भीतर नहीं हुआ था? मेरे ख्याल से एक ही ऑपरेशन से पूर्वोत्तर की धरती से उग्रवाद समूल नष्ट नहीं हो गया है और आगे भी हमें म्यांमार से ऐसे सहयोग की ज़रूरत पड़ती रहेगी।
छप्पन इंच की छाती का दम तो तब स्थापित होगा, जब कोई समस्या समूल नष्ट हो जाए। एकाध कार्रवाइयों से यह स्थापित नहीं हुआ करता। भारत ने दूसरे मुल्कों में इससे भी बड़ी-बड़ी सैन्य कार्रवाइयां की हैं। 1971 में तो बाकायदा युद्ध छेड़कर उसने बांग्लादेश को आज़ाद कराया।
इसलिए मेरा ख्याल है कि राजनीतिक लाभ के लिए सरकार को बड़बोलेपन से बचना चाहिए और ऐसी कार्रवाइयों के मामले में अतिरिक्त गोपनीयता बरतनी चाहिए। जिस दिन आप पाकिस्तान और चीन से मिल रही चुनौतियों का करारा जवाब देने की स्थिति में आ जाएं, उस दिन हम आपकी छाती को आपके बिना ढिंढोरा पीटे 56 नहीं, 156 इंच का मान लेंगे।
अभिरंजन कुमार