सर्वोच्च न्यायालय का बड़ा फैसला, रिलायन्स को सासन परियोजना में 1050 करोड़ रु का बेजा मुनाफा नहीं
सर्वोच्च न्यायालय ने आल इण्डिया पावर इन्जीनियर्स फेडरेशन की अपील स्वीकार कर रिलायन्स की दलील खारिज की:
रिलायन्स को सासन परियोजना में 1050 करोड़ रु का बेजा मुनाफा दिए जाने के विरोध में बिजली इन्जीनियर फेडरेशन ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी :
बिजली खरीदने वाले सातों राज्यों को हुआ लाभ - उप्र को 131 करोड़ रु का लाभ मिलेगा
लखनऊ, 11 दिसंबर। अपीलेट ट्रिब्यूनल ऑफ़ इलेक्ट्रिसिटी (आपटेल ) द्वारा रिलायन्स को सासन परियोजना में 1050 करोड़ रु का बेजा मुनाफा दिए जाने के विरोध में आल इण्डिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका के पक्ष में सर्वोच्च न्यायालय ने 08 दिसम्बर को फैसला देते हुए रिलायन्स की दलीलों को खारिज कर दिया है।

रिलायन्स की सासन परियोजना की कॉमर्शियल संचालन की तारीख के बारे में दिए गए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से इस परियोजना से बिजली खरीदने वाले सातों प्रांतो को राहत मिलेगी।
उत्तर प्रदेश को 131 करोड़ रु. का तात्कालिक लाभ मिलेगा। मध्य प्रदेश को 394 करोड़ रु, पंजाब को 158 करोड़ रु, दिल्ली और हरयाणा को 118 - 118 करोड़ रु, राजस्थान को 105 करोड़ रु और उत्तराखण्ड को 26 करोड़ रु का लाभ मिलेगा और रिलायंस को मिलने वाले बेजा मुनाफे की भरपाई हेतु ये राज्य अब टैरिफ बढ़ाकर 1050 करोड़ रु का अतिरिक्त बोझ आम उपभोक्ताओं पर नहीं डाल सकेंगे।
उक्त जानकारी देते हुए आल इंडिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने बताया कि न्याय मूर्ति कुरियन जोसेफ और न्याय मूर्ति रोहिन्टन एफ नारीमन की बेंच ने 08 दिसम्बर को दिए गए फैसले में रिलायंस की दलील खारिज करते हुए कहा कि जब आम जनता पर बोझ पड़ रहा हो तो जनहित याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय का दखल देना जरूरी हो जाता है।

आम जनता से वसूलने की तैयारी थी
सर्वोच्च न्यायालय ने आल इण्डिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन की याचिका स्वीकार करते हुए अपीलेट ट्रिब्यूनल फॉर इलेक्ट्रिसिटी(आपटेल) के निर्णय को खारिज कर दिया, जिसमे रिलायंस को सासन परियोजना की पहली इकाई (यूनिट नंबर 3 ) के वाणिज्यिक संचालन की तारीख 31 मार्च 2013 कर दी गयी थी जिससे रिलायंस को 1050 करोड़ रु का बेजा मुनाफा हो गया था जिसे सम्बंधित राज्य टैरिफ बढ़ाकर आम जनता से वसूलने की तैयारी में थे ।
उक्त जानकारी देते हुए आल इण्डिया पावर इन्जीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने आज यहां बताया कि 3960 मेगावाट क्षमता की सासन अल्ट्रा मेगा परियोजना प्रतिस्पर्धात्मक बिडिंग के जरिये रिलायंस को मिली थी तथा सात राज्यों ने इस परियोजना से बिजली खरीदने के लिए2007 में बिजली खरीद करार किये थे।
करार के अनुसार इन राज्यों को पहले दो वित्तीय वर्ष में 70 पैसे प्रति यूनिट और अगले दो वर्षों तक 120 पैसे प्रति यूनिट की दर पर बिजली मिलनी थी। करार में 25 वर्षों तक बिजली सप्लाई का लेवेलेजाइस्ड टैरिफ 119.6 पैसे प्रति यूनिट था । सासन की पहली इकाई (यूनिट नम्बर 3) 31 मार्च 2013 को चली किन्तु 660 मेगावाट क्षमता की इकाई 106 मेगावाट क्षमता तक ही चल पाई जो रेटेड केपेसिटी का 16.34 % है जबकि नियम के अनुसार इसे 95 % क्षमता पर चलाने पर ही कमर्शियल संचालन की तारीख मानीं जाती है।
रिलायंस ने 31 मार्च 2013 को ही कमर्शियल संचालन की तारीख मानने को कहा, जिसे केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग ने रद्द कर दिया और यह टिप्पणी भी की कि यह निर्धारित मापदण्डों का खुला मजाक होगा, इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

आल इंडिया पॉवर इन्जीनियर्स फेडरेशन ने मा. सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल की थी
केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग के फैसले के विरुद्ध रिलायन्स ने अपीलेट ट्रिब्यूनल ऑफ़ इलेक्ट्रिसिटी (आपटेल ) में अपील की।
31 मार्च 2016 को आपटेल ने रिलायन्स के पक्ष में निर्णय दिया और 31 मार्च 2013 को कमर्शियल संचालन की तारीख मान लिया।
सासन परियोजना द्वारा जारी प्रेस नोट के अनुसार इस फैसले से रिलायन्स को 1050 करोड़ रु. का अतिरिक्त मुनाफा हुआ जिसे बिजली खरीदने वाले सातों राज्यों से वसूलने की प्रक्रिया रिलायंस ने शुरू कर दी थी।
आल इंडिया पॉवर इन्जीनियर्स फेडरेशन ने अपीलेट ट्रिब्यूनल ऑफ़ इलेक्ट्रिसिटी (आपटेल ) के एकतरफा फैसले को पक्षपातपूर्ण बताते हुए इसके विरोध में 05 मई को मा. सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दाखिल कर दी थी।
फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने 07 मई को उत्तराखण्ड के राज्यपाल और मध्य प्रदेश, पँजाब, उप्र, राजस्थान, हरयाणा, दिल्ली के मुख्यमन्त्रियों को पत्र भेजकर मांग थी कि व्यापक जनहित में सातों राज्य सरकारों को भी समय रहते सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर करनी चाहिए अन्यथा रिलायन्स को मिलने वाले अतिरिक्त मुनाफे की भरपाई उपभोक्ताओं को करनी पड़ेगी जिसके बाद राज्य सरकारों ने भी सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर कर दी थी।
08 दिसंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने इन अपीलों को स्वीकार कर आपटेल के फैसले को निरस्त कर दिया।
उन्होंने बताया कि आपटेल के फैसले से पहले वित्तीय वर्ष में 70 पैसे प्रति यूनिट बिजली देने का अर्थ यह हो गया था कि सासन से राज्यों को मात्र एक दिन (31 मार्च 2013) 70 पैसे प्रति यूनिट में बिजली मिलेगी और उसे एक वर्ष मान लिया गया था, क्योंकि 31 मार्च 2013 को कामर्शियल संचालन मान लिया गया और वित्तीय वर्ष उसी दिन समाप्त हो रहा था।
उन्होंने कहा कि यह खुली लूट और धोखाधड़ी थी जिसके विरोध में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय स्वागत योग्य है।
उन्होंने बताया कि रिलायन्स 1050 करोड़ रु के अतिरिक्त मुनाफे को सातों राज्यों से उसी अनुपात में वसूल रही थी जिस अनुपात में उन्हें सासन परियोजना से बिजली मिलती है।
मध्य प्रदेश को 37.5 %,पंजाब को 15 %,उप्र को 12.5 % ,हरयाणा और दिल्ली को 11.25 % , राजस्थान को 10 % और उत्तराखण्ड को 2.5 % बिजली सासन से मिलने का करार है।
इसी अनुपात में मध्य प्रदेश को 394 करोड़ रु ,पंजाब को 158 करोड़ रु ,उप्र को131 करोड़ रु ,हरयाणा और दिल्ली को 118 -118 करोड़ रु , राजस्थान को 105 करोड़ रु तथा उत्तराखण्ड को 26 करोड़ रु का खामियाजा भुगतना पड़ रहा था।
आल इंडिया पॉवर इन्जीनियर्स फेडरेशन का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय एक ऐतिहासिक निर्णय है अन्यथा आपटेल के निर्णय के बहुत गम्भीर दूरगामी परिणाम होते और आने वाले दिनों में निजी घराने इस फैसले को मिसाल बनाकर मनमाने तरीके से कामर्शियल संचालन की तारीख तय किया करते जो पावर सेक्टर के लिए आत्मघाती साबित होता।