लूट का समाजवाद, उसी लूट में हिस्सेदारी और सत्ता में वर्चस्व के लिए संघर्ष
लूट का समाजवाद, उसी लूट में हिस्सेदारी और सत्ता में वर्चस्व के लिए संघर्ष
लूट का समाजवाद, उसी लूट में हिस्सेदारी और सत्ता में वर्चस्व के लिए संघर्ष
महेंद्र मिश्र
समाज के भीतर सरकार है। सरकार के भीतर परिवार। परिवार के भीतर सत्ता। सत्ता के भीतर लूट। और फिर लूट का ही समाजवाद है। उसी लूट में हिस्सेदारी और सत्ता में वर्चस्व के लिए संघर्ष है। समाजवादी कुनबे का यह झगड़ा आजकल सड़क पर है। मैं उस लड़ाई के विस्तार में नहीं जाना चाहता। उसकी जनता को जरूरत भी नहीं है।
लंगड़ा हो गया लोकतंत्र
लोकतंत्र में जनता परिवार के झगड़े नहीं हल किया करती। बल्कि चुने हुए नुमाइंदों और दलों से अपने हिसाब मांगती है। लेकिन भारतीय लोकतंत्र की यह विडंबना है कि राजनीतिक पार्टियों और सत्ता का विकास कुछ ऐसा हुआ कि कुछ चेहरे और परिवार सत्ता के केंद्र में आ गए। और जनता और उसके मशायल हाशिये पर चले गए।
लोकतंत्र लंगड़ा हो गया और पार्टियां जेबी। जनता की हैसियत महज सत्ता संचालन का सर्टिफिकेट बांटने भर की रह गई। जिस राम मनोहर लोहिया की पूरी राजनीति कांग्रेस और उसके परिवारवाद के विरोध पर आधारित थी। विडंबना देखिये उनका चेला आज सबसे बड़ी पारिवारिक सत्ता का मालिक है।
छोटे लोहिया यानी मुलायम सिंह जी ऐसे परिवार के मुखिया हैं जिसका हर बालिग सदस्य सत्ता की किसी न किसी डाल से जुड़ा है।
आखिर यह क्या दिखाता है?
इससे स्पष्ट हो जाता है कि मुलायमी समाजवाद का बराबरी और सामाजिक न्याय के दर्शन से कुछ लेना-देना नहीं है। समाजवाद यहां परिवार तक सीमित है। और दरवाजे से बाहर निकला तो सत्ता से जुड़ी जाति की डेहरी भी पार न कर सका। उसका आखिरी आदमी इसके साये भर से महदूद है।
ऐसे में यह एक नये किस्म का ब्राह्मणवाद है।
जिसमें कहने को तो पार्टी भी है। उसका लोकतांत्रिक संचालन भी है। लेकिन गिरफ्त उस पर कुनबे की है। और सारे फैसले वही करता है।
यहां परिवार का छोटा सदस्य भी पार्टी के बड़े और पुराने सदस्य पर भारी है। जन्म से श्रेष्ठता के निर्धारण का यह ब्राह्मणवादी सिद्धांत अपने मूल रूप और पूरे चरित्र के साथ यहां जिंदा है।
यह बीमारी किसी एक पार्टी और क्षेत्र तक सीमित नहीं है।
कांग्रेस तो इसकी जड़ ही है। और वह अभी भी उससे उबरती नहीं दिख रही है। और अब शायद इस बूढ़ी पार्टी में वह ताकत भी नहीं बची कि उसके चंगुल से बाहर आ सके।
परिवारवाद के इस बरगद को उखाड़कर सच्चा लोकतंत्र लाने का दावा करने वाले उत्तर से लेकर दक्षिण तक दूसरे दल इसकी जड़ों में बदल गए। और फिर अपने-अपने स्थानों पर एक नये बरगद के रूप में विकसित होने शुरू हो गए। उत्तर से लेकर दक्षिण तक इसके बीज जो पड़े थे। आज बड़े-बड़े बरगद के तौर पर देश के सामने हैं।
लोकतंत्र कुछ परिवारों में कैद हो गया
दक्षिण में करुणानिधि का परिवार इसी विरासत की नुमाइंदगी करता है। इस कड़ी में बहुत सारे राजनेता भले ही पूरी सत्ता पर काबिज न हो पाएं हों लेकिन वो सत्ता की विरासत अपने बेटों को सौंपने में कामयाब जरूर रहे।
लालू यादव से लेकर ठाकरे परिवार पंजाब के बादल से लेकर मध्य प्रदेश का सिंधिया परिवार इसी परंपरा के हिस्से हैं।
इस कड़ी में लोकतंत्र कुछ परिवारों में कैद हो गया। सत्ता उसकी बंधक। और आम नागरिक हमेशा-हमेशा के लिए हाशिए पर फेंक दिया गया।
लोकतंत्र का राजशाही माडल
यह लोकतंत्र का राजशाही माडल है। जिसमें कारपोरेट की खाज ने हालात को और बदतर बना दिए हैं। और अब वह जनता की बची खुची संपत्ति के भी दोहन में जुट गया है।
इन्हीं का एक दूसरा लेकिन उससे भी ज्यादा खतरनाक माडल संघ परिवार का है। देखने और अपने पूरे लक्षण में यह बेहद लोकतांत्रिक दिखता है। लेकिन संचालन से लेकर फैसलों तक में उतना ही गैरलोकतांत्रिक और मनुवादी है। इसका लक्ष्य हिंदू राष्ट्र की स्थापना और फिर समाज का ब्राह्मणवादी तरीके से संचालन है।
इस कड़ी में बीजेपी समेत उसके तमाम आनुषंगिक संगठन महज साधन मात्र या फिर कहें मोहरे हैं।
इनके लिए लोकतंत्र, संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाएं वही तक जरूरी हैं, जहां तक जनता का दबाव है। एकबारगी समाज पर पकड़ मजबूत होने के बाद उसे मनमुताबिक चलाने में जिस दिन कामयाब हो गए। इन सबको ताख पर रखने में देरी नहीं लगेगी। इसलिए यहां एक मजबूरी और दिखावे का लोकतंत्र है। और इस ढोंग और पाखंड को तब तक बनाए रखना है जब तक लक्ष्य हासिल न हो जाए।
बीजेपी के ताले की चाभी संघ के पास है।
और पूरे चुनावी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर होने के चलते संघ और उसके नेतृत्व की जनता के प्रति कोई जवाबदेही भी नहीं है। कम से कम इस मामले में दूसरी परिवारी पार्टियां इससे बेहतर हैं। क्योंकि पार्टी और सत्ता से सीधे जुड़े होने के नाते उनके परिवार या फिर मुखिया की जनता के प्रति जवाबदेही तो बनती है।
संघ के भीतर की कार्यप्रणाली का लोकतंत्र से दूर-दूर तक का रिश्ता नहीं
यहां संघ नेतृत्व इस बाध्यता से भी मुक्त है। और संघ के भीतर की कार्यप्रणाली का लोकतंत्र से दूर-दूर तक का रिश्ता नहीं है। यहां किसी चुनाव की जगह चयनों का तंत्र काम करता है। और यहां तक कि संघ मुखिया मरने से पहले अपने मन मुताबिक अपना उत्तराधिकारी तय करके जाते हैं।
यानी लोगों की भागीदारी और उसके चयन की जगह एक व्यक्ति में आस्था पर निर्भर होती है पूरी प्रणाली। ऐसे में जिस समाज और व्यवस्था के भीतर किसी एक व्यक्ति की मर्जी सर्वोपरि हो और उसे चुनने या फिर नियंत्रित करने की कोई वैकल्पिक व्यवस्था न हो। वह किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था का आदर्श नहीं हो सकता है। इसलिए परिवार के इन सभी रूपों को खारिज करना होगा। और सच्चे मायने में लोकतांत्रिक समाज की स्थापना के लिए पार्टियों को इन परिवारों के चंगुल से मुक्त करना होगा।
वैसे लोहिया ने भी कहा है कि जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं करतीं। अब तक तो इनको झेलते 67 साल बीत गए हैं।


