शानदार गुफरान

देश को आज़ादी मिलते ही राष्ट्र निर्माण में लगे तथाकथित धर्मनिरपेक्ष कॉंग्रेस नेता कितने सही थे इसका आंकलन समाज के सभी शिक्षित लोगों को करना चाहिए. केरल के एक मंदिर में लगातार ख़ज़ाना निकाला जा रहा है जिसका आंकलन लगभग एक लाख करोड़ के आगे जा चुका है. सवाल ये है के उस समय जितनी भी मुस्लिम रियासतें थीं उनका ख़ज़ाना तो पटेल द्वारा राष्ट्रिया संपत्ति घोषित किया गया जबकि केरल के राजाओं का ख़ज़ाना शाही परिवार द्वारा स्थापित ट्रस्ट का और जिसपर भारत सरकार कभी भी अपना दावा नही कर सकती और ये शाही परिवार आज भी देश में एक सम्मानित जीवन जी रहा है , ये ख़ज़ाना जिसकी बानगी भर है जब की मुगलों के वारिस आज भी दयनीय स्थिति में अपना पेट पाल रहे हैं और भारत छ्चोड़कर जाने वाले सभी मुस्लिम लोगों की संपत्ति को शत्रु संपत्ति घोषित किया गया. एक राष्ट्र द्वारा अपने ही देश के लोगों के साथ ये दोहरा मापदंड क्या वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना करता है. लगातार काले धन का राग अलाप रही सिविल सोसाइटी और एक राज्य विशेष को धारा 370 देने पर मुस्लिम तुष्टिकरण की बात करने वाले धार्मिक और राष्ट्रवादी चुप क्यूँ है ? एक लाख करोड़ से तो देश के कई राज्यों को क़र्ज़ मुक्त किया जा सकता है. बजट का रोना रो रहे विकास कार्यों को नयी दशा और दिशा दी जा सकती है. कई विश्व विद्यालयों का निर्माण भी असंभव नही हो सकता लेकिन हम सदा की तरह चुप हैं.

एक और सवाल- अगर इतना धन किसी भी मुस्लिम मदरसे से मिलता तो ये हवाला के द्वारा भेजा गया वो धन होता जिसका इस्तेमाल देश को तोड़ने वाली ताकतें करतीं और तमाम तरह की सरकारी जाँच एजेंसियाँ युध्द स्तर पर इस धन के स्रोत पर रिसर्च कर रहीं होतीं जबकि केरल में सरकार द्वारा इस धन की सुरक्षा को लेकर विचार मंथन हो रहा है साथ ही ये भी सॉफ कर दिया गया है की इस धन पर सरकार अपना दावा नही करेगी जो की मेरी नज़र में बेहद विवादास्पद निर्णय है.

हम कब तक इस खेल का मोहरा बनें रहेंगे ? क्या हमारा लोकतंत्र कभी व्यस्क हो पाएगा और हमारी तथाकथित सिविल सोसाइटी कब अपने दोहरे मापदंडों से बाहर आकर हमें गले लगाएगी ताकि सही अर्थ में राष्ट्र निर्माण हो और हमारी ऊर्जा का भी उसमे योगदान हो.

शानदार गुफरान, लेखक स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. शोषित और वंचित तबकों के लिए काम करने वाली संस्था "बिस्मिल एजुकेशनल सोसायटी" से जुड़े हुए हैं.