लाल क़ालीन और पड़दादा
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मैं शर्मिंदा हूँ आज अपनें दादा के पडदादा पर
मैंने नहीं खोजा उनका नाम
उनके निजी कारनामे
दिलचस्पी नहीं किसी पंडे की बही में
सत्रह सौ सत्तावन प्लासी युद्ध के दिन
तब कहाँ थे मेरे दादा
मीर जाफ़र ही भीतरघाती नहीं था
जगतसेठ भी क़तार में थे
रायदुर्लभ ओम/स्वरूप/मेहताबचंद हैं चंद नाम
अंग्रेज़ों के साथ खड़े थे लाव लश्कर के साथ
जब ईस्ट इंडिया कंपनी नें देश भी संभाला
तब कहाँ थे मेरे दादा
कहाँ है दर्ज विरोध की आवाज
इतिहास के पन्ने कोरे अधूरे हैं
'राष्ट्रवादी' पडदादे संग संग मूत देते
मुट्ठी भर अंग्रेज़ बह जाते
शर्म आती है उनकी स्वार्थी चुप्पी पर
तब कहाँ थे मेरे दादा
आज मैं भी चुप्पा दादा हूँ
नहीं कर रहा दादागिरी
ईस्ट इंडिया कंपनी बन देश व्यापार राज कर रहा
बिछा रहे लाल क़ालीन दिल्ली के दादा
शायद शर्म से ग़ुस्साए पडपोतें पूँछें
तब कहाँ थे मेरे दादा
//जसबीर चावला//