रिश्ते वार्ता की टेबल पर
रिश्ते वार्ता की टेबल पर
कौशलेंद्र प्रपन्न,
रिश्ते वार्ता की टेबल पर
रंज़िशे इधर भी हैं उधर भी,
हाथ बांधे खड़ी हैं शिकायतें,
कुछ इधर तो कुछ उधर भी,
बचाने की ख़ातिर सियासतें।
शांति भंजक ज़बानें चलती ही रहीं,
उठाए कौन ज़ोखि़म अमन ए चैन की,
ज़िद्दी खड़े हैं दोनों ओर ही,
ठहर जाती बस बात पर ही।
ज़ज्बात तो दोनों के पीसे हैं,
दर्द-ए-इल्म की ख़्वाहिशें तो हैं
अमल-ए-कदम की दरकार है,
जहां मदरसे ज़ेहाद रटाते हैं।
‘भारत पाक संबंध में हाल के थिम्पु वार्ता के विशेष संदर्भ में’
रुदन गृह
वास्तुशास्त्री ने कहा घर होते हैं-
देवता घर,
रसोई घर,
स्नान घर,
लेकिन नहीं देखा कहीं भी,
घर में होता हो रूदन घर।
यूं तो हर काम के लिए होता है घर में अलग कोना,
बैठकखाना,
अंगना,
या एकांत कोना,
जहां बुनी जाती,
बातों की चदरिया,
न सुना,
देखा भी कहां,
किसी घर में होता है एक रोने का कोना।
दरख़्तों को देख
दरख़्तों को हंसते देख-
लग जाती तन-बदन में आग,
कभी यही दिया करते थे छांव,
शीतल मंदबयारों से अठखेलियां करते ये बिरिछ,
अंदर तक सर सरा जाते।
वक़्त है-
कोई हंॅंसने से क्यों रोके,
वो लैंप पोस्ट,
चौराहे की बाई तरफ,
बैठे बापू भी हैं ग़वाह,
हमारे साथ चलते कदमों का,
बापू भी खिल्ली उड़ाने से नहीं चूकते,
लगातार सुबह थका हारा लाठीपटकता,
चौकीदार भी मंुह छुपा कर हॅंसता।
न दरख़्त मौन-
न लैंप पोस्ट पीली पड़ चुकी,
बाईं ओर बिराजे बापू क्योंकर रहते पीछे,
छोटी हो या बड़े,
सभी ने अपना अधिकार जताते,
घंटों समझाते,
दिल कहें,
या मन हरगिज़ नहीं स्वीकारता।
कौशलेंद्र प्रपन्न,
परिचयः
पिछले दस सालों से दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अख़बारों, पत्रिकाओं में समीक्षाएं, आलेख, लेख, टिप्पणी, बाल कहानियां, बच्चों, शिक्षा, सूचना तकनीक एवं आम बजट में शिक्षा योजना में पिछले सात सालों से लेखन। आकाशवाणी, नेशनल चैनल से वार्ता, साक्षात्कार, स्टोरी और बजट समीक्षाएं प्रसारित।


