राम जन्म भूमि/ बाबरी मस्जिद विवाद पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंड पीठ ने अपना ऐतिहासिक फैसला "हमारी भी जय जय, तुम्हारी भी जय जय, न तुम जीते न हम हारे" की तर्ज़ पर दे दिया है. फैसले पर कानून की रोशनी में 'किन्तु, परन्तु' हो सकते हैं, लेकिन देश की एकता और अखंडता की रोशनी में यह उचित ही है और इस फैसले का सम्मान करना चाहिए और जिस भी पक्ष को आपत्ति है उसे उच्चतम न्यायलय का दरवाज़ा खटखटाना चाहिए.
हालाँकि १०००० पन्नों के फैसले पर इतनी जल्दी कुछ प्रतिक्रिया नहीं दी जा सकती है, लेकिन जिस तरह से बेंच ने आदेश दिया कि मीडिया उसके आदेश की समीक्षा नहीं करेगा, उससे साफ़ है कि अदालत ने कानूनी पक्ष से ज्यादा इस बात पर ध्यान दिया क़ि फैसले की आड़ में अपनी सियासी रोटियां सेंकने वाले किसी भी तरह कामयाब न हो जाएँ. यह भावनात्मक मुद्दे पर भावनात्मक फैसला है और इससे अच्छा कोई भावनात्मक फैसला नहीं हो सकता.
लेकिन इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है क़ि इस फैसले ने उन फिरकापरस्तों की कमर तोड़ दी जो इस के बहाने खून खराबा कर खुद को ज़िंदा करने के नापाक मंसूबे पाल रहे थे.

हमारे इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने भावनात्मक मुक़दमे का व्यावसायिक लाभ कमाने में कोई क़सर नहीं छोडी. इस फैसले को कवर करने के लिए देश भर के मीडिया कर्मियों ने लखनऊ और अयोध्या में डेरा डाल दिया था। एक तरह से यह मीडिया के लिए उत्सव ज्यादा था. पूरे देश के मीडिया के नुमाइंदे लखनऊ के मीडिया सेंटर में दाखिल हो चुके थे. कुछ चैनल सुबह छह बजे से ही लाइव प्रसारण करने लगे थे। कुछ अपने दिल्ली और मुंबई स्थित स्टूडियो से ही अयोध्या से संबंधित खबरें दिखा रहे थे। दरअसल पहले ये खबर थी कि हाईकोर्ट के फैसले की पूरी जानकारी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार मीडिया सेंटर में आकर देंगे. लेकिन ठीक एक बजे दिन में ये खबर आयी कि अब मीडिया को कोई खबर नहीं दी जाएगी. रजिस्ट्रार मीडिया को कोई जानकारी नहीं देंगे. फिर क्या था, सभी चैनल इसकी जुगत करने लगे कि फैसले को अपने चैनल पर सबसे पहले ब्रेक कैसे किया जाए? सब इसी ताक में थे कि जब कोर्ट के बाहर वकील आएंगे तो वे फैसले के बारे में बतायेंगे। चार बजे ब्रेकिंग चलने लगी कि जजेज कोर्ट में फैसला सुनाने लगे हैं. उन्हें अभी उस फैसले के बाहर आने का इंतजार है। लेकिन आधे घंटे के बाद वही हुआ जिसकी उम्मीद किसी को भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया स�े नहीं थी। कई वकील एक स�ाथ निकले। सभी चैनलों के रिपोर्टर और कैमरामैन माईक आईडी के स�ाथ पिल पड़े. जैसे ही कोई वकील निकलता उस पर स�भी टूट पड़ते। स�वाल भी एक ही स�ाथ पूछना शुरू कर देते. हालत ये थी कि जिस लाइव प्रसारण के लिए स�ारे टीवी पत्रकार गए, उसका मकस�द ही पूरा होता दिखाई नहीं दिया. कौन क्या प्रश्न कर रहा है और उसका क्या जवाब क्या आ रहा है, करीब-करीब बीस मिनट तक तो कोई ठीक स�े स�ुन ही नहीं पाया. चैनल मुख्यालयों के स्टूडियो में भी बैठे होस्ट और गेस्ट हैरान थे कि आखिर फैसला क्या आया है? जब भाजपा नेता और वकील रविशंकर प्रस�ाद बाहर आए तो उन्होंने कहा कि रामलला जहां विराजमान हैं वहीं रहेंगे. बस इस बयान को ही ब्रेकिंग चलाने लगे। निर्मोही अखाड़े के वकील जब बाहए आए और उन्होंने कहा कि उन्हें विवादित स्थल का एक तिहाई हिस्से का अधिकार दिया गया है तो उसके बाद ये भी खबर चलायी जाने लगी. यानि जो वकील जैसा आकर बोला वैसी खबर ब्रेक की जाने लगी. जब स�ुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी आए तो उन्होंने बोला कि उनके दावे को खारिज कर दिया गया है. हालांकि एक हिस्सा उन्हें भी दिया गया है. वे फैसले के खिलाफ स�ुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करेंगे. अब चैनलों के स�ामने स�ंकट हो गया कि आखिर फैसला आया क्या? तब चैनलों ने रिपोर्टर्स ने फैसले की प्रति कथित प्रति पढ़नी शुरू की. स�वाल ये था कि पूरे दस हजार पेजों में लिखा गया फैसला महज दो पन्नों में रिपोर्ट्स के हाथ में कैसे स�िमट गया ? उच्च न्यायलय ने साफ कर दिया था कि फैसले की प्रति उसकी वेब साईट पर तुरंत डाल दी जायेगी. अब उसी वेब साईट से प्रति डाउन लोड करके ब्रेकिंग चलने लगी, फैसले की कॉपी सबसे पहले हमारे पास. खुदा खैर करे, अगर फैसला कानूनी पहलुओं पर और साफ़ साफ़ आ जाता तो तय मानिए हमारे कुछ न्यूज़ चैनल निश्चित तौर पर देश को दंगों की आग में झोंक कर ही मानते. एक बड़े और सबसे तेज़ होने का दवा करने वाले चैनल पर तो एंकर महोदय इसके बावजूद जो भाषा बोल रहे थे, वह एक स्वयमसेवक की ज्यादा थी, किसी पत्रकार की तो थी ही नहीं. इत्तेहादुल मुसलमीन के सांसद असदुद्दीन ओबीसी से यह एंकर महोदय उलझे जा रहे थे जबकि ओबीसी बहुत संजीदा होकर कह रहे थे कि फैसले का ऐतराम करते हुए माननीय उच्चतम न्यायालय में अपील करेंगे.
कुल मिलाकर हमारे मीडिया के मित्रों ने अपनी अपरिपक्वता और राष्ट्र हित से ऊपर व्यावसायिकता का ही परिचय दिया.

अमलेन्दु उपाध्याय