रावण दहन : नाटक या अन्याय के खिलाफ मोर्चा? फासीवाद आज नंगा नाच कर रहा है...
रावण दहन : नाटक या अन्याय के खिलाफ मोर्चा? फासीवाद आज नंगा नाच कर रहा है...
"रावण की मूर्ति” को धूम धाम से जलाना हर साल की प्रक्रिया है. बच्चे से लेकर बूढ़े तक इसका आनंद लेते हैं. कुछ इसका विश्लेषण भी करते हैं। रावण भले ही किंवदन्तियों का खलनायक हो और उसको जलाना एक प्रतीक ही हो, पर यह बताया जाता है कि यह अन्याय पर न्याय की जीत है और लोगों को जोश दिलाता है!
राजनीतिक नेता भी आते हैं, वही पुरानी बातें दुहराते हैं, और लोग तालियाँ बजाते हैं!
देश के हर क्षेत्र में, शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य विभाग में, न्यायालय से लेकर पुलिस और प्रशाषम में, सीबीआई से लेकर हर विभाग के खोजी/अन्वेषण गुप्त सेल तक भ्रष्ट हैं। सरकार का हर मंत्री से लेकर चपरासी तक भ्रष्ट और अपराधी है, 1-2 अपवाद हो सकते हैं!
महान संस्कृति और महान नेताओं और बाबाओं के देश में, दूसरे देशों में भी बेरोजगारी, भुखमरी, गरीबी बढ़ रही है, इसके बावजूद की संपत्ति का बढ़ना, पर केन्द्रीयकरण भी तीव्र हुआ है।
विज्ञान और तकनीक भी बढ़ा है, पर साथ-साथ अज्ञानता और अन्धविश्वाश भी बढ़ा है। यानी दोनों ध्रुव बढ़ा (अमीरी गरीबी और ज्ञान अज्ञान) है और दोनों के बीच खाई भी बढ़ी है!
रावण को प्रतीकात्मक तरीके से जलाने या कोई और धार्मिक अनुष्ठान से हम और खाई में जा रहे हैं। गड़बड़ तो है पर इसका इलाज वहां नहीं है जहाँ हम उसे ख़त्म कर रहे हैं, वहां तो शायद भूत ही है, पर हमारे प्रयत्नों का प्रयास तो उल्टा परिणाम ही दे रहा है।
इन सामाजिक गड़बड़ियों का, बीमारी का आधार उत्पादन के तरीकों में है। उत्पादन संबंधों में है। उत्पादन समाज के अधिकांश मजदूरों/किसानों द्वारा हो रहा है और उत्पाद का मालिकाना कुछ के हाथों में है! सारे कष्टों का उत्पादन यहीं होता है।
भगत सिंह ने इसे समझा। उनकी पार्टी HSRA ने समझा, पर भारत के स्वतंत्र होने पर मालिकों/बड़े पूंजीपतियों के मैनेजर जो उस वक्त कांग्रेस पार्टी थी, उसने (नेहरु, गाँधी, पटेल आदि के नेत्रृत्व में), संविधान और राज्य सत्ता जनता के लिए नहीं बल्कि मालिकों के लिए बनाया। उसी संविधान का सहारा मनमोहन सिंह ने लिया और मजदूर वर्ग पर "सुधार" के नाम पर भयानक जुल्म की शुरुआत की और अब मोदी की सरकार ने तो जुल्म की हर परिभाषा को ही शर्मसार कर दिया। फासीवाद आज नंगा नाच कर रहा है।
संक्षिप्त में अब रास्ता एक ही है साथियों! मजदूर वर्ग और किसान की सरकार। अब उनके हाथ में सत्ता नहीं देनी है, जो हमारा कल्याण करें, बल्कि हम खुद ही अपने देश की हर सम्पदा को अपने हाथ में लें, खुद ही उत्पादन करे, खुद ही बंटवारा करें।
मार्क्सवाद लेनिनवाद ही वह विचारधारा है, जिसके आधार पर रूस में क्रांति हुई और एक समाजवादी समाज स्थापित हुआष हालाँकि स्टालिन की मृत्यु के बाद गद्दारी के कारण वहां पूंजीवाद की पुनार्स्थापना हुई और पूरा का पूरा समाजवादी खेमा ध्वस्त हो गया।
एक अति कष्टदायक सबक पर बहुत ही महत्वपूर्ण! साम्राज्यवादी पूंजीवादी सत्ता को हराने के लिए उससे भी ज्यादा मजबूत स्थिति बनानी होगी, उसके तानाशाही से ज्यादा सशक्त सर्वहारा तानाशाही करनी होगी, केन्द्रीकृत नेतृत्व बनाना होगा, जो प्रजातान्त्रिक आधार पर होगा, ताकि दुश्मनों के हर प्रतिक्रियावादी हरकत को परस्त कर सकें, अंततः एक वर्ग विहीन समाज न बना सकें, जहाँ प्रजातंत्र और तानाशाही सत्ता बेमानीं हो जाये, मजदूरी समप्र हो जाये!
मजदूर एकता जिंदाबाद! क्रांति अमर रहे!"


