‘रोज मरने के दृश्य’ में ‘रोज मारे जाने का दृश्य’ रचती हैं सपना चमड़िया
‘रोज मरने के दृश्य’ में ‘रोज मारे जाने का दृश्य’ रचती हैं सपना चमड़िया
आज की कविता – प्रतिनिधि स्वर, सपना चमड़िया की कविताएं-III
सपना चमड़िया की कविताएं- हिन्दी में इस तरह का पैनापन रघुवीर सहाय के यहाँ ही संभव है
गतांक से आगे...III
पूँजी की सांस्कृतिक लीद मनुष्य को स्मृतिहीन बनाने में ही नियोजित है। इस बात से इसका अंदाजा भी लगाया जा सकता है कि सपना चमड़िया ‘स्केल्टन विमेन’ की रूमानी कल्पना को नकारती हैं। सपना जी ‘रोज मरने के दृश्य’ में ‘रोज मारे जाने का दृश्य’ रचती हैं। मीतू का ऐक्सिडेंट विश्वासघात है, हत्या है। यह कविता, जिसमें हम रहते हैं उस पूरी संरचना के खिलाफ़, पंचायत बुलाना चाहती है। हिंसा, दमन और विश्वासघात के रेशमी तारों से बुनी यह पूरी संरचना इस हत्या में शामिल है। कार्य-कारण के सूत्र को यह कविता संवेदनक्षम काव्य-न्याय से रचती है। इस जीवन-विरोधी स्थितियों में बाहर निकलना, जान हथेली पर लेकर निकलना है! कवयित्री का गुस्सा भी देखा जा सकता है। और यह गुस्सा उन सारी परिस्थितियों, लोगों व तर्कों के प्रति है, जो इसे बनाए रखने में किसी भी रूप में सहयोगी हैं-
“अगर मैं तुम्हारे गाँव की
ओझा गुनी होती तो
जवाब नहीं मिलने पर
सबकी आत्माओं को
कील देती
लाल पीली हरी
ट्रैफ़िक लाइट पर”
अन्तिम पंक्तियाँ विडंबनाबोध को और भी सघन करती हैं-
“मैं पूछती हूँ तुमसे
पूछती हूँ दसों दिशाओं से
पूछती हूँ क्षिति, जल, पावक
गगन, समीरा से,
कि अभी कैसे
मर सकते हो तुम
जबकि स्कूटर के लोन की
अन्तिम क़िस्त जानी बाक़ी है”।
हिन्दी में इस तरह का पैनापन रघुवीर सहाय के यहाँ ही संभव है। कविता की रग-रग में बसी करुणा इन पंक्तियों को और भी ज़्यादा मार्मिक बनाती है। यही करुणा ‘गुजरात और ईराक़ की माएँ’ शीर्षक कविता में विस्तार पाती है। रघुवीर सहाय का नाम लिया है तो एक बात स्पष्ट करना चाहता हूँ कि रघुवीर सहाय की करुणा पैसिव करुणा है, जो क्रिया में परिणत ही नहीं होती। रामदास सरे बाजार मारा जाएगा पर कोई विरोध नहीं होगा। इन कविताओं में पैसिव करुणा नहीं; प्रतिरोध है। प्रतिरोध भी सिर्फ़ मुहावरेदार भाषा और नारेबाजी के अर्थ में नहीं, इससे गहरा है। आज पूरे समाज का जिस तरह अमानवीकरण किया जा रहा है और हमारा अपना समाज फ़ासिज़्म के फंदे में कसता जा रहा है, एक संवेदनशील दृश्य भी प्रतिरोध में बदल जाता है। जब वैश्विक पूँजी प्रकृति को चाट जाने पर आमादा हो तो दूब की एक पत्ती उठाना भी सब कुछ की मुखाल्फ़त करना है। इस कविता में व्यक्तिगत अनुभव समष्टि के प्रति करुणा में बदल जाते हैं (थोड़ा और सुधार करें तो- समष्टि के प्रति करुणा के रूप में विकसित होते हैं)। और सामयिक संदर्भों के सहारे अपना राजनीतिक पक्ष और प्रतिपक्ष भी व्यंजित करते हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए लगता है कि सपना जी अपने समय-संदर्भ के प्रति बहुत सजग हैं। इस संदर्भ में कविता से कौन सी अर्थ छायाएँ विच्छुरित होंगी इसे समझती हैं। इसीलिए कई जगह वे मितभाषी हैं और थोड़ा-सा प्रकाश डाल कर चीज़ों को संदर्भों के हवाले कर देती हैं।
उक्त वक्तव्य में, जहाँ से मैंने उद्धरण दिया है, सपना चमड़िया लिखती हैं- “एक व्यक्ति और एक स्त्री का वाङ्ग्मय एक तरह से हमें प्राप्त नहीं हुआ है। एक स्त्री का वाङ्ग्मय सीमित होता है और दुनिया से उसके परिचित होने के दायरे को बराबर समेट कर रखा गया है। समय में बाँधें तो हद से हद सौ साल पुराना होगा”। एक चीज़ और जोड़ने की जरूरत है कि न सिर्फ़
वाङ्ग्मय सीमित है, अपितु भाषा भी उनकी नहीं है। पूरी भाषा ही पुरुष आत्मवत्ता का विस्तार है। सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अर्थ-छवियाँ भी पुंसवादी छापों से लदी हुई हैं। ऐसे में स्त्री के लिए अपने भाव-बोध की कोडिंग अपेक्षाकृत मुश्किल काम है। स्त्रियों में भाषिक सर्जनात्मकता और संरचनागत वैविध्य अधिक देखने को मिलता है। मेरी समझ से इसका कारण यह है कि लेखकों का जीवन-बोध सापेक्षतः जीवन का सामान्य बोध होता या उससे बहुत ज़्यादा समंजित। अतः भाषा के लिए भी कोई नितांत मौलिक संघर्ष नहीं होता, भाषाएँ समान्यतः उनके बोध से अनुकूलित हैं। लेखिकाएँ पुरुषों द्वारा गढ़े गए स्त्रीवादी नारों में उलझ कर अपने प्रतिरोधी दुनिया को ही रचती रहती हैं। इस तरह के जीवन-बोध से एक प्रतिगामी सम्बद्धता बनता है। इसे तोड़ने के लिए सजगता अवश्यक है। सपना चमड़िया की कविताएं इस सम्बद्धता को तोड़ती हुई अपने बोध को रोप देती हैं। यहाँ कविता विविध स्तरों पर पुंसत्त्ववादी अनुभवों को डिकोड करती हुई अपने अनुभवों की कोडिंग करने में सक्रिय दिखेगी।
स्त्रियों ने मिथकों का जितना सर्जनात्मक उपयोग किया है, वह गंभीरता से सोचे जाने की माँग करता है। मुझे सपना जी की कहीं पढ़ी हुई ‘बरसात’ शीर्षक कविता याद आ रही है। जिसमें वे इन्द्र के मिथक को पुनर्व्यख्यायित करती हैं। इसी तरह आप देखें तो मिलेगा कि कवयित्रियाँ प्रकृति को भाषा की तरह रच रही हैं। संभवतः इसका कारण यह है कि दोनों का दमन और शोषण एक ही प्रक्रिया में हुआ है। ‘नमाज़ की तरह’ कविता का एक पाठ इस तरह भी हो सकता है।
जारी....
-आशीष मिश्र युवा आलोचक हैं।
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