झारखण्ड में एसपीओ का आतंक

- ग्लैडसन डुंगडुंग

झारखण्ड के ग्रामीण इलाकों में आतंक का पर्याय बने स्पेशल पुलिस आॅफिसर (एस.पी.ओ.) का और एक घृणित चेहरा समाज के सामने आया है। 23 अक्टूबर, 2012 को झारखण्ड की राजधानी रांची से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर तमाड़ थाना क्षेत्र में स्थित डुंगरडीह गांव की एक आदिवासी महिला सुकरी (बदला हुआ नाम) का पांच एसपीओ ने मिलकर सामूहिक बलात्कार किया। इनमें से दो एसपीओ क्रमशः संजय प्रमाणिक एवं मंगल प्रमाणिक उसी गांव के हैं। इसके अलावा लुंगटू निवासी सोमरा मुंडा, चिरूडिह निवासी सुनील महतो एंव लोबाहातु निवासी धनंजय मुंडा इसमें शामिल हैं।
बताया जाता है इन लोगों ने योजनाबद्ध तरीके से इस घटना को अंजाम दिया। संजय प्रमाणिक एवं मंगल प्रमाणिक डुंगरडीह गांव के रहने वाले हैं इसलिए वे सुकरी से अच्छी तरह से परिचित थे और उन्होंने इसी का गलत फायदा उठाया। जानकारी के मुताबिक 23 अक्टूबर की रात लगभग 11 बजे ये एसपीओ एक स्काॅरपियो से डुंगरडीह पहुंचे। उन्हें मालूम था कि सुकरी अपने घर में अकेली है इसलिए उन्होंने दरवाजा खटखटा कर सुकरी को उठाया एवं पानी मांगने के बहाने से दरवाजा खोलने को कहा। सुकरी जैसे ही दरवाजा खोली वे उसके उपर टूट पड़े। उन्होंने सुकरी को पकड़कर स्काॅरपियो में डाल दिया और उसे डुंगरडीह नाला के पास ले गए जहां इन कुकर्मियों ने उसके साथ रातभर बारी-बारी से बलात्कार किया। अगले दिन सुबह इन लोगों ने सुकरी को धमकी देकर छोड़ दिया कि यदि घटना के बारे में वह किसी को जानकारी देती है तो वे उसे एवं उसके पति को जान से मार देंगे।
इस घटना के बाद सुकरी मानसिक संतुलन खो बैठी थी और घर छोड़कर मायके चली गई। सप्ताह भर में उसकी हालत ठीक हुई लेकिन वह हमेशा बेचैन रहने लगी। सुकरी के पति सुधरा लोहरा को शक हुआ कि उसके साथ जरूर कुछ हुआ है इसलिए उसने सुकरी के दर्द को समझने का प्रयास किया। जब सुकरी को विश्वास हो गया कि उसका पति उसका साथ देगा तब उसने उसे सब कुछ बता दिया। अब इन दोनों ने कुकर्मी एसपीओ के डर से बाहर आकर उनके खिलाफ कानूनी लड़ने का मन बना लिया। 29 अक्टूबर, 2012 को वे दोनों तमाड़ थाना गए एवं कुकर्मी एसपीओ के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। इसके बाद पुलिस ने सुकरी का मेडिकल जांच भी करवाया। जब यह खबर जंगल की आज की तरह फैल गई तो रांची के वरीय पुलिस अधीक्षक साकेत कुमार सिंह ने कार्रवाई करते हुए पांचों एसपीओ को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। उन्होंने कहा कि एसपीओ हो या एसपी कानून सभी के लिए एक है। हालांकि उन्होंने भी सिर्फ दो आरोपियों को ही एसपीओ स्वीकार किया जबकि ग्रामीण बताते हैं कि ये सभी लोग पुलिस के लिए मुखबिरी का काम करते थे।
सुकरी बताती है कि आरोपी एसपीओ का डुंगरडीह इलाके में काफी दबदबा है। गांव के लोग उनके खिलाफ बोलने से डरते हैं क्योंकि ये लोग किसी भी ग्रामीण को नक्सली बताकर पुलिस के हवाले कर देते हैं। ये सभी एसपीओ पूर्व में नक्सली थे एवं भाकपा (माओवादी) संगठन से जुड़े हुए थे। संगठन छोड़ने के बाद पुलिस ने उन्हें एसपीओ बनाया। ग्रामीण बताते हैं कि रांची के पूर्व वरीय पुलिस अधीक्षक प्रवीण कुमार ने इन लोगों को एसपीओ नियुक्त किया था। पुलिस ने उन्हें स्काॅरपियों, बोलेरो और हथियार दिया था और इसी का फायदा उठाकर ये लोग क्षेत्र में अपना दबदबा बनाकर रखते थे। ये लोग पुलिस (गैर-लाईसेंसी) एवं नक्सली संगठनों को अवैध हाथियार सप्लाई करते थे लेकिन उनके खिलाफ कोई बोलने की हिम्मत ही नहीं करता था। झारखण्ड पुलिस एसोसिएशन के पदाधिकारी भी दबी जुबान में कहते हैं कि पूर्व वरीय पुलिस अधीक्षक ने पूर्व नक्सलियों को एसपीओ बनाकर पुलिस के लिए नई मुसीबत खड़ी कर दी है।
बताया जाता है जब प्रवीण कुमार रांची के वरीय पुलिस अधीक्षक थे उस समय रांची जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिस एवं अर्द्धसैनिक बलों को मद्द पहुंचाने के नाम पर भारी संख्या में पूर्व नक्सलियों को एसपीओ नियुक्त किया गया। उन्हें प्रतिमाह मानदेय के रूप में 3000 रूपये दिया जाता है। एसपीओ पुलिस को सूचना देने के साथ-साथ नक्सल विरोधी कार्रवाई में भी अर्द्धसैनिक बलों के साथ शामिल होते हैं। इस दौरान नक्सलियों ने पुलिस मुखबिरी बताकर काफी संख्या में एसपीओ की हत्या की है। लेकिन सबसे रोचक बात यह है कि जब भी एसपीओ मारे गए या उन्होंने गलत काम किया, पुलिस ने उन्हें एसपीओ मानने से ही इन्कार कर दिया। अक्टूबर 2012 में बंुडू के बारूहातु गांव में नक्सलियों ने 3 एसपीओ की हत्या की तो रांची के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक प्रवीण कुमार ने उन्हें एसपीओ मानने से ही इन्कार कर दिया था। इस मामले में बुंडू एवं तमाड़ के एसपीओ ने उनका भारी विरोध किया एवं सुरक्षा की भी मांग की लेकिन उनपर कोई फर्क नहीं पड़ा।
झारखण्ड के रांची, खूंटी, गुमला, लातेहार एवं पलामू जिले के ग्रामीण इलाकों में एसपीओ ने आतंक मचा रखा है। ये लोग महिलाओं के साथ बलात्कार, शरीरिक शोषण एवं छेड़खानी करते हैं, निर्दोष ग्रामीणों की हत्या करते हैं, ग्रामीणों को आतंकित करते है, अपना ताकत दिखाकर लेवी बसूलते हैं एवं नक्सलियों को हथियार सप्लाई करते हैं। 18 अक्टूबर, 2012 को बुंडू मे एसपीओ काली मुंडा ने एक ग्रामीण आकाश मुंडा की हत्या की, जिसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। खंूटी में दो एसपीओ रंदीप आचार्य एवं संजय ने खटंगा पहाड़ में चार ग्रामीणों की हत्या की। 7 दिसंबर 2011 को रनिया में शंकर प्रधान नामक विद्यार्थी को दो एसपीओ ने शादी पार्टी से निकलते समय छुरा मारकर उसकी हत्या कर दी। खूंटी में दिलीप गोप रंगदारी वसूलता था एवं पलामू के पांकी निवासी विनय सिंह ठेकेदारों से लेवी वसूलता था। रांची के लालपुर पुलिस ने नक्सली कुलजीत गंझू को हथियार सप्लाई करनेवाले एसपीओ मंटू सिंह को उनके दो सहयोगियों के साथ गिरफ्तार किया। उपरोक्त घटनाएं यह बताने के लिए काफी है कि एसपीओ किस तरह झारखण्ड में आतंक मचा रखा है लेकिन सरकार एसपीओ को हटाने का नाम नहीं ले रही है।
वर्ष 2009 में देश के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह एवं तत्काली काॅरपोरेट गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने माओवादियों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा बताकर तथाकथित लालगलियारा में अर्द्धसैनिक बलों के साथ भारी संख्या में विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) को मोर्चा पर लगाया। और इसी के तहत झारखण्ड में प्रथम फेज में 3400 एसपीओ एवं द्वितीय फेज में 2600 एसपीओ की नियुक्ति की गई। इस तरह से राज्य में कुल 6000 एसपीओ कार्यरत हैं। इनमें से लगभग 300 एसपीओ नक्सलियों के शिकार भी हो चुके हैं। लेकिन एसपीओ ने पुलिस व अर्द्धसैनिक बलों को मद्द करने के बजाए ग्रामीणों को आतंकित किया, पुलिस पर दाग लगाया एवं शासनतंत्र पर ही सवालिया निशान खड़ा कर दिया।
यहां सरकार को यह बताना होगा कि ये एसपीओ अपने ही बहनो, भाभियों एवं माताओं का बलात्कार, भाईयों, चाचाओं एवं पिताओं का हत्या एवं क्षेत्र में आतंक का माहौल पैदा कर किस तरह से राष्ट्र की सुरक्षा कर रहे हैं? ये नक्सल जो कुछ दिनों पहले राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा खतरा थे पुलिस का बंदूक उठाते ही वे राष्ट्र के हितैसी कैसे हो गए? क्या सचमुच इन लोगों को राष्ट्र की सुरक्षा का जिम्मा दिया जा सकता है? सरकार सर्वोच्च न्यायलय के आदेश का पालन क्यों नहीं कर रही हैं जिसमें न्यायालय ने कहा है कि सिविलियन को हथियार से लैस नहीं किया जा सकता है? आखिर लालगलियारा में एसपीओ द्वारा किया जा रहा मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन का जिम्मेवार कौन है?

- ग्लैडसन डुंगडुंग मानवाधिकार कार्यकर्ता और झारखण्ड ह्यूमन राईटस् मूवमेंट के जेनरल सेक्रेटरी हैं।