रोहित वेमुला के लिए उमड़ा जनाक्रोश भारत में ‘अरब स्प्रिंग’ जैसी ही कोई शुरुआत है?
रोहित वेमुला के लिए उमड़ा जनाक्रोश भारत में ‘अरब स्प्रिंग’ जैसी ही कोई शुरुआत है?
रोहित वेमुला - आत्महत्या और प्रतिरोध
रोहित वेमुला - “राष्ट्र निर्माण” केवल चालाकी से भी तो नहीं होता। दमन इसका दूसरा अपरिहार्य चेहरा है। ये चेहरा भी लखनऊ में इसी घटना में सामने आ गया।
17 दिसंबर 2010 को ट्युनीशिया के सिदी बूज़ीद नाम के शहर के एक मोहल्ले में ठेले पर फल बेचने वाले मोहम्मद बुअज़ीज़ी ने सरकारी तंत्र की क्रूरता और संवेदनहीनता से तंग आकर आत्मदाह किया था। कुछ दिनों बाद अस्पताल में उनकी मौत हो गई। एक क्रूर व्यवस्था के चंगुल में फंस कर जान देने वाले बुअज़ीज़ी पहले व्यक्ति नहीं थे मगर इस घटना ने न सिर्फ ट्युनीशिया में, बल्कि पूरे अरब में व्यापक विद्रोहों को जन्म दिया जिसे ‘अरब स्प्रिंग’ या ‘अरब क्रांति’ के नाम से जाना जाता है।
जातिगत भेदभाव व उत्पीड़न का लंबा इतिहास
17 जनवरी 2016 को हैदराबाद विश्वविद्यालय में शोध छात्र रोहित वेमुला ने विश्वविद्यालय प्रशासन के जातिवादी रवैये और दमन से पीड़ित होकर आत्महत्या कर लिया। रोहित जातिगत भेदभाव के शिकार पहले दलित छात्र नहीं थे, जिसने आत्महत्या की हो। अकेले हैदराबाद विश्वविद्यालय में ही पिछले दस साल में नौ दलित छात्रों ने जातिगत उत्पीड़न के चलते आत्महत्या की है। विश्वविद्यालयों व दूसरी सार्वजनिक जगहों व संस्थानों पर सवर्ण वर्चस्व और जातिगत भेदभाव व उत्पीड़न का लंबा इतिहास है मगर शायद ये पहली बार है कि इस मुद्दे पर इतना व्यापक आंदोलन देश के अलग-अलग हिस्सों में फूट पड़ा है।
क्या ये जनाक्रोश भारत में ‘अरब स्प्रिंग’ जैसी ही कोई शुरुआत है?
अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। हालांकि पर्दादारी की कोशिशें जिस तरह हो रही हैं उससे इतना तो दिखता है कि इस घटना ने समाज के हरेक क्षेत्र में स्थापित सवर्ण वर्चस्व के खिलाफ़ चलती आ रही लंबी लड़ाई को बिल्कुल केंद्र में कुछ इस तरह रख दिया है कि इसे नजरअंदाज कर पाना मुमकिन नहीं है और इसीलिए कभी चालाकी से तो कभी दमन से इसका प्रतिकार किया जा रहा है।
चालाकी और दमन दोनों की बानगी- मोदी ने रोहित वेमुला के लिए आंसू बहाए
चालाकी और दमन दोनों की बानगी लखनऊ में देखने को मिली जहां आंबेडकर विश्वविद्यालय में प्रधानमंत्री मोदी ने रोहित वेमुला के लिए आंसू बहाए। मोदी का वक्तव्य उस चालाकी का आदर्श उदाहरण है जिसमें देश के सत्ताधारी वर्ग-वर्ण माहिर हैं। मोदी ने मंच पर जो भंगिमा बनाई वो इस त्रासदी का जो पाठ वे गढ़ना चाहते हैं उसके लिए बेहतरीन था। जबरदस्त भावुक आवेग पैदा करने वाली ऐसी भंगिमा सिनेमा या थियेटर के मंझे हुए कलाकार ही गढ़ पाते हैं। वक्तव्य में मोदी एक त्रासदी की सूचना देने के बाद लंबा विराम लेते हैं और अपने चेहरे के भावों से वो नाटकीय पृष्ठभूमि रचते हैं जिससे वे इस त्रासदी को एक खास दिशा में मोड़ सकें। इसके बाद वे कहते हैं “उसके परिवार पर क्या बीती होगी” फिर विराम के बाद “मां भारती ने अपना लाल खोया...कारण अपनी जगह होंगे, राजनीति अपनी जगह, लेकिन सच्चाई ये है कि मां ने एक लाल खोया...इसकी पीड़ा मैं भली-भांति महसूस करता हूं...”।
चतुराई से एक विमर्श गढ़ दिया मोदी ने
कितनी चतुराई से एक विमर्श गढ़ दिया मोदी ने जहां एक सामाजिक त्रासदी एक तरफ तो परिवार की त्रासदी बन जाती है और दूसरी तरफ “मां भारती” का नाम लेकर उसे “राष्ट्र” की भावनात्मक त्रासदी का रंग दे दिया जाता है। मगर बड़ी सावधानी से “पीड़ा” और उसके अहसास को व्यक्तिनिष्ठ ही बने रहने दिया और इस पीड़ा के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ कहीं लापता कर दिए। एक जबरदस्त भावुक अपील जिससे प्रधानमंत्री जी ने उन तमाम दमनकारी सामाजिक-राजनीतिक विभाजनों पर पर्दा डाल दिया जिनके चलते रोहित की मौत हुई। पर्दा ही नहीं डाला बल्कि उन्हे खारिज कर दिया और साथ में उन सभी प्रतिरोधी स्वरों को भी खारिज कर दिया जो इन विभाजनों के खिलाफ़ मोर्चा खोले हुए हैं।
इसके बाद मोदी और भी चतुराई से खुद रोहित वेमुला के संघर्ष को भी खारिज कर देते हैं जब वे कहते हैं “हम इस देश को उस दिशा में ले जाना चाहते हैं” जहां “उमंग” “तरंग” “आत्मविश्वास” से लैस “संकटों से जूझने वाला नौजवान हो...”। दूसरे शब्दों में नौजवान रोहित जैसा न हो। भावुकता के आवरण से लपेट कर मोदी ने अपने पाठ में मौजूद हिंसा को छिपा लिया है, हालांकि कई ऐसे स्वर भी हैं जहां ये हिंसा खुल्लमखुल्ला उपस्थित है। मसलन आरएसएस के प्रचार प्रमुख का ये बयान कि ‘याकूब मेमन का समर्थन करने वाले तत्व’ किसी विश्वविद्यालय में कैसे हो सकते हैं।
वैसे ये सिर्फ मोदी की व्यक्तिगत चालाकी नहीं है। असल में ये चालाकी “राष्ट्र निर्माण” के उस शातिर प्रोजेक्ट का अभिन्न हिस्सा है मोदी जिसके नवीनतम वक्ता भर हैं हालांकि वे या उनका ‘मातृ-संगठन’ इसमें अकेले नहीं हैं। जब भी देश में मौजूद सामाजिक-राजनीतिक विभाजनों का सवाल उठता है “राष्ट्र निर्माण” के इस परियोजना की परतें उधड़ने लगती हैं क्योंकि ऐतिहासिक दमन का शिकार हुए जन इस परियोजना की प्रासंगिकता और जरूरत पर सवाल ही नहीं उठाते बल्कि इसका सक्रिय प्रतिरोध भी करते हैं। इसीलिए इन आवाजों को खारिज किए बगैर “राष्ट्र” का काम चल ही नहीं सकता।
“राष्ट्र निर्माण” केवल चालाकी से भी तो नहीं होता। दमन इसका दूसरा अपरिहार्य चेहरा है।
लेकिन “राष्ट्र निर्माण” केवल चालाकी से भी तो नहीं होता। दमन इसका दूसरा अपरिहार्य चेहरा है। ये चेहरा भी लखनऊ में इसी घटना में सामने आ गया। प्रधानमंत्री के भाषण के शुरु में ही कुछ दलित छात्रों ने विरोध में नारे लगाए। उन्हे पुलिस ने हिरासत में ले लिया और खबर है कि उन छात्रों को विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रावास से निष्काषित कर दिया है। विरोध की आवाजें केवल खारिज करने से नहीं दबती हालांकि ये भी दमन का एक तरीका है। हिंसक दमन की जरूरत हमेशा बनी ही रहती है। रोहिथ और उसके साथियों के साथ हैदराबाद विश्वविद्यालय में जो कुछ हुआ वह ऐसे संस्थानों में जारी जातिगत दमन की एक बानगी है। लक्ष्मणपुर बाथे से लेकर खैरलांजी और भगाना तक हिंसा और दमन के उदाहरणों की कमी नहीं है।
रोहित वेमुला ने गूंज को एक धमाके में तब्दील कर दिया। इतिहास में ऐसे क्षण हर रोज नहीं आते
रोहित वेमुला इसी दमन का शिकार बना। लेकिन सिर्फ शिकार नहीं बना रहा। अपने आखिरी खत में नाम लिए बगैर रोहित ने शिकारियों का चेहरा बेनकाब कर दिया। लेकिन यहां मौजूं केवल वो खत नहीं बल्कि रोहित और उसके साथियों का लंबा संघर्ष है। सनद रहे कि विश्वविद्यालय व सरकारी तंत्र के दमन के बावजूद इन छात्रों का धरना जारी था और इसकी गूंज हैदराबाद से बाहर भी जा रही थी। रोहित ने इस गूंज को एक धमाके में तब्दील कर दिया। इतिहास में ऐसे क्षण हर रोज नहीं आते हैं।
- लोकेश मालती प्रकाश


