रिश्ते....वफ़ा... ऐतबार...तेज हवाओं में जैसे जलते चिराग
रिश्ते....वफ़ा... ऐतबार...तेज हवाओं में जैसे जलते चिराग
कभी नहीं सोचा था, 'अवैध ' या 'विवाहेतर सम्बन्ध ' जैसे विषय पर कभी कुछ लिखूंगी...इसलिए भी कि यह एक रोग मध्यम वर्ग से कुछ दूर ही रहता है. मध्यम वर्गीय पुरुष, कैरियर बनाने में...सर पर एक छत की जुगाड़ में...बच्चों की उच्च -शिक्षा के प्रबंध में और फिर भविष्य सुरक्षित करने के उपायों में आपादमस्तक इतने आलिप्त रहते हैं कि उनके ह्रदय के दरवाजे पर पत्नी के सिवा कोई और मोहतरमा दस्तक नहीं दे पातीं. (अगर दे भी तो दरीचों को कस कर बंद कर लेने के सिवा उनके पास कोई चारा नहीं होता ) अब यह उनकी मजबूरी के तहत है..या स्वेच्छा से, ये तो वे ही जानें. शायद पुरुष-मित्रों के सामने दिल खोल कर रखते हों पर हम महिलाएँ तो यही सोच खुश हो जाती हैं कि आस-पास चलती बयार से वे बेखबर ही रहते हैं. (अपवाद हर जगह हैं...यहाँ,बहुसंख्यक की बात हो रही है ) बेखबर ना भी हों तो जरा पड़ोसी, कलीग या फिर पत्नी की सहेली से दो मीठी बातें कर लीं (harmless flirting ) इस से ज्यादा ये लोग अफोर्ड नहीं कर पाते या फिर पुरानी प्रेमिकाओं को दिए-लिए या देने की सोच कर लिखे गए पत्र बांच कर ही तसल्ली पा लेते हैं ( मध्यमवर्गीय महिलाओं की खुशकिस्मति :)}
लेकिन फिर इस विषय पर मुझे लिखने की क्या सूझी??...दरअसल कभी-कभी शहर के अंदेशे से मियाँजी की तरह दुबले भी होना चाहिए { योगा..वाक ..कुछ ना कर पाया, यही सही :)} लेकिन असल बात ये है कि आजकल मेरी कामवाली बाई इसी वजह से बहुत त्रस्त है....और रोज ही अपना दुखड़ा रो जाती है. उसकी उम्र का तो पता नहीं...क्यूंकि इन लोगो की शादी बहुत जल्दी हो जाती है. दो बेटियों की शादी हो गयी है...वे गाँव में हैं. अकेले यहाँ अपने पति के साथ रहती है. सुबह से शाम तक कई घरों में काम करती है..छः हज़ार तक कमा लेती है.उसकी अपनी झोपड़ी है. कहती तो है कि उसने अपने पैसों से बनवाया है,पति के पैसो से नहीं. पर उसका दुख है कि पति ड्राइवर है. दस-बारह हज़ार रुपये कमाता है. पर सारे पैसे उसके सामने रहने वाली, एक औरत पर खर्च कर देता है, जो पांच बच्चों की माँ है. इसे सिर्फ पंद्रह सौ रुपये देता है. और यह उसके कपड़े साफ़ करती है. खाना बनाती है. खाने में भी उसे रोज मच्छी-मटन चाहिए.अच्छा खाना नहीं बनाने पर, उसे गालियाँ देता है...और जब यह पलट कर कुछ बोलती है तो हाथ उठाता है.
मैं उसे समझाती हूँ...तुम अपना पेट पाल सकती हो....अपने पति पर आश्रित नहीं हो...छोड़ दो उसका खाना बनाना...उसके कपड़े धोना....इस तरह दुखी होने से क्या फायदा?? पर मेरे लिए कहना आसान है. रोज अपनी आँखों के सामने पति का दूसरी औरत को पैसे, कपड़े ला कर देना...घूमने लेकर जाना..बर्दाश्त करना कितना मुश्किल है ये तो उसका दिल ही जानता होगा.
मेरे समझाने पर कहती है.."अब से अयेसायीच करेगी" कहने को तो वह कह देती है. पर उसका असली दुख है कि वह दूसरी औरत को पैसे क्यूँ देता है. उसके प्रति आसक्त क्यूँ है?? रोज ही बडबडाती रहती है..."मेरा आदमी उदर को गया..पीछू से ये भी गयी "... "कल इगारे बजे रात को आए दोनों ..क्या मालूम किदर को गए थे?"...."मेरे आदमी को भी अक्कल नई है....उसका आदमी तो कुछ कमाता नई...ऐसी औरत लोग को समझना मांगता ना...मेरे आदमी के पिच्छे क्यूँ पड़ी है??"
अब इस प्रश्न का जबाब किसी के पास है?? जबाब तो नहीं...पर सोचने को मजबूर कर देती हैं...ऐसी बातें.
आखिर क्या वजह है...कि उच्च और निम्न वर्ग में ऐसी घटनाएं आम हैं? कई सारे बड़े बड़े नाम हैं..'धर्मेन्द्र'.. 'आमिर खान'.. 'सैफ'..'महेश भट्ट ' 'शशि थरूर'...'अज़हरुद्दीन'...'संजय सिंह'....आदि (नामो की फेहरिस्त बड़ी लम्बी है..कहाँ तक लिखे कोई ) जो काफी दिनों तक वैवाहिक जीवन बिताने के बाद ..दूसरी महिला के प्रति आकृष्ट हो गए.
शायद वजह ये है कि पहली पत्नी उनके संघर्ष की साक्षी होती है. उनका फ्रस्ट्रेशन...हताशा...नाराज़गी,सब देखा होता है. पर जब ये सफलता के शिखर पर पहुँच जाते हैं...तब सिर्फ ऊँची ऊँची बातें करते हैं...दरियादिली दिखाते हैं....quotable quotes उच्चारित करते हैं. हैं. उनके व्यक्तित्व का सिर्फ उजला पक्ष ही सामने आता है..जिसे देखकर कन्याएँ बलिहारी जाती हैं...और इन अधेड़ पुरुषों का खूब ego massage होता है. अब पत्नी तो इतनी तारीफ़ करने से रही क्यूंकि उसने वो काला पक्ष भी देखा होता है...जब लोगों को कितनी गालियाँ दी गयी होती हैं...कितने चाल चले गए होते हैं....कितनी जोड़-तोड़ की गयी होती है. इसलिए वो अब उनके अनमोल वचन से प्रभावित नहीं होती.
और भी बहुत से कारण हैं...रूप-यौवन...अपनी पत्नी की ज़िन्दगी का केंद्र बिंदु ना होना. क्यूंकि पत्नी पर घर की, बच्चों की जिम्मेवारियाँ बढ़ जाती हैं. और वो अब पति को undivided attention नहीं दे पाती..जो ये बालाएँ बखूबी कर लेती हैं.
इतने दिनों पत्नी के सान्निध्य में रहने से उन्हें स्त्री मन की भी अच्छी पहचान हो जाती है. स्त्रियों की पसंद-नापसंद भी ये अच्छी तरह जान लेते हैं. पर उनका मेल इगो उसे अपनी पत्नी के साथ आजमाने नहीं देता. यह सब वे दूसरी महिला-कन्या को इम्प्रेस करने में उपयोग करते हैं. अब इस उम्र में थोड़ी मेच्योरिटी भी आ गयी होती है. अपनी शुरूआती दिनों में की गयी गलतियां वे नहीं दुहराते और ये सारे गुण,दूसरी औरतों को आकृष्ट करते हैं.
मशहूर फिल्म निर्देशक (मासूम और मिस्टर इण्डिया फेम वाले ) शेखर कपूर ने "मेधा" (जो अब मेधा जलोटा हैं ) के साथ अपनी शादी टूटने की पूरी जिम्मेवारी अपने ऊपर ली थी. उनके एक इंटरव्यू में पढ़ा था कि.." वो कैरियर के शुरुआत के दिन थे..वे काफी फ्रस्ट्रेटेड रहते थे...अपने आप में ही गुम रहते थे...मेधा ने बहुत कोशिश की पर वे उनका साथ नहीं निभा पाए"
काफी दिनों बाद 'सुचित्रा कृष्णमूर्ति' ने एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था कि 'शेखर कपूर ने अपनी पहली शादी में अपनी गलतियों से सीखा है...और अब वे उन्हें नहीं दुहराते.' (ये दीगर बात है कि शायद शादी के दस साल बाद ,अब ये दोनों भी अलग हो गए हैं.)
महमूद के गायक बेटे "अली' ने साफ़-साफ़ कहा था कि बच्चों के स्कूल की वजह से शूटिंग्स पर उनकी पत्नी उनके साथ ट्रैवेल नहीं कर सकती...इसलिए अपना अकेलापन दूर करने को उन्होंने दूसरी शादी की (कोई उनसे पूछे कि पत्नी अपना अकेलापन दूर करने को क्या करे....शायद जबाब होगा...उसके पास बच्चे और घर हैं )
जब पत्नी को पति की इस नई आसक्ति का पता चलता है तो वो विरोध करती है...भला-बुरा कहती है...कड़वी बातें कहती है..जिस से पुरुष और भी दूर होता जाता है...और अंततः हमेशा के लिए दूर हो जाता है.
शायद कुछ लोग कहेंगे...पत्नी की भी गलती होती है...हो सकता है...पर कई जगह पति भी पूरी तरह गलत होता है तो पत्नी तो किनारा नहीं कर लेती. पर यह सब अनादिकाल से चलता आ रहा है...और कभी विलुप्त होगा, ऐसा प्रतीत तो नहीं होता.
बस मध्यम-वर्ग इन सबसे बचा ही रहे...और अपनी नून-तेल-लकड़ी की माथापच्ची में ही जुटा रहे...यही बेहतर है


